TRENDING NOW

A place for hindi literature, hindi stories, hindi poems, motivational and inspirational stories.

समस्त भारत  व नेपाल में  पर्यावरण संरक्षण एवं साहित्य के क्षेत्र में उत्त्कृष्ट योगदान के लिए ग्रीन केयर सोसाइटी के संस्थापक व मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल के आयोजक सामाजिक कार्यकर्ता डॉ विजय पण्डित को केन्द्रीय हिंदी भवन, नई दिल्ली  में गायत्री साहित्य संस्थान द्धारा आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में "गायत्री पर्यावरण शिरोमणी सम्मान" से अलंकृत किया गया।
इस अवसर पर  वरिष्ठ साहित्यकारों जिनमे रूड़की से डा. योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण', आगरा से वरिष्ठ साहित्यकार सरोजनी प्रीतम, राजेन्द्र मिलन, कार्टूनिस्ट इरफ़ान खान, नागपुर से बांसुरीवादक रोहित आनंद , अविनाश बागड़े, कानपुर से डॉ मधु प्रधान, उज्जैन से सुरेंद्र सिंह हमसफर, जालंधर बिसन सागर सहित अनेक विभुतियों को भी सम्मानित किया गया।
डा. विजय पंडित को गायत्री पर्यावरण सम्मान से अलंकृत किए जाने पर ग्रीन केयर सोसाइटी के सभी सदस्यों ने बधाई दी, जिनमें डा. यूनुस खान, राजीव शर्मा, संगीता पंडित, प्रीती त्यागी, प्रशान्त कौशिक, अश्वनी कौशिक, मोती लाल शर्मा, राजेश शर्मा, अजीत कुमार अजीत, डॉ राम गोपाल भारतीय, के. के. बेदिल शामिल रहे।


A place for hindi literature, hindi stories, hindi poems, motivational and inspirational stories.


प्रगतिशील लेखकों की फेहरिस्त में ख़्वाजा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। साहित्यकार, पत्रकार एवं फ़िल्म निर्माता और निर्देशक रहे अब्बास साहब की कहानियाँ आधुनिक भारत की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में शामिल हैं। 'मुझे कुछ कहना है’ कहानी-संग्रह उनकी चयनित कहानियों का संकलन है। यह कहानियाँ न केवल भारतीय समाज की वास्तविकता को दर्शाती हैं बल्कि ख़ुद अब्बास साहब की आत्मा का दर्पण भी हैं।

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मुझे कुछ कहना है’ में शामिल सभी  कहानियों का चयन एवं लिप्यांतरण उनकी नतिनी और उनके साहित्य की अध्येता ज़ोया जैदी ने किया है। इनमें से कुछ कहानियाँ हिन्दी में पहली बार प्रकाशित हुई हैं।

किताब की भूमिका में डॉ. ज़ोया ज़ैदी लिखती हैं, “ ख़्वाजा अहमद अब्बास ऐसे व्यक्ति थे जिनके जीवन का लक्ष्य होता है -  एक उद्देश्य, जिसके लिए वे जीते हैं।  एक मक़सद मनुष्य के समाज में बदलाव लाने का , उसकी सोई हुई आत्मा को जागने का। यही काम उन्होंने अपनी कहानियों,  फ़िल्मों और अपने स्तंभों में आजीवन किया।

किताब का ख़ास आकर्षण इसमें शामिल कृष्ण चन्दर द्वारा लिया गया अब्बास साहब का साक्षात्कार है जहाँ दोनों ही फनकार साहित्य और फ़िल्मों पर लंबी बातचीत करते दिखाई देते हैं। सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को ‘सात हिन्दुस्तानी’ में उनके फ़िल्मी करियर का पहला ब्रेक देने वाले अब्बास साहब के कई मज़ेदार किस्से पाठकों को उनके और क़रीब लाती है।

ख़्वाजा अहमद अब्बास के बारे में -

ख़्वाजा अहमद अब्बास प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और उर्दू लेखक थे। वे उन कुछ गिने चुने लेखकों में से एक हैं जिन्होंने मुहब्बत, शांति और मानवता का पैगाम दिया। पत्रकार के रूप में उन्होंने 'अलीगढ़ ओपिनियन' शुरू किया। 'बॉम्बे क्रॉनिकल' में ये लंबे समय तक बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक रहे। इनका स्तंभ 'द लास्ट पेज' सबसे लंबा चलने वाले स्तंभों में गिना जाता है। यह 1941 से 1986 तक चला। अब्बास इप्टा के संस्थापक सदस्य थे।ख्वाजा अहमद अब्बास ने उस समय लिखना शुरू किया जब देश गुलाम था और तरक्कीपसंद शायर व लेखक एक मंच पर जुटना शुरू हुए थे, जिसकी शुरुआत में ‘इप्टा’ की स्थापना एक महत्वपूर्ण बिंदु थी।

किताब : मुझे कुछ कहना है
लेखक : ख़्वाजा अहमद अब्बास
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
वर्ष : 2017
भाषा :  हिंदी
पन्ना: 264
बाइंडिंग:  पेपरबैक
मूल्य : 250
आईएसबीएन 13: 9788126728909


A place for hindi literature, hindi stories, hindi poems, motivational and inspirational stories.

जाने क्यूँ? माँ मुझे मरने नहीं देती !
जाने क्यूँ, वो साँसों की डोर टूटने नहीं देती,
बस दो कदम और चलने का वास्ता देकर;
मुझे रूकने नहीं देती।

बात कहती है मुझे हँस-हँस कर जी लेने की,
अजीब शक्स है वो, मुझको चैन से रोने भी नहीं देती।

आज हौसला देती है मुझे, चाँद सितारों को छू लेने की,
लेकिन वो मेरे साथ जाने की, कभी जीद नहीं करती।

जब उदास हो जाता हूँ मैं,
नहीं जाना मुझे बिन तेरे, उन चाँद सितारों पर,
तो उसका प्यारा सा चेहरा, मुझे टूटकर बिखरने नहीं देती।

शायद जानती है वो भी, इन आँखों में आँसूओं का सैलाब है,
जाने क्यूँ, फिर भी वो इन आँसूओं को गिरने नहीं देती।

मुझसे कहती है “मैं तो मर जाउँगी तुम्हारे बिना”,
मैं जिन्दा हूँ अब तक, की वो मुझे मरने नहीं देती। 


लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है अौर आप सामाजिक, साहित्यिक तथा शैक्षिक परिवेश पर लेखन करते हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


A place for hindi literature, hindi stories, hindi poems, motivational and inspirational stories.

अपने देश में मिलावटखोरी पल रहे है
क्यों अपने ही अपने को छल रहे है
न जाने देखकर भी नज़रे खामोश हो जाती है
दो पल की हँसी ख़ुशी के लिए 
सेहत को ताक पर रख जाते है
फिर भी अंदर से क्रोध जागता है 
लेकिन क्या करे अब झुठी हँसी ख़ुशी में 
दो पल का ही नुकसान है
बस जी करता है सुनो सरकार 
अब यही फरमान है 
यह मातृभूमि पवित्र है 'यहाँ पाप मत बढ़ाओ
 वरना एक दिन सब सर्वनाश हो जायेगा 
मिली दुनिया फिर नही मिलेगी
अब नही समझे कब सरकार जगेगी 
मालूम है उन्हें पर क्यों गूँगी बहरी से लगती है
जी करता है अब सेहत के दुश्मनों को 
हर चौराहे पर फाँसी पर लटका दूँ
 इस देश में पल रहे मिलावटखोरो को 
ऎसे ही सबक सीख ला दूँ।


लेखक राजगढ़ तहसील सरदारपुर जिला धार मध्यप्रदेश के रहने वाले है और वर्तमान में पत्रकारिता स्नातक के छात्र है एवं कई वर्षो से पत्रकारिता क्षेत्र में में सक्रिय है। आपसे 9893711820 अथवा ई-मेल bhandari.akshjay11@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


A place for hindi literature, hindi stories, hindi poems, motivational and inspirational stories.

25 ग्लोबल ब्रांड किताब, सौ साल से भी ज़्यादा पुराने पच्चीस ब्रांडस से पाठकों को रू-ब-रू करवाती है। किताब मर्क, कोलगेट, थॉमस कूक, पार्कर, हॉर्लिक्स, बाम्बे डाइंग जैसे ब्रांडस के इतिहास में जाकर पाठकों के लिए कई रोचक तथ्यों को सामने लाती है जिससे इन ब्रांड्स के वजूद में आने से लेकर उनके आज की स्थिति को समझा जा सकता है। अपने-आप में प्रेरणादायक ये कहानियाँ न केवल वर्तमान के उपभोक्ता बाज़ार के रूप और अस्त्तीव को समझने में पाठकों की मदद करती है बल्कि ‘कंपनी-टू-कस्टमर’ कल्चर कोड़ को डिकोड करने में भी सहायक हैं।

यह पुस्तक पाठकों को उनके पंसदीदा ब्रांड से, उनके लगाव को मजबूत करती है।  लेखक प्रकाश बियाणी और कमलेश माहेश्वरी ने विश्व के सबसे पुराने 25 ब्रांड्स का इतिहास तथा इनके उद्योग बनने की कहनी को बड़ी रोचक तरह से लिखा है।

हम कोइ ब्रांडेड उत्पाद खरीदते हैं तो केवल वस्तु का मूल्य नही चुकाते। हम उस 'वचन' का मूल्य भी उसके उत्पाद को चुकाते हैं, जो हमें ब्रांड के साथ मिलता हैं। वे ही ब्रांड आज के प्रतिस्पर्धी युग में लंबी पारी खेलते हैं, जो एक बार नही, हर बार हमारे भरोसे को पुख्ता करते हैं। इस पुस्तक का ध्येय इन्हीं कहानियों को पाठको से सामने लाना है। जैसे, लाइफबॉय साबुन बनाने वाले लीवर बंधु 1884 में हर सप्ताह 450 टन साबुन बनाते थे पर फ़िर भी मांग कि पूर्ति नही कर पाते थे।

आजादी के समय हमारे देश में किवदंती थी -'देश का सबसे बड़ा लुहार टाटा और सबसे बड़ा मोची बाटा। वैसे यह संबोधन अटपटा व असंगत लगता हैं ,पर इसमें छुपा हैं टाटा व बाटा के प्रति सम्मान और इसमें समाया हुआ हैं देश का ओधोगिक इतिहास।

थॉमस एल्वा एडिसन  इतने स्कूल की पढ़ाई में इतने पीछे थे कि उन्हें स्कूल से निकाल दिया था। लेकिन, वे प्रयोगों में इतने खोये रहते थे कि खाने पिने कि सुध नही रहती थी। बिजली के बल्ब बनाने में वो हज़ारों बार असफल हुए थे। इस तरह के दिलचस्प 25 ब्रांडो की जन्म की कहानियां आप इस किताब में पढ़ सकते हैं जो अभी ग्लोबल ब्रांड हैं।

'25 ग्लोबल ब्रांड' के लेखकों का परिचय

किशोरावस्था से सतत् लेखन कर रहे प्रकाश बियाणी मूलत: बैंकर हैं। भारतीय स्टेट बैंक में 25 साल (1968-1995) नौकरी करने के बाद वे आठ साल देश के अग्रणी समाचार पत्र समूह 'दैनिक भास्कर’ में कॉर्पोरेट संपादक रहे । देश के औद्योगिक परिदृश्य व उद्योगपतियों पर उनके दो हजार से ज्यादा लेख/साक्षात्कार/समीक्षाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। इस दौरान उन्हें देश के कई अग्रणी उद्योगपतियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुअवसर भी मिला है एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस मीट/ इवेंट्स में शिरकत करने का मौका भी। इन दिनों वे कार्पोरेट जगत व कंपनी मामलों पर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। आपकी पुस्तक 'शून्य से शिखर’ (35 भारतीय उद्योगपतियों की यशोगाथा) को पाठकों, खासकर बिजनेस स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। अपने किस्म की इस अनूठी पुस्तक का द्धितीय संशोधित संस्करण एवं पेपरबैक संस्करण भी एक साल में मार्केट में लांच हो चुके हैं।

किताब का नाम : 25 ग्लोबल ब्रांड : सौ साल बाद भी शिखर पर
लेखक : प्रकाश बियाणी, कमलेश माहेश्वरी
प्रकाशन : राजकमल  प्रकाशन 
वर्ष : 2017
पन्ने : 169  
बाइंडिंग : पेपरबैक
कीमत : 195 
भाषा :  हिंदी 
आईएसबीएन 13: 9788126730001