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दीपक में भरकर आशाएँ
बाती नेह की मैं 
जलना चाहती हूँ 
खुशियों की दीप सी
तुम्हारे मन के आँगन में,
पी कर अंधियारा 
हर दर्द तुम्हारा
बिखेरना चाहती हूँ
कतरनें रोशनी की 
तुम्हारे हृदय के प्रांगण में,
पनियाले आँखों के
बुझे हुये हर ख्वाब को
जगाना चाहती हूँ
अपनी अधरों की मुस्कुराहट से
खाली आँचल में बँधी
अनगिनत दुआओं के
रंगीन मन्नत के धागों के सिवा
कुछ नहीं 
तुम्हें देने के लिए,
पर,मैं भेंट करना चाहती हूँ
इस दिवाली पर तुम्हें
अनमोल उपहार,
दे दो इज़ाजत तो बन जाऊँ
तुम्हारे आँगन की
तुलसी बिरवे का दीया
तुम्हारे सुख समृद्धि की
प्रार्थना में अखंड जलती हुई।


श्वेता सिन्हा जी कवि व नियमित ब्लॉगर है अौर जिनका ब्लॉग 'मन के पाखी' बहुत प्रसिद्व है। आपसे E-Mail : swetajsr2014@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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मेरठ। सोमवार को डॉ फखरे आलम खान द्वारा लिखित एंकाकी 'अनाथ बच्ची' ई-बुक का विमोचन शहर के एक होटल में किया गया।  अनाथ बच्ची ई-बुक का प्रकाशन एवं डिस्ट्रीब्यूशन प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा किया गया है जो कि अमेजन किंडल, कोबो, रीडव्येहर सहित देश-विदेश की प्रसिद्व वेब स्टोर्स पर पाठकों के पढ़ने के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। ई-बुक का उद्घाटन शहर के गणमान्य लोगों की उपस्थति में किया गया। इस दौरान कार्यक्रम में मिस नोर्थ इंडियामीनाक्षी सुखनानी, इंटरनेशनल मेंटोर एवं डायरेक्टर  मनोज सैनी, बॉलीवुड एक्टर शिखा राजा के साथ ही राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओं के लोग भी मौजूद रहे। बताते चलें कि अब तक डॉ फखरे आलम खान की पुस्तकें प्रिन्ट में पूरे देश मे पढ़ी जा रही थी। डॉ खान उपन्यासकार, कहानीकार एवं व्यंग्यकार है।
इस मौके पर प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के डायरेक्टर राजेन्द्र सिंह बिष्ट ने बताया कि हमारा मकसद नये साहित्यकारों को ई-बुक एवं पेपरबेक किताब बहुत ही कम बजट में उपलब्ध कराना है। उन्होने बताया कि पूरे देश में सबसे सस्ता पैकेज हम अपने लेखकों को उपलब्ध करा रहे है जिसमें ई-बुक और पेपरबैक दोनों ही शामिल है। उन्होने कहा कि अभी हमने पेपरबैक पुस्तकों के लिए अपनी वेबसाईट पर प्राईस लिस्ट नही प्रदर्शित नही की है क्योंकि हमारी टीम अभी मार्केट रिसर्च में जुटी हुई है कि कैसे हम इससे भी सस्ते पैकेज अपने लेखकों को दे सके।

 

अनाथ बच्ची (एकांकी) के बारे में

‘अनाथ बच्ची’ (एकांकी) :: आखिर एक युवा शराबी कैसे एक बच्ची को अच्छी परवरिश देता है, कैसे उसे समाज में एक मुकाम देता है और क्यों उस बच्ची को अपनी माँ से नफरत हो जाती है। जब उसे अपने पिता की सच्चाई पता चल जाती है तो वह क्या कदम उठाती है?

ई-बुक पढ़ने के लिए दिए गये लिंक पर क्लिक करें



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सिनेमा आधुनिक युग की सर्वाधिक लोकप्रिय कला है। सिनेमा विज्ञान की अद्‌भुत देन है। सिनेमा का प्रयोग दैनिक जीवन में मनोरंजन के रूप में किया जाता है। सिनेमा का हमारे जीवन से घनिष्ट सम्बन्ध है। सिनेमा का विश्व भर में खुब प्रचार-प्रसार हुआ है। दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में फिल्में बन रही हैं। भारत में भी लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में फिल्में बनती हैं। इनमें भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी में बनी फिल्मों का सबसे अधिक बोलबाला रहता है। हिन्दी सिनेमा को 'बॉलीवुड' के नाम से भी जाना जाता है।'बॉलीवुड' नाम अंग्रेज़ी सिनेमा उद्योग 'हॉलिवुड'' के तर्ज़ पर रखा गया है क्यों कि हिन्दी सिनेमा भी हिन्दी भाषा में फ़िल्म बनाने का उद्योग बन गया है। हिन्दी फ़िल्म उद्योग भारत की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में बसा है जो मायानगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है।
फिल्मों के निर्माण में अनेक प्रकार के वैज्ञानिक यंत्रों का प्रयोग होता है। शक्तिशाली कैमरे, स्टूडियो, कंप्यूटर, संगीत के उपकरणों आदि के मेल से फिल्मों का निर्माण होता है। इसे पूर्णता प्रदान करने में तकनीकी-विशेषज्ञों, साज-सज्जा और प्रकाश-व्यवस्था की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसने अपने कलात्मक क्षेत्र का विस्तार मूक सिनेमा (मूवीज) से लेकर सवाक् सिनेमा (टॉकीज), रंगीन सिनेमा,एच.डी.,3डी सिनेमा, स्टीरियो साउंड, वाइड स्क्रीन और आई मेक्स तक किया है। हिन्दी फिल्मों में विशेषत: हिन्दी की 'हिन्दुस्तानी' शैली का चलन है। हिन्दी फिल्मों में विषयवस्तु देशभक्ति, परिवार, प्रेम, अपराध, भय तथा वर्तमान समय के ज्वलंत मुद्दे इत्यादि पर आधारित होते हैं। हर फ़िल्म में कई मनोरंजक गाने होते हैं। हिन्दी और उर्दू (खड़ीबोली), पंजाबी, बम्बइया हिन्दी, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी जैसी बोलियाँ भी संवाद और गानों मे उपयुक्त होते हैं। साहित्य, रंगमंच, संगीत, चित्रकला, तकनीक की सभी सौन्दर्यमूलक विशेषताओं और उनकी मौलिकता से सिनेमा बहुत आगे निकल गया है।
भारत में प्रथम बार 7 जुलाई सन् 1896 को बंबई के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। एक महत्वपूर्ण दिन है। इनके लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह मुंबई और कोलकाता में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। भारत में प्रथम बार सन् 1899 में 'श्री भटवडेकर' और 'श्री हीरालाल सेन'  ने प्रथम लघु चलचित्र बनाने में सफलता हासिल की। लोग कहते हैं कि मूक दौर में 1288 फिल्में बनी थीं, लेकिन उनमें से मात्र 13 फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलती हैं। दादा साहेब फालके को उस समय व्यवसाय में बहुत हानि हुई। व्यवसाय में हुई हानि से उनका स्वभाव चिड़िचड़ा सा हो गया था। दादा साहेब ने क्रिसमस के अवसर पर ‘ईसामसीह’ पर बनी एक फिल्म देखी। फिल्म देखने के दौरान ही दादा साहेब ने तय कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद फिल्मकार बनना ही है। उन्हें लगा कि रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक महाकाव्यों से फिल्मों के लिए अच्छी और अनेक प्रकार की कहानियां मिलेंगी। उनके पास हुनर की कोई कमी नहीं थी। वे नए-नए प्रयोग करते थे। दादा साहेब अपनी योग्यता और स्वभावगत प्रकृति के चलते प्रथम भारतीय चलचित्र बनाने का असंभव कार्य करने वाले वह पहले व्यक्ति बने।"दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। वह फिल्म ल्युमेरे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई जो कि भारत की पहली लंबी फिल्म थी और सन् 1913 में प्रदर्शित हुई। उस चलचित्र ने (ध्वनिरहित होने के बावजूद भी) लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की।"(1) कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फीचर फिल्म का जन्म सन् 1912 में ही 'पुंडलिक' नामक फिल्म से हो गया था, लेकिन सर्वस्वीकार्य रूप से भारतीय फीचर फिल्मों का जन्म सन् 1913 में माना गया है। भारतीय सिनेमा में सन् 1913 से सन् 1929 तक मूक फिल्मों की ही प्रधानता रही पर सन् 1930 तक आते-आते चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित होने के कारण बोलती फिल्में बनने लगीं।
भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। फिल्म 'कर्मा' सन् 1933 में प्रदर्शित इतनी लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं। सन् 1949 में राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ ने बाक्स आफिस पर धूम मचाई। 50 के दशक में सामाजिक विषयों पर आधारित व्यवसायिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। वी शांताराम की 1957 में बनी फिल्म ‘दो आंखे बारह हाथ’ में पुणे के ‘खुला जेल प्रयोग’ को दर्शाया गया। फणीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ हिन्दी सिनेमा में कथानक और अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण है। ऐसी फिल्मों में बदनाम बस्ती, आषाढ़ का दिन, सूरज का सातवां घोड़ा, एक था चंदर-एक थी सुधा, सत्ताईस डाउन, रजनीगंधा, सारा आकाश, नदिया के पार आदि प्रमुख है। 'धरती के लाल और नीचा नगर’ के माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिला और अपनी माटी की सोंधी सुगन्ध, मुल्क की समस्याओं एवं विभीषिकाओं के बारे में लोगों की आंखें खुली। ‘देवदास, बन्दिनी, सुजाताऔर परख’ जैसी फिल्में उस समय बाक्स आफिस पर उतनी सफल नहीं रहने के बावजूद ये, फिल्मों के भारतीय इतिहास के नये युग की प्रवर्तक मानी जाती हैं। महबूब खान की साल सन् 1957 में बनी फिल्म ‘मदर इण्डिया’ हिन्दी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली और शम्भू मित्रा की फिल्म ‘जागते रहो’ फिल्म निर्माण और कथानक का शानदार उदाहरण थी। इस श्रृंखला को स्टर्लिंग इंवेस्टमेंट कारपोरेशन लिमिटेड के बैनर तले निर्माता निर्देशक के आसिफ ने ‘मुगले आजम’ के माध्यम से नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। नारायण सिंह राजावत लिखते हैं-  "पुराने जमाने में ‘तीसरी कसम’ से लेकर ‘भुवन शोम’ और अंकुर, अनुभव और अविष्कार तक फिल्मों का समानान्तर आंदोलन चला। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर आधारित कथावस्तु को देखा.परखा और उनकी सशक्त अभिव्यक्तियों से प्रभावित भी हुए। नये दौर में विजय दानदेथा की कहानी पर आधारित फिल्म ‘पहेली’ श्याम बेनेगल की ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ और ‘वेलडन अब्बा’, आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’, ‘स्वदेश’, आमिर खान अभिनीत ‘थ्री इडियट्स’, अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘पा’ और ‘ब्लैक’, शाहरूख खान अभिनीत ‘माई नेम इज खान’ जैसे कुछ नाम ही सामने आते हैं जो कथानक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सशक्त माने जाते हैं।"(2) सन् 1950 के दशक मे हिंदी फिल्मे श्वेत-श्याम से रंगीन हो गई। फिल्म का विषय मुख्यतः प्रेम होता था और संगीत फिल्मों का मुख्य अंग होता था। 1960-70 के दशक की फिल्मों में हिंसा का प्रभाव रहा। सन् 1980 और सन् 1990 के दशक में प्रेम आधारित फिल्में वापस लोकप्रिय होने लगी। 1990-2000 के दशक मे समय की बनी फिल्मे भारत के बाहर भी काफी लोकप्रिय रही। प्रवासी भारतीयों की बढ़ती संख्या भी इसका प्रमुख कारण था। हिंदी फिल्मों में प्रवासी भारतीयों के विषय लोकप्रिय रहे हैं। 60 और 70 का दशक हिंदी फिल्मों के सुरीले दशक के रूप में स्थापित हुआ तो 80 और 90 के दशक में हिन्दी सिनेमा ‘बालीवुड’ बनकर उभरा।

संदर्भ ग्रंथ :

1. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%
2. सिंह राजावत नारायण, हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष, भारतीय पुस्तक परिषद, आई. एस. बी. एन. -978-81-908095-0, प्रकाशन वर्ष: जनवरी 01, 2009

सहायक संदर्भ ग्रंथ :

1. वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002
2. आइडोलॉजी ऑफ हिंदी फिल्म, एम. माधव प्रसाद
3. परिकल्पना समय (हिन्दी मासिक), माह : मई 2013, लेखक : रविराज पटेल, शीर्षक : कैसे बनी भोजपुरी की पहली फिल्म
4. बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, मिहिर बोस


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क - 4  मुरारी पुकुर लेन,कोलकाता-700067, ई-मेल- anandpcdas@gmail.com, 7003871776, 9804551685


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भारत में आदिकाल से ही 'ज्ञान' की महत्ता को स्वीकार किया गया है एवं शिक्षा की सतत् प्रक्रिया हेतु प्रयास होते रहे हैं। शिक्षा वह प्रकाश है, जिसके द्वारा मानव की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता है। प्राचीन भारतीय समाज में शिक्षा का स्वरूप अनौपचारिक था व सर्वसामान्य के लिये सुलभ नहीं था, परन्तु वर्तमान समाज में शिक्षा एक पृथक व विशेषीकृत औपचारिक प्रक्रिया है जिसके लिये विभिन्न प्रकार की औपचारिक संस्थाओं का प्रावधान है। जहां एक ओर कुछ अनौपचारिक संस्थाये यथा परिवार, समुदाय, राज्य व धार्मिक संस्थाएं इत्यादि हैं जो शिक्षार्थी को अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा देती हैं, वहीं औपचारिक संस्थाएं आयोजित शिक्षा प्रदान करती हैं जैसे-पुस्तकालय, वाचनालय, जनसंचार संस्थायें इत्यादि। इसमें सर्वप्रमुख व सर्वमान्य स्थान 'विद्यालय' का है। विद्यालय समाज का मस्तिष्क है, विद्यालय एक ऐसी संस्था है जिसे मानव ने इस उद्देश्य से स्थापित किया है कि समाज में ऐसे योग्य सदस्य तैयार करने में सहायता मिले, जो समाज के विकास में सहायक हों। समाज तथा राष्ट्र के विकास में विद्यालयों का महत्वपूर्ण योगदान है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि 'किसी भी राष्ट्र की प्रगति का निर्णय विधानसभाओं, न्यायालयों एवं कारखानों में नहीं वरन् विद्यालयों में होता है।' विद्यालय ही वह स्थान है जहां विद्यार्थी के समाजिक, मानसिक, शारीरिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास की परिवार द्वारा रखी गयी आधार शिला को सुदृढ़ किया जाता है। विद्यालय केवल भवन नहीं वरन् ज्ञान, कला, विज्ञान और संस्कृति के गतिशील केन्द्र है जो शिक्षार्थी के जीवन में शक्ति का संचार कर उसके व्यक्तित्व को परिस्कृत करते हैं एवं उसकी जन्मजात शक्तियों के प्रस्फुटन के लिये उपयुक्त वातावरण प्रदान करते हैं। विद्यालयी वातावरण का प्रत्येक पक्ष शिक्षार्थी पर अपना प्रभाव डालता है। विद्यालय भवन, विद्यालय का सामाजिक वातावरण, शैक्षिक उपकरण, शिक्षक का व्यक्तित्व एवं व्यवहार, भौतिक सुविधायें सभी शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। विद्यालय के इन सभी घटकों के मध्य संयोजन व समन्वय होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है साथ ही विद्यार्थियों के सर्वांगीर्ण विकास के लिए विद्यालय के प्रत्येक घटक के मध्य परस्पर उचित तालमेल होना भी आवश्यक है एवं सम्पूर्ण विद्यालयी व्यवस्था के संचालक के रूप में इस क्रिया में महत्वपूर्ण योगदान विद्यालय के प्रधानाचार्य का होता है।
किसी देश की शिक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था के लिये प्रशासकीय एवं प्रबन्धकीय व्यवस्था पूर्णरूपेण उत्तरदायी है। यही कारण है कि भारत में शिक्षा की प्रबन्धकीय व्यवस्था की ओर विशेष प्रयास किये जाते रहे हैं। शैक्षिक प्रबन्धन एक अदृश्य कौशल है जो सर्वोत्कृष्ट परिणामों से स्पष्ट होता है। सम्प्रत्यात्मक रूप से ‘कौशल’ शब्द से तात्पर्य किसी विशिष्ट कार्य को सफलतापूर्वक पूर्ण करने की योग्यता से है। यह एक अर्जित या सीखी हुई योग्यता है जो ज्ञान को कार्य के रूप में रूपान्तरित करती है। मनुष्य के जीवन में शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। और शिक्षा प्रक्रिया की सफलता उत्तम प्रबन्धन पर निर्भर करती है क्योंकि यही प्रबन्धन निरंकुश होता है तो शिक्षा की प्रक्रिया में अनेकों रूकावटें उत्पन्न होगीं, प्रबन्धन यदि अधिनायकवादी है तो एक ही व्यक्ति अथवा संस्था का वर्चस्व होगा और यदि मुक्त है तो अराजकता का साम्राज्य होगा अतः स्पष्ट है कि शिक्षा संस्थाओं की सफलता इस बात पर अवलंबित है कि उसका प्रबन्धन किस प्रकार का है अत:एव विद्यालयी संस्था के संचालन एवं संस्थागत निष्पादन को सुनिश्चित करने हेतु उत्तम शैक्षिक प्रबन्धन का होना नितांत आवश्यक है। इस सम्बन्ध में ओलिवर शेल्डन ने कहा है कि- ‘प्रबन्धन उद्योग (विद्यालय एवं शिक्षा) की वह जीवनदायिनी शक्ति है जो संगठन को शक्ति देता है, संचालित करता है और नियंत्रित करता है।’
प्रत्येक प्रकार के विद्यालयों में शैक्षिक-प्रशासन का उत्तरदायित्व मुख्य रूप से विद्यालय प्रधानाचार्य का ही होता है। औपचारिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य न केवल प्रशासक के रूप में वरन शिक्षक तथा शिक्षार्थियों के प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक, विद्यालयी व्यवस्था का पर्यवेक्षक, नीतियों का निर्धारक, क्रियान्वयनकर्ता एवं मूल्यांकनकर्त्ता भी होता है। विद्यालय की प्रगति एवं समाज में विद्यालय की प्रतिष्ठा का निर्माण मुख्य रूप से प्रधानाचार्य से ही सम्बन्ध रखता है। विद्यालय-प्रधानाचार्य शिक्षा सम्बन्धी नीतियों एवं व्यावहारिक शैक्षिक उपलब्धियों के मध्य सेतु का कार्य करता है। विद्यालय के प्रत्येक कार्य में विद्यालय प्रधानाचार्य का निर्देश होता है एवं विद्यालय के दैनिक कार्य-व्यवहार, प्रशासनिक एवं शैक्षिक नीतियों का निर्माण एवं क्रियान्वयन प्रत्यक्ष रूप से विद्यालय प्रधानाचार्य पर निर्भर करता है। विद्यालयों के दोनो प्रमुख घटकों शिक्षक तथा शिक्षार्थी के लिये प्रधानाचार्य मार्गदर्शक का कार्य करता है जो उसके सिद्धान्तों एवं कार्य व्यवहार द्वारा स्वतः ही क्रियान्वित होता है। विद्यालय की शैक्षिक उपलब्धि का दायित्व मुख्य रूप से प्रधानाचार्य पर ही हेाता है। विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिये पाठ्य विधियों का निर्धारण, अनुशासन व्यवस्था, पाठ्य सहगामी क्रियाओं की रूप रेखा एवं संचालन की दृष्टि से भी विद्यालय के प्रदर्शन व उपलब्धि में प्रधानाचार्य ही सर्वप्रमुख व्यवस्था है।
यह व्यापक स्तर पर अनुभूत तथ्य है कि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता के स्तरोन्नयन द्वारा देश, समाज तथा समग्र मानव जाति के लिये सुयोग्य, सच्चरित्र, निष्ठावान एवं उपयोगी विश्व-नागरिकों का निर्माण सुनिश्चित करने में प्रधानाचार्यां की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ग्रामीण तथा नगर क्षेत्र की शिक्षा संस्थाओं की कार्य प्रणाली तथा उनमें से शिक्षा प्राप्त छात्र-छात्राओं की कार्य क्षमता, व्यावहारिक कौशल एवं अभिव्यक्तियों आदि का सूक्ष्म अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे ही संस्थाएं सफल विद्यालय कहलाने योग्य हैं, जिन्हें कार्य नियोजन, विद्यालय प्रबन्धन, मार्गदर्शन तथा नेतृत्व के कौशलों में प्रवीणता प्राप्त है। विद्यालय की कार्यकुशलता, व्यवस्था एवं श्रेष्ठता, प्रधानाचार्य की व्यक्तिगत योग्यता, कौशल एवं व्यवसायिक निपुणता पर निर्भर करती है। वास्तव में वह विद्यालय का केन्द्र बिन्दु है। जिस प्रकार बिना योग्य कप्तान के जहाज का अपने गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल है उसी प्रकार योग्य प्रधानाचार्य के बिना विद्यालय का अपने शैक्षिक तथा अन्य कार्यक्रमों में सफल होना असम्भव है। एक शैक्षिक प्रशासक के रूप में विद्यालय प्रधानाचार्य को अपनी संस्था के भविष्य की दिशा को परिभाषित करना होता है इस प्रकार यह भविष्यवाणी नहीं करता है बल्कि वर्तमान की वस्तुओं के आवरण को हटाकर यह सुनिश्चित करता है कि संगठन का एक भविष्य है अतः एक प्रधानाचार्य के पास भविष्य की वातावरणीय संस्थितियां जो कि संगठन को प्रभावित कर सकती हैं, के सम्बन्ध में अनुमान लगाने की योग्यता होनी चाहिये। निष्पादन मानकों के रूप में संगठनात्मक उद्देश्यों की व्याख्या एवं इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये उपयुक्त रणनीतियों का चयन, नियोजन कौशलों के सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं।
विद्यालय जैसे संगठन में सामन्जस्यपूर्ण वातावरण, संगठनात्मक नीतियों पर निर्भर करता है। संगठन की नीतियाँ स्पष्ट हैं, उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक हैं, कार्य सम्बन्धी निर्देश स्पष्ट रूप से दिये गये हैं तो संगठन कार्य में सहजता बनी रहती है तथा वातावरण को भी शान्त तथा संतुलित बनाने में सहायक होती है। नीतियाँ दुविधापूर्ण तथा अस्पष्ट है तो सहज सामंजस्यपूर्ण वातावरण बनाना कठिन हो जाता है। संगठन-प्रबन्ध कुछ मूल्यों पर आधारित होता है। प्रबन्धन-मूल्य व्यक्ति को प्रधानता देते हैं या कार्य को, सहयोग वातावरण को या कठोर नियंत्रण को, स्वतन्त्रता के सिद्धांत पर आधारित है या कठोर अनुशासन व नियम पालन के सिद्धांत पर, यह सभी मूल्य संगठन के वातावरण को सुनिश्चित करते हैं। संगठन कौशल, नियोजन कौशलों का ही अनुसरण करते हैं जहां नियोजन कौशल यह स्पष्ट करते हैं कि क्या और कब किया जाना है वहीं संगठन यह निर्धारित करता है कि कौन क्या करेगा और इसे कैसे प्राप्त किया जायेगा।  संगठन करना लोगों के बीच प्रभावपूर्ण व्यवहारात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार स्थापित करना है, ताकि वे साथ-साथ सक्षमतापूर्वक कार्य कर सकें तथा दी गयी वातावरणीय परिस्थितियों में किसी लक्ष्य या उद्देश्य की प्राप्ति के लिये किये गये निश्चित कार्यों के द्वारा व्यक्तिगत संतुष्टि प्राप्त कर सकें। प्रधानाचार्य को संगठन में अधिकार और कत्र्तव्यों के मध्य सम्बन्धों को पहचानने एवं स्पष्ट करने वाला होना चाहिये।
कार्मिक, उनके कार्य और कार्यात्मक सम्बन्धों का एक एकीकृत नेटवर्क ही अन्तिम रूप से संगठन की संरचना का निर्माण करता है अतः प्रधानाचार्य में विभिन्न संगठनात्मक कार्यां का विश्लेषण एवं व्याख्या करने की योग्यता होनी चाहिये एवं प्रशासक का एक महत्वपूर्ण दायित्व यह भी है कि वह संगठन के उद्देश्यों के अनुरूप संगठन में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों की शक्ति को इस प्रकार संयोजित करें कि प्रभावपूर्ण तरीके से उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकें।

सहायक संदर्भ सूची:

1. कुमार, अमित तथा अर्चना अग्रवाल (2012), राजकीय तथा निजी माध्यमिक विद्यालयों में      प्रधानाचार्यों के प्रबन्धन कौशलों का तुलनात्मक अध्ययन, भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध प्रत्रिका, अंक-22, संख्या-2, जून 2012, बस्ती: सरयूपार सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, पृ. 126-130।
2. अग्रवाल, श्वेता (2012), अनुदानित एवं गैर अनुदानित उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के संगठनात्मक वातावरण का शिक्षकों की शिक्षण प्रभावशीलता पर अध्ययन, शिक्षा चिंतन (शैक्षिक त्रैमासिक शोध पत्रिका), नोएडा, न0-44 वर्ष-11, अक्टूबर-दिसम्बर 2012।
3. कुमार, अमित तथा अर्चना अग्रवाल (2012), प्रभावी विद्यालय प्रबन्धन हेतु प्रधानाचार्य में अपेक्षित कौशल, परिप्रेक्ष्य, वर्ष-19, अंक-1, अपे्रल-2012, नई दिल्ली: न्यूपा, पृ. 19-28।


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
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भारतीय सामाजिक व्यवस्था में 'दलित' का अभिप्राय उन लोगों से है, जिन्हें जन्म, जाति या वर्णगत भेदभाव के कारण हजारों सालों से सामाजिक न्याय और मानव अधिकारों से वंचित रहना पड़ा है। शुद्रों की भी हालत कोई खास अच्छी नहीं रही है, सवर्ण आज भी शुद्रों के साथ बैठकर खाने में या उसकी बिरादरी में शादी-ब्याह से कतराते हैं। यह विडंबना ही है, कि समस्त प्राणियों में एक ही तत्व के दर्शन करने वाला, वर्ण-व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित करने वाला समाज, इतना कट्टर कैसे हो गया कि निम्न वर्ण या जाति में जन्म लेने वालों को सब प्रकार के अवसरों से वंचित किया जाता रहा और इन सड़ी-गली सोच के लिए 'मनुस्मृति' को जिम्मेदार है। हमारे देश का लम्बे अरसों तक गुलाम रहने का यह भी एक मुख्य कारण रहा है। इस समय हमारे देश में कई विमर्श चल रहे हैं जिनमें सबसे कारगर और प्रभावशाली विमर्श है, वह दलित विमर्श ही है। वो सचमुच एक ऐसा विमर्श है जिसकी एक वास्तविक सत्ता बन चुकी है और इस विमर्श का महत्व भी बहुत है। इस विमर्श ने हमारे देश में, समाज में एक ऐसे सवाल को खड़ा किया जिस सवाल को लेकर बड़े-बड़े महात्मा आज तक आते रहे और अपनी सारी सदाशयता और अपनी इच्छाओं के बावजूद कुछ नहीं कर सके। वो है जाति का सवाल। दलित विमर्श ने सबसे महत्वपूर्ण काम किया कि इस देश में जाति के सवाल को इस तरह से खड़ा कर दिया कि उसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उससे आंखें नहीं चुरा सकते, उसका जवाब दिए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। ये बहुत असाधारण बात हुई है। युगांतरकारी बात हुई है। ये दलित जाति का सवाल जो है, आज हमारे देश में देशज आधुनिकता की कसौटी बन चुका है। दलित विमर्श में उपन्यास आधुनिक काल की बहुपठित विधा है। हिंदी दलित उपन्यास का मुख्य सरोकार अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास में अपनी पहचान तथा अपनी अस्मिता की खोज करना जो समानता, बंधुता व स्वतंत्रता जैसे जनतांत्रिक मूल्यों पर आधारित मुक्तिकामी विमर्श है। मोहनदास नैमिशराय लिखते हैं- "लोगो को दुःख होता है हमारी आजादी से। पशु-पक्षियों की आजादी उन्हें भाती है। चिड़ियों को वे पिंजरे से मुक्त कर देते हैं, पर हमारी मुक्ति के सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं। हम स्वयं कुछ कहे तो हमे आँखे दिखाते हैं। हम पर आग बबूला हो बरसते हैं। जैसे हम काठ के हो। हमारे भीतर संवेदनाएँ ही न हो। हमारे जिस्म में खून ही नहीं बहता हो। हम कोई मुर्दा हैं। अब हम गुलाम तो नहीं।"1 हिंदी दलित उपन्यास पूरी की पूरी सामाजिक उपन्यास है। लेकिन हिंदी दलित उपन्यास का इतिहास एवं समाजबोध मुख्यधारा से बिल्कुल भिन्न है। वो मानवीय श्रम को ही सौंदर्य और व्यवस्था की अन्यायपूर्ण विसगंतियों से मुक्ति को ही अपना सामाजिक सरोकार और अपनी समाजिकता मानता है उसके केंद्र में केवल और केवल मनुष्य व मनुष्यता है।
जयप्रकाश कर्दम की 'छप्पर' उपन्यास में दलित अस्मिता की खोज के साथ स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारे के मूल्यों को स्थापित करने वाला मुक्तिकामी विमर्श है। डॉ.पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी लिखते हैं- "जयप्रकाश कर्दम के उपन्यास के अनुभव संसार से बहस करते हुए ऐसा महसूस होता है कि हिंदी उपन्यास को भारत की आजादी के बाद स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुता के संवैधानिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक संरचना के सृजनात्मक साहित्य की जमीन की तलाश है। वह जमीन जिसमें जागरण, रोमानी, क्रांतिकारिता और चंद किताबें पढ़कर पैदा हुई संघर्ष चेतना के बजाय मानवीय भावों और एहसासों का जीवन संस्पर्श हो और जिस जमीन पर खड़े होकर आत्मीय और भावनात्मक प्रसंगों की पृष्ठभूमि में अपनी समझ के तीखे से तीखे सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों के समाधान खोजने का उपक्रम किया जा सके। इधर के लेखन में क्षणिक आवेशजन्य क्रांतिकारिता के आग्रहवश बंधुत्व भाव एवं प्रेम को तो जैसे वर्जित क्षेत्र मान लिया गया है। परन्तु छप्पर के उपन्यासकार ने इस तथ्य को बहुत ही संयत, विवेक के साथ उठाया है।"2 इसमें मानवीय भावों और एहसासों का संस्पर्श है। वे इस उपन्यास के माध्यम से ब्राह्मणवाद के मुखौटे को उधेड़ने की कोशिश करते हैं जो हमारे समाज को खोखला बनाये रखने के लिए सक्रिय है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र चंदन और उसके पिता सुक्खा ब्राह्मणवाद की साजिशों के शिकार हैं और पूरे जीवनकाल में उनके द्वारा बनाये गये षडयंत्रों को सहते रहते हैं। "लेकिन चन्दन की देखा देखी यदि सब चमार-चूहड़े पढ़-लिख जाए और सबके सब बाहर जाकर नौकरी करने लगे तो कल को हमारे और घरों में काम कौन करेगा?"3 परंतु चंदन के नेतृत्व में सामाजिक बदलाव के लिए की गयी आंदोलनों की व्यापक प्रतिक्रिया सारे समाज में व्याप्त हो जाती है। फलतः भ्रम और भ्रांति के शिकार लोग यथार्थ को पहचानते हैं और जन्म के आधार पर व्यक्ति को श्रेष्ठ या हीन मानने की भावना कम होने लगते हैं। शनै – शनै समाज में यह भावना पैदा होने लगती है कि जन्म से नहीं बल्कि अपने गुण-धर्म, योग्यता आदि के आधार पर ही मनुष्य श्रेष्ठ और हीन बनता है। जो मनुष्य शील और मर्यादाओं का पालन करता है, ईमानदार और सत्यनिष्ठ हो, छल और कपट से दूसरों को धोखा न दें, मेहनत का फल खाता हो वही समाज में श्रेष्ठ बनता है। जो मनुष्य बुरे व्यवहार करते हो, बईमान हो, छल-कपटी हो, दूसरों की मेहनत की कमाई खाते हो, वह हीन है। "हमारा समाज धर्म द्वारा प्रेरित और संचालित है, हमारी सामाजिक स्थिति, धार्मिक आदेशों का ही परिणाम है। धर्म-ग्रंथ ही हमारे शोषण और अत्याचार की जड़ें हैं।"4 यह संदेश छप्पर उपन्यास के माध्यम से पेश करने में कर्दम जी सफल हो गये हैं। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों में बंधे हुए हैं। किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठान से उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती है और नींद में जाते वक्त तक मनुष्यों के द्वारा निर्मित अंधविश्वासों की जंजीरों में जकड़े हुए हैं।

जयप्रकाश कर्दम का मानना है कि "दलित समाज में जाहर कथा रामकथा के विकल्प के रूप में विकसित दिखाई पड़ती है। इसका आधार राम और जाहर के बीच कई समानताओं का होना है। राम ने चौदह वर्ष वनवास में व्यतीत किए थे, तो जाहर पीर ने भी बारह वर्ष वनवास में व्यतीत किए थे। रामकथा का प्रमुख विषय राम-रावण युद्ध है, तो जाहर कथा में जाहर और अरजन-सरजन के बीच युद्ध प्रमुख है।"5 कुछ लोगों ने बदलाव की हवा को पहचाना और उन्होंने पूजा-पुरोहिताई का धंधा छोड दिया और दूसरे धंधों की ओर उन्मुख हुए। इसी कारण ब्राह्मणवाद के इतने गहरे जाल के बीच भी चंदन, सुक्खा, हरिया आदि पात्रों को कोई खरोच तक नहीं आती। वे बिना कुछ खास प्रयास किये ही जीते हैं, सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश करते हैं और नये समाज का निर्माण करने में सक्षम हो जाते हैं। इस उपन्यास के माध्यम से वर्णव्यवस्था के खोखलेपन को दिखा कर चंदन के मुँह से कहलवाया है कि ‘एक तरफ तुम हो और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो किसी जाति में जन्म लेने से श्रेष्ठ समझे जाते हैं, चाहे वे कुरूप और आचरण से गिरे हुए हो। वे लोग हैं जो बंगलों में रहते हैं, कारों में घूमते हैं जिनकी तिजोरियाँ नोटों से भरी हैं। जो तुम्हारी कमर तोड मेहनत के बदले तुम्हें उचित मजदूरी तक नहीं देते।’ ठाकूर साहब की मान्यता है कि दलित समाज के ये लोग पढ-लिख कर ऊँचे ओहदों तक पहुँचने लगेंगे तो हमारी श्रेष्ठता कहाँ रह जायेंगी। यदि ये लोग स्वावलम्बन और स्वाभिमान का जीवन जीने लगेंगे तो फिर हमारा महत्व क्या होगा। इसलिए ठाकुर हरनाम सिंह अपनी बेटी रजनी को समझाते हैं ‘इतिहास और परम्परा से समाज में हमारा वर्चस्व रहा है। हमारी अस्मिता इसी में है। अस्मिता के बिना मनुष्य जिंदा नहीं रह सकता।’ छप्पर उपन्यास में हरिया और उसकी पुत्री कमला, सुक्खा और उसका पुत्र चंदन, सवर्ण समाज के प्रतिनिधि ठाकुर हरनाम सिंह की पुत्री रजनी आदि के सहयोग एवं आत्मिक जुडाव से सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। छप्पर के माध्यम से दी गयी आधुनिक सामाजिक दृष्टि वर्तमान काल में भी प्रासंगिक है। ग्रामीण-रामप्यारी, चंदन-रजनी-कमल, रामहेत-नंदलाल-रतन, ठाकु हरनाम सिंह- काणा, पंडित सेठ दुर्गादास जैसे पात्र दलित एवं सवर्ण समाज के हैं लेकिन सामाजिक बदलाव को स्वीकार करते हैं। उपन्यासकार ने रजनी के मुँह से कहलवाया है ‘संविधान के अनुसार देश के प्रत्येक नागरिक को सम्मान एवं स्वाभिमानपूर्वक जीने का हक है। यदि चंदन पढ-लिख कर काबिल बनना चाहता है तो यह उसका संवैधानिक हक है, इस पर किसी को ऐतराज क्यों होना चाहिए? इस बात पर तो समूचे गांव को गर्व होना चाहिए। सुक्खा यदि अपना पेट काट कर अपने बेटे को पढाना चाहता है तो उसको ऐसा करने से क्यों रोका जाये?’ जब तक दूसरे लोग भी सुक्खा की तरह अपने बच्चों को काबिल बनाने की ओर ध्यान नहीं देंगे तब तक  न देश का उत्थान होगा और न समाज का। उपन्यासकार सवर्ण समाज की रजनी के माध्यम से स्वतंत्र भारत की आधुनिक नारी तथा संविधान में प्रत्याशित स्वतंत्रता, समानता, बंधुता एवं धर्मनिरपेक्षता के समाज की संरचना को स्वीकार करने की आशा करते हैं।
मोहनदास नैमिशराय द्वारा रचित उपन्यास मुक्तिपर्व में सामजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक, राजनैतिक विषमता का शिकार दलित समाज दिखाई देता है। उपन्यास की कथावस्तु स्वाधीनता आन्दोलन के अंतिम पड़ाव एवं स्वाधीनता के उपरान्त के परिवेश में सूक्ष्म रूप से एवं वास्तव के धरातल पर बुनी गई है। उपन्यास में हमे समाज सीधे-सीधे दो भागों में बंटा हुआ नजर आता है। समाज का एक हिस्सा सारी सुख सुविधाओं से लैस है, तो दूसरी ओर भूख, गरीबी, दरिद्रता, मज़बूरी, विवशता, लाचारी के दुःख और निराशा रूपी सागर में डूबा हुआ दलित समाज नजर आता है। सुख-सुविधाओं से सम्पन्न समाज जमीदारों, नवाब, काश्तकारों का है तो, दूसरा वर्ग ढेढ़ चमार, डोम, भंगी आदि दलितों का है। एक ओर मंदिर-मस्जिद, बाजार, बाग़-बगीचे, पनघट, स्कूल, ऊँची-पक्की इमारतें, घर है। वहीं दलितों की बस्तियों में कुड़ाघर, श्मशान, हगनघाट, कलालों की छोटी-छोटी दुकानें तथा नीम के पेड़ के नीचे बने कच्चे मकान। "उधर बाग़-बगीचे थे तो इधर जंगल। उधर बाजार थे, पनघट थे, मंदिर थे, इधर श्मशान, कूड़ाघर, कलालों की दुकाने। दोनों तरफ के अपने-अपने संस्कार थे। और अपनी-अपनी संस्कृति। जब वे एक दूसरे से टकराते तो मारकाट होती। सवर्ण लाठियाँ बल्लम चलाते हुए गालियाँ देते, थूकते, खुले आम पेशाब करते और अपनी उद्दण्ड संस्कृति का परिचय देते। फिर भी वे शहर भर में सभ्य कहलाते।"6 विषमता सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक आदि के बहुपरिप्रेक्ष में अपनी गहरी जड़े जमा बैठी थी। उपन्यास में एक ऐसा समाज है, जो घोर दरिद्रता से जूझता हुआ दिखाई देता है। इसमें दलित जीवन का चित्र है, दलित जीवन की विसंगति और समस्याएँ है और दलित शोषण-उत्पीड़न की व्यथा व कथा है।

ढेढ़ चमार, डोम, भंगी जैसे दरिद्र, उपेक्षित दलित लोग जो कच्चे घरों में रहते हैं तथा नवाबों-जमीदारों के हवेली एवं खेतों में कमरतोड़ मेहनत और गुलामी करते हैं। दलितों के घरों में पेट भर भोजन कभी-कभार ही मिलता है। इनके घरों में न जमीदारों–नवाबों की भांति नौकर- चाकर है और नाही रात में रौशनी। इनके कच्चे घरों में चूहे-बिल्लियों की लूका छिपीं नजर आती है। उपन्यासकार ने दलित समाज के वास्तविक चित्र को हुबहू साकार करने का प्रयास किया है। नवाब, जमींदार, काश्तकार तथा सवर्ण वर्ग जो अपने-आप को शुद्ध, स्वच्छ, सभ्य कहलवाता है। हवेली, महलों में नवाब, जमींदार, काश्तकार विलासितापूर्ण जीवन जीते हुए दृष्टिगोचर होते हैं- "मालिक लोग मजे से पहलवानी करते, मुर्गो की लड़ाई का मजा लेते, रात में रंडियों के कोठों पर जाते, जहाँ वे गीत-संगीत की महफिलों में देर रात तक जमें होते। नाचनेवालियों के नाज-ओ-नखरे उठाते, उनकी एक-एक अदा पर सैकड़ों हजारों रूपये लुटा देते। …. रंडियों के कोठे पर उन्हें साकी के हाथ से शराब पीने में जरा भी एतराज नहीं होता। …हाकिमों के लिए गद्दियाँ छोड़ दी जाती एक कनीज के हाथ में पान के बीड़े दूसरे के हाथ में पीकदान …।"7 ऐशो- आराम विलासिता का जीवन यापित करते हुए दृष्टिगोचर होता है। रंडियों के कोठे पर, मुर्गों की लड़ाई ,पहलवानी पर रूपये लुटता है। मंदिर-मस्जिद के कारण लड़ता है। ऐसा समाज दलितों के साथ उपेक्षा, घृणा, दुत्कार, डांट–डपट, जानवरों-सा व्यवहार करता है। वह इन दलित पीड़ितों के साथ प्रत्येक क्षेत्र में शोषण करता है। मानो वह कोई इंसान नहीं बल्कि जानवर या जिन्दा लाश हो। दलितों को न मंदिर में जाने का आधिकार था और न शिक्षा प्राप्त करने का। उनका न कोई नेता है औंर ना ही कोई तहसीलदार, कलक्टर जो उन्हें इन्साफ दिला सके। छूत–छात से पीड़ित दलित समाज का मर्मस्पर्शी चित्रण उपन्यास में किया गया  है। उपन्यास में ढेढ़ चमार जाति के एक दलित परिवार के माध्यम से उक्त समस्याओं को मुखरित किया गया है। एक मानव होकर दूसरे मानव के साथ इस प्रकार का नीच बर्ताव हमारे समाज के लिए कतई शोभनीय नहीं है। अपितु संवेदनशील प्रत्येक व्यक्ति उसकी निंदा ही करेगा। नवाब अली वर्दी खां द्वारा बन्सी की हथेली पर थूकना, सहृदय व्यक्ति में आँसू और घृणा को बरबस उपस्थित करता है। "बंसी ने उनकी तरफ हथेली की। नवाब साहब ने उस पर अन्दर का बलगम थूक दिया। ढेर सारी खकारी बंसी की हथेली पर उगल दी गई थी। नवाब साहब के लिए वही उगालदान था और वहीं पीकदान बंसी की आखों में आँसू भर आये थे, पर मुँह से उफ तक न की थी उसने। वैसे ही हथेली पर बलगम लिए वह बैठक खाने के बाहर आ गया था। उसके भीतर अंधड़-तूफान था। बाहर से वह बिलकुल सहज।"8 ढेढ़ चमार, डोम, भंगी आदि दलित जातियों का सवर्ण समझी जानेवाली ऊँची जातियों द्वारा मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में शोषण किया जाता था। उनके साथ जानवरों से भी बत्तर सलूक किया जाता था। मानो वे इन्सान नहीं, वे कोई पत्थर हो। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक,शैक्षिक, राजनैतिक विषमता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करने में बहुत हद तक उपन्यासकार को सफलता प्राप्त हुई है।
दलितों के लिए रामलाल के कारण बस्ती में स्कूल तो खुलता है 'नूतन प्राइमरी स्कूल' नाम से ..पर यहाँ कोई भी अध्यापक पढ़ाने के लिए तैयार नहीं होता। क्योंकि वे सभी अध्यापक  सवर्ण जाति के थे। सुनीत नूतन प्राइमरी स्कूल में 500 में 450 अंक लेकर पास हुआ था। चमार टोला की बस्ती के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। जब वह इसी स्कूल में पढ़ाई कर रहा था तब उसने पाठ्यक्रम के एक किताब में चित्र देखा था। जिसमें एक ब्राह्मण प्याऊ पर लोटे से पानी पीला रहा है। जब की दलितों को चमड़े से बनी नलकी से पानी पिलाया जाता था। वास्तव में कुछ और तथा पाठ्यक्रम में कुछ और देख कर सुनीत के भीतर जिज्ञासा और विद्रोह के स्वर जागते हैं। जब सुनीत, मास्टर चौबे तथा बस्ती के लोग प्याऊ पर जाते हैं और पंडित जी से सागर से पानी पिलाने की बात करते हैं। इस पर पंडित कहता है ,
"पर तुम तो …।
पंडित जी के ओंठो तक आते-आते शब्द जैसे ठहर गए थे। जिन्हें स्वयं सुनीत ने पूरा किया था।
"हाँ-हाँ पंडित जी, हम ढेढ़ चमार है।"9
सुनीत को ढेढ़ चमार होने के कारण उपेक्षा, अपमान, घृणा को सहना पड़ा था। पर वह हार नही मानता बल्कि उल्टा उसमें व्यवस्था के विरोध में आक्रोश प्रकट होता है। स्कूल में उससे कोई बात नही करना चाहता है। उसे दलित होने का खामयाजा भुगतना पड़ता है। वह कक्षा में खूब मन लगा कर पढाई करता है पर हर बार वह स्कूल में दूसरे नंबर पर ही आता है। आखिर उसके साथ ऐसा क्यों होता है? क्योंकि सवर्ण कभी भी यह नही चाहते थे कि उनके स्कूल से कोई दलित प्रथम आये। इसीलिए चार-पांच सवर्ण अध्यापक मिलकर राकेश कुमार तथा नगरपालिका कार्यालय अधीक्षक का बेटा अजय शर्मा को स्कूल में प्रथम लाया जाता है। वास्तव में वे कतई यह नहीं चाहते थे कि दलित पढ़े लिखे। यदि वे पढ़ लिख गए, तो उनकी गुलामी के षड्यंत्र को पहचान लेगें। उनका समाज सुधर जाएगा। तो झाड़ू-पोछा आदि गुलामी वाला काम कौन करेगा? मोहनदास नैमिशराय उपन्यास  के माध्यम से मुक्ति के सवाल पर चुप्पी को तोड़ा है साथ ही आर्य समाज एवं डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर जी के विचारों से प्रभावित उपन्यासकार द्वारा 'शिक्षा से ही सामाजिक विषमता से बाहर निकला जा सकता है' स्वर उपन्यास में उभरता हुआ नजर आता है। 'मुक्ति पर्व' उपन्यास में संघर्षशील दलित परिवार की विषमता, दोहरी गुलामी, शिक्षा, संघर्ष और संगठन के विविध पक्ष उभरकर सामने आते हैं। भारतीय समाज की विषमता में अपने उलझाव के साथ दलित पात्र अपने आत्मविश्वास से जीना सीखते हैं।
दलित और तथाकथित सवर्ण समाज की कुछ मान्यताएं परस्पर विरोधी हैं। सभ्य समाज के लिए जो हेय है, दलित समाज के लिए वह श्रेय भी हो सकता है। सभ्य समाज (हिंदू और मुसलमान दोनों) के लिए घृणित और अछूत जानवर है—सूअर, किंतु दलित-भंगी समाज में इसका महत्त्व गौ माता से कम नहीं है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में— "शादी-ब्याह, हरि-बीमारी, जीवन-मृत्यु सभी में सूअर की महत्ता थी। यहां तक की पूजा-अर्चना भी सूअर के बिना अधूरी थी। आंगन में घूमते सूअर गंदगी के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समृद्धि के प्रतीक थे, जो आज भी वैसे ही हैं।"10 सूअर की महत्ता को स्थापित करने के लिए रूपनारायण सोनकर ने ‘सूअरदान’ (उपन्यास) लिखा है। दलित विमर्श में जब सूअर का जिक्र आता है, तो नागार्जुन की कविता ‘पैने दांतों वाली’ जेहन में कौंध जाती है। महाकवि की निगाह में ‘यह भी तो मादरे हिंद की बेटी’ है। इस कविता में सूअर शेरनी है। रूपनारायण सोनकर के पास अमानवीय समाज है और उस अमानवीयता को काटने के लिए सोच की पैनी कलम। लेखक ने अपने अन्दर और बाहर के यथार्थ को जिस तरह समेटा है उसमें विकृत व्यवस्था, भ्रष्ट तंत्र, विकलांग लोकतंत्र और अमानवीय समाज के त्रासद विवरण मौजूद हैं, जो चमत्कृत नहीं करते बल्कि उदास और क्रोधित करते हैं। लेखक रूप नारायण सोनकर के ‘सूअरदान’ उपन्यास के पात्र रामचंद्र त्रिवेदी, सज्जन खटिक, घसीटे चमार और सलवंत यादव उत्तर प्रदेश के सिंहासन खेड़ा गांव में एक पिगरी फार्म खोलते हैं। ये चारों इंग्लैंड से उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त हैं और गांव के विकास के लिए अपना जीवन अर्पण करते हैं। चारों मानवतावादी सोच के हैं तथा विश्व बंधुत्व में यकिन रखते हैं। दूसरी तरफ आपराधिक प्रवृति का एक ग्राम प्रधान है जो अपने आतंक के बल पर गांव में राज करता है तथा अपना विरोध करने वाले लोगों का कत्ल करा देता है। वह अपंग है और ह्वील चेअर पर चलता है। समाज विरोधी व वर्चस्व की समस्त गतिविधियां बावजूद अपंगता वह अपने सहयोगियों के साथ व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे संपन्न कराता है। वह गांव के एक कमजोर वर्ग की लड़की का अपहरण कराकर उसे रखैल बना लेता है। वह प्रेग्नेंट हो जाती है। यह उपन्यास का सुपर विलेन है। पिगरी फार्म के पार्टनर अपने पिगरी फार्म में अमेरिका के वैज्ञानिकों की मदद से नये-नये वैज्ञानिक प्रयोग करते रहते हैं।

सूअर और गाय के संगमन से एक नयी ब्रीड सूगाय उत्पन्न करते हैं। यह एक हाई ब्रीड है। लेखक द्वारा मानव के प्रथम दो अक्षर-मान और जानवर के अंतिम दो अक्षर-वर तो मिलाकर मानवर संज्ञा गढ़ा गया है। यह उपन्यास सूअरदान में पहली बार आया शब्द है, किसी शब्दकोश में नहीं है। उपन्यास सूअरदान में भयंकर बीमारियां हवा के माध्यम से फैलती हैं, सूअरदान का एक पात्र सज्जन खटिक अमेरिका के न्यू जर्सी शहर में भारतीय मूल के डॉक्टर स्नेही लाल से मिलता है। पूजारी दयाशंकर की लाइलाज बीमारी एड्स का इलाज करवाता है। हिंदी दलित उपन्यास यह सामाजिक सरंचना की तह में जाकर पूरे समाज की न केवल पड़ताल करता है बल्कि उसमें छुपी हुई विसंगतियों को उजागर कर उसके प्रतिकार और परिष्कार का प्रयत्न भी करते हैं। सुअरदान उपन्यास में यह देख सकते है, 'तीन बेटियों का मानना था आदमी जाति से नहीं बल्कि कर्म से बड़ा होता है। जातिवाद, ऊँच-नीच की भावना समाज में यह कोढ की तरह है। यदि इसका इलाज न किया गया तो पूरा समाज रोगी बन जायेगा।' भारतीय संदर्भ में यह वर्ण-व्यवस्था का विरोध करके समरस समाज के साथ-साथ मानव मात्र की गरिमा को स्थापित करना चाहता है। सामाजिक संकीर्णता और विसंगितों से मानव मात्र को मुक्त करना तथा दलित पीड़ित मानवता को समानता व सम्मान दिलाना ही इस उपन्यास का उद्देश्य हे। इसलिए प्रथमत: और अंतत: भी इसके लक्ष्य और सरोकार समाजबोध ही है। दलित कहानियों की तुलना में दलित उपन्यासों की संख्या कम होने के बावजूद भी इनकी जड़े काफी गहरी हैं। इनमें सामाजिक यथार्थ को सही मायने में सामने लाने की क्षमताएं मौजूद हैं। प्रारम्भिक दलित उपन्यासों पर बात की जाए तो दलित उपन्यासकारों के उपन्यासों में डॉ.रामजी लाल सहायक के 'बंधन मुक्ति' उपन्यास में दलित पात्र शिवराज चमार बहादुर लड़का है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से कमजोर है। वह विद्यालय में सभी छात्रों से खेलकूद से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक आगे रहता है। जब शिवराज सिंह के पिता का देहावसान होता है तो बिरादरी वाले मृत्यु भोज की मांग करते हैं। शिवराज मृत्यु भोज का विरोध करते हुए गैर जरूरी बताता है। वह अपनी बहन लीला को भी शिक्षा दिलाता है। गाँव का चौधरी लीला से अपने बेटे की शादी करना चाहता है लेकिन शिवराज दलित चेतना के कारण मना कर देता है।  शिवराज पर सवर्ण समाज वाले तरह-तरह के झूठे आरोप लगाते हैं। अंत में वह सामाजिक बन्धनों से मुक्ति पाकर दलित अधिकारी की बहन से स्वयं शादी करता है और दलित अधिकारी से अपनी बहन की शादी करवाता है। दंगली प्रसाद वरुण का 'अमर ज्योति' उपन्यास दलित अमर और सवर्ण ज्योति दोनों के मिलन से आगे बढ़ता है। दोनों ही मेडिकल कॉलेज के सहपाठी हैं। दोनों के विचारों में छोटी-बड़ी जातियों के प्रति समानता के भाव दिखाई देते हैं। अमर भाग्य, भगवान, अंधविश्वास और कुरूतियों में कोई विश्वास नहीं रखता बल्कि कहता है कि कुछ स्वार्थी लोगों ने अपने आराम के लिए यह सब बना दिया है। जिससे ज्योति और अमर एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। ज्योति दलित बस्ती में जाकर अमर के घर पानी पीती है। अन्त में दोनों कोर्ट मैरिज करते हैं। लेकिन ज्योति का पिता विरोध करता है। डॉ. धर्मवीर के ‘पहला खत’ उपन्यास में लेखक ने अज्ञात सखी के नाम से केरल राज्य की विभिन्न समस्याओं को उभारा है। वर्तमान समय की बुराइयों की आलोचना करते हुए दलित अफसरों को फटकारते हैं। नारी विषयक विचारों और उनकी समस्याओं को भी सामने लाते हैं। जयप्रकाश कर्दम के छप्पर’ उपन्यास में दलित सुक्खा और रमिया के माध्यम से दलितों की संवेदना को सामने लाया है। सुक्खा अपने बेटे चन्दन को शिक्षा प्राप्ति के लिए शहर भेजता है, लेकिन सवर्ण जाति के लोग दलित शिक्षा प्राप्ति का विरोध करते हैं। गाँव में पंचायत होती है और चन्दन के पिता सुक्खा को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। प्रेम कपाडिया के ‘मिट्टी की सौगंध’ उपन्यास में दलितों पर हो रहे अन्याय का विरोध सामने आया है। गाँव के जमींदार मदन सिंह की हवेली में दलित औरतों के शरीर से खिलवाड़ किया जाता है। मदन सिंह का लड़का बृजेन्द्र अपने पिता के कारनामों से दुखी होता है। वह अपने पिता का लगातार विरोध हुए, पैतृक सम्पत्ति भी छोड़ देता है। हम देखते हैं कि एक पिता अपने बेटे को मरवाने का पूरा प्रयत्न करता है लेकिन मरवाने से पहले ही पिता को गिरफ्तार कर लिया जाता है। जयप्रकाश कर्दम के ‘करुणा’, सत्यप्रकाश के ‘जस-तस भई सवेर’, कावेरी के ‘मिस रमिया’, अजय नावरिया के ‘उधर के लोग’ उपन्यासों में भी कुछ इस प्रकार की दलित समस्याएं सामने आती है।
'आज बाजार बंद है' वेश्याओं के जीवन पर केन्द्रित एक यथार्थवादी उपन्यास है। यथार्थवादी इस अर्थ मंय है कि इसमें नैमिशराय के निजी जीवन के अनुभवों को दस्तावेजित किया गया है। मोहनदास नैमिशराय ने 'आज बाजार बंद है' उपन्यास लिखा और वेश्या जीवन को इसका कथ्य बनाया तो इसका कारण क्या है? उन्हीं के शब्दों में, "वेश्याओं के जीवन, संघर्ष तथा उनकी समस्याओं पर लिखने का लंबं समय से मन था। इसलिए कि राष्ट्र की बेटियों पर वैसा उपन्यास लिखा नहीं गया। हालाँकि उन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। कुछ लेखक-कथाकारों ने तो बहुत करीब से उनके दुख-दर्दों को देखा और समझा हुआ है। बावजूद इसके उनके जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर नये सिरे से लिखने की आवश्यकता थी। वेश्या वृत्ति से जुड़े फिल्मों और किताबों में वेश्याओं तथा रक्कासाओं के पात्रों को ग्लेमराइज्ड करके प्रस्तुत करने की परंपरा रही है।"11 वे आगे लिखते हैं कि पुरुष की शारीरिक भूख मिटाने के लिए भारतीय समाज और विशेष रूप में हिन्दू समाज ने वेश्यावृत्ति को जायज माना है। इस उपन्यास की प्रमुख नायिका पार्वती है, किन्तु मुख्य नायिका के सिवाय पायल, शबनम, हसीना, मुमताज, बीना, सलमा, चंपा, गुलाब, रूखसाना, फूल, शम्मी, हमीदा, चमेली, जीनत, जरीना, हाजरा, सुमन आदि अनेक वेश्याएँ हैं। जाहिर है कि ये उन वेश्याओं के असली नाम नहीं हैं और वेश्या-जीवन अपनाने के बाद दिए गए नकली नाम है। किन्तु उनकी परिस्थितियाँ सही हैं और इनमें से अधिकांश दलित वर्ग की या मुस्लिम हैं और धोखे से या मजबूरी में यह जीवन जी रही हैं।
देश में ऐसे बहुत कम महापुरुष हुए हैं जिन्होंने वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिए आंदोलन किए। बाबा साहब आंबेडकर उनमें प्रमुख हैं। उनके अनुयायियों ने भी वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिए बाबा साहब के आंदोलन को यथासंभव आगे बढाया। किन्तु कुछ एन.जी.ओ. तथा सरकार अप्रत्यक्ष रूप से जैसे हथियार डाल चुकी है और वेश्या-जीवन को स्वीकृति देकर उसे उद्योग का दर्जा एवं वेश्याओं को सेक्सवर्कर का दर्जा देने को आतुर हैं। समय-समय पर वेश्यावृत्ति को कर्मवाद और भविष्यवाद के सनातनी विचार से भी जोड़ा जाता रहा है। यानी कि स्वीकार कर लिया गया है कि इस स्थिति को बदला नहीं जा सकता। वेश्यावृत्ति कभी भी खत्म नहीं की जा सकनेवाली प्रवृत्ति है। तो कुछ लोग इसे स्वस्थ समाज के लिए जरूरी भी समझते हैं। वे आगे लिखते हैं कि पुरुष की शारीरिक भूख मिटाने के लिए भारतीय समाज और विशेष रूप में हिन्दू समाज ने वेश्यावृत्ति को जायज माना है। वेश्याओं के उत्सव और उनकी मान्यताओं का भी उपन्यासकार ने सजीव चित्रण किया है, "बंबई से उत्तरी भारत के एक शहर में वह लायी गई तो उत्सव धमिता से धीरे-धीरे जुड़ने लगी। दक्षिण भारतीय होने के नाते वह लायी गई तो उत्सव होते थे। उन उत्सवों पर अभी भी मातृसत्तात्मक समाज का प्रभाव था। जहाँ योनी पूजा होती थी। वर्षाऋतु के आगमन पर वेश्एँ अपने-अपने आँगन में आग जलाती और गीत गाते हुए अपने नीचे के कपड़े को उठाकर अपनी-अपनी योनियों को आग में तापती थी। इसके पीछे मान्यता थी कि वे योनि को पवित्र करती है। दक्षिण में लिंग पूजा का चलन नहीं था। अधिकांश औरतें योनि पूजा करती थी। पार्वती स्वयं गर्मियाँ के बाद इस अनुष्ठान को करती थी। देखा-देखी मुमताज और साधना भी करने लगी थी। धीमी आंच में योनि की सिकाई करते हुए एक अजीब तरह की तृप्ति के साथ रोमांच भी होता था। वे गीत गाते हुए आग से आग का रिश्ता बनाती।"12 इस तरह ‘आज बाजार बंद है’ नारी उत्पीडन विशेषकर दलित नारी उत्पीडन के उस काले इतिहास को प्रस्तुत करता है जिसमें दलित देवदासियों से लेकर वेश्याओं के जीवन की दुखभरी कहानी है।
सुमीत ‘आज बाजार बंद है’ उपन्यास का मुख्य नायक है। उसका प्रवेश उपन्यास में बहुत कुछ बाद में होता है। वह पत्रकार है और अलीगढ़ से काम की तलाश में आया था। लेखक होने के अलावा वह पत्रकारिता भी करता है। इसी वजह से वह वेश्या जीवन को निकट देख पाता है। उनके निकट आने के कारण ही उसे उनके जीवन की सच्चाई को करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है। उसे वेश्या जीवन और परिवार में अन्य सामान्य भारतीय परिवारों में कोई मूलभूत फर्क नजर नहीं आता। वेश्याओं के जीवन, उनकी वाणी उनका व्यवहार सब आम गृहिणियों जैसा ही है। दूसरी तरफ सभ्य घराने की यवतियाँ एवं महिलाएँ अपने शौक को पूर्ण करने के लिए होटलों में कालगर्ल्स के रूप में छिपकर देह-व्यापार करती है। पार्वती और सुमीत दोनों एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। किन्तु उनका आकर्षण शारीरिक नहीं, वैचारिक समानता का है। पार्वती का दुख जानने के बाद सुमीत उसे भोगना नहीं मुक्त करना चाहता है। वह कहता है, "तुम बहुत जल्दी इन पिंजरों से मुक्त हो जाओगी।"13 मोहनदास नैमिशराय की दृष्टि बहुत पैनी है उन्होंने बड़ी बारीकी से इसका वर्णन किया है। ‘आज बाजार बंद है’ उपन्यास में देवदासियों से लेकर वेश्याओं तक की व्यथा कथा है। जिसमें दलित वेदना और दलित चेतना के साथ-साथ दलित जीवन दिखाई देता है। अस्मिता और भटकाव के दोहरेपन से उनके उभरने के प्रयास से सामाजिक सरोकार का रास्ता भी दिखाई देता है। उपन्यास में दलित समाज की बेटियों के जीवन के हर पहलू को सामने लाया गया है। वेश्याओं की सीलन भरी कोठरियाँ, सौंदर्यप्रसाधन, अंग भंगिमा, ग्राहकों की हरकत, पुलिस की परेशानियाँ, ब्राह्मण देवता की कामलीला, लोगों की अंधश्रद्धा, अज्ञानता, वेश्याओं के उत्सव उनकी मान्यताओं आदि का ऐसा जीवंत चित्रण किया है मानो ये सारे चित्र चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम रहे हों।

बहुचर्चित दलित चिंतक व साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, 'महानायक बाबा साहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर' पर ऐतिहासिक उपन्यास लेकर आये हैं। बाबा साहेब पर यह पहला उपन्यास है, जिसमें बाबा साहेब की जिन्दगी को बड़े ही सहज व सरल शब्दों में पिरोया गया है, साथ ही सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और शैक्षिणक सहित अन्य पहलूओं पर बाबा साहेब से जुड़ी तमाम बातों को ईमानदारी के साथ नैमिशराय जी ने रेखांकित करने की पूरजोर कोशिश करते हुए दलितों की मुक्ति चाहते हैं। ‘महानायक बाबा साहेब डॉ.आम्बेडकर’ पुस्तक ऐतिहासिक उपन्यास के रूप में पाठकों के बीच है, जो दलित संवेदना व अस्मिता को समेटे हुए है। भारतीय समाज में खास कर दलितों के बीच मजबूती के साथ आज भी वे खड़े दिखते हैं। दलित समाज को आज भी इनके विचार, सिद्धांत-सोच, मार्गदर्शन करते मिलते हैं। दलितों के साथ-साथ समाज के अन्य वर्गो में भी बाबा साहेब के विचार महत्व रखते है। कहने में परहेज नहीं कि बाबा साहेब आम्बेडकर किसी खास परिचय के मोहताज नहीं हैं। ऐसे में उन्हें लेकर एक उपन्यास का आना थोड़े देर के लिए चैंकाता जरूर है। उपन्यासकार मोहनदास नैमिशराय का दावा है कि बाबा साहेब के बारे में कई ऐसे अनछुहे पहलू हैं जिसे हम नहीं जानते हैं। वे लिखते हैं, 'बाबा साहेब डॉ.आम्बेडकर के सम्पूर्ण जीवन और ऐतिहासिक, राजनीतिक, समाजिक, शैक्षणिक घटनाओं पर आधारित तथ्यपरख और दलित अस्मिता से जुड़ी किसी भी भाषा में यह पहला उपन्यास है, यहां तक मराठी भाषा में भी दलित बुद्धिजीवियों के द्वारा भी एक अदद कादम्बरी की रचना भी ना हो सकी। वे, सबिता आम्बेडकर की पुस्तक डॉ.आम्बेडकरांचा सहवासत को ही बाबा साहेब के जीवन पर आधारित उपन्यास बताते रहे, स्वयं भी गफलत में रहे और पाठकों को भी गफलत में रखे रहें।' मोहनदास नैमिशराय ने उपन्यास की शुरूआत उस जीवन संघर्ष से की है, जिससे आज भी दलितों को झेलना पड़ता है वह है ‘दलित’ होना। पढ़े-लिखे आम्बेडकर जब बड़ौदा रियासत में नौकरी की शुरूआत के लिए आये और एक पारसी के सराय में ठहरे तो, उन्हें दलित होने का एहसास दिलाते हुए लोगों ने सराय को तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। विदेश में पढ़कर आने के बावजूद उनके साथ जो व्यवहार समाज ने किया उससे उनकी आत्म रो पड़ी लेकिन बाबा साहेब ने हार नहीं मानी और अपना संघर्ष जारी रखा।
दलितों के साथ कल और आज जो व्यवहार होता आ रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। घोषित व अघोषित रूप में हाताल में ज्यादा सुधार नहीं दिखता। दिखता है तो कुछेक लोगों के ही आगे आने का सवाल। दलित होने की पीड़ा साफ दिखती है। इसे बाबा साहेब ने झेला और अपनी पीड़ा भी बयान किया। उपन्यासकार ने डॉ.भीमराव आम्बेडकर के जीवन संघर्षो की दास्तां को कहानी की तरह प्रस्तुत किया है। इसमें डॉ.भीमराव आम्बेडकर के भीवा रामजी आम्बेडकर से डॉ.भीमराव आम्बेडकर बनने की पूरी गाथा है। दर्जनों हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें/पत्र-पत्रिकाएं, शोध पत्रों को आधार बना कर उपन्यास को सार्थक और प्रमाणिक दस्तावेज बनाने का अनूठा प्रयास किया गया है। डॉ.भीम राव आम्बेडकर के शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक संधर्षो का यह एक ऐसा दस्तावेज है, जो उनके हर कदम के संधर्षो को नयन पटल पर, ऐसे रख जाता है मानों अभी की घटना हो! समाज में व्याप्त बराबरी और गैरबराबरी के सवाल से जूझते डॉ.आम्बेडकर की पीड़ा आज भी प्रासंगिक दिखती है जब इस मुद्दे पर डॉ.भीमराव आम्बेडकर का महात्मा गांधी से विमर्श होता है। उपन्यास विचारों के द्वंद के साथ कई सवालों को लेकर आया है। खासकर, दलित संवेदना को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। पुस्तक, बाबा साहेब के जीवन संघर्ष पर केंद्रित है, जो दलित वर्ग के लिए उत्पे्ररक के रूप में है और अन्य वर्ग को बताता है कि दलित वर्ग किसी से कम नहीं है। उपन्यास में कई जगह, समाज के सड़े-गले ब्राह्मणवादी व्यवस्था से नायक को दो-चार होते देखा गया है। नायक का बौद्ध बनना भी इसी की कड़ी है। सामाजिक स्तर पर बाबा साहेब के कार्यों को प्रभावित करने का भी प्रयास हुआ। इस उपन्यास में सशक्तता के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दलित जीवन उभर कर सामने आता है जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक मुक्ति है।
दलित उपन्यासों में मात्र अपनी व्यथा की कथा कहने वाला साहित्य नहीं है, बल्कि वह मनुवादी व्यवस्था व सवर्णों के व्यवहार में छिपे वर्ण संस्कार का खुलासा भी करता है| डॉ. हरिनारायण ठाकुर लिखते हैं- "दलित साहित्य की अन्य विधाओं की तरह दलित उपन्यासों में भी नकार और विरोध का समाजशास्त्र सक्रिय है। इसके केन्द्र में परिवर्तन की चेतना है।"14 यह सवर्णों की जाति विषयक मानसिकता को झकझोरता है तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रभाव को सामने लाता है। दलित उपन्यास मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है। किसी भी उत्पीडि़त समुदाय की मुक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में वो क्या सोचता है? कोई भी उत्पीडि़त समाज अगर सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है, वो कभी मुक्त नहीं हो सकता, जब तक कि वो दूसरे उत्पीडि़त समाजों की मुक्ति के बारे में भी न सोचे, उनके प्रति एक सही रवैया न रखे, उनके साथ मिलकर चलने को तैयार न हो। दलित उपन्यासों में शैक्षणिक शोषण, आर्थिक शोषण, धार्मिक बहिष्कारों, सांस्कृतिक कूपमंडूकता तथा भारतीय गांवों में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था और सामन्ती व्यवस्था में पीसते दलितों की हाहाकार है। वहीं छोटे शहरों, महानगरों में बसे तथा सरकारी नौकरियों से जीवन-निर्वाह करते अधिकारियों, क्लर्कों की व्यथा कथाएँ तो हैं ही, साथ ही दलितों में उभरते आक्रोश, विरोध और संघर्ष की तीब्र चेतना भी है, जो समाज में परिवर्तन और समानता का संकेत दे रही है। दलित उपन्यास भारतीय समाज में समता व स्वतंत्रता का पक्षधर है। मनुष्य की अस्मिता एवं सम्मान को सर्वोपरि मानता है। भारतीय समाज व्यवस्था को दलितों की विपन्नता, निरक्षरता, सामजिक उत्पीड़न, विद्वेष, हीनताबोध, गरीबी, दुख का कारण मानता हैं। क्योंकि भारतीय समाज व्यवस्था ने दलितों पर सिर्फ अस्पृश्यता ही नहीं थोपा बल्कि उन पर कड़े और कठोर दंड भी लागू किए जिसे धर्म, सत्ता और साहित्य ने अपना समर्थन दिया है। हिंदी दलित उपन्यास यह सामाजिक सरंचना की तह में जाकर पूरे समाज की न केवल पड़ताल करता है बल्कि उसमें छुपी हुई विसंगतियों को उजागर कर, प्रतिकार और परिष्कार का प्रयत्न भी करता है। अतः दलित उपन्यासों में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर जीवन में व्याप्त देवदासी प्रथा, जोगता प्रथा, अंधविश्वास, रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, मद्यपान की लत, अश्लीलता, अस्मिता और भटकाव, शैक्षणिक भेदभाव, दलित आरक्षण, दलित चेतना, और दलित संघर्ष जैसी समस्याएं उभरकर सामने आती हैं।

सन्दर्भ सूची 

1. नैमिशराय मोहनदास, मुक्तिपर्व, संस्करण-2011, अनुराग प्रकाशन ,नई दिल्ली,  पृष्ठ संख्या-64
2. सत्यप्रेमी डॉ.पुरुषोत्तम, दलित अस्मिता और हिंदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या- 24
3. छप्पर, पृष्ठ संख्या-38
4. छप्पर, पृष्ठ संख्या-44
5. समकालीन भारतीय साहित्य, अंक 158, पृष्ठ 154
6. मुक्ति-पर्व, पृष्ठ संख्या-65
7. मुक्ति-पर्व, पृष्ठ संख्या-19
8. मुक्ति-पर्व, पृष्ठ संख्या-24
9. मुक्ति-पर्व, पृष्ठ संख्या-54
10. जूठन, पृष्ठ संख्या- 24
11. आज बाजार बंद है, मोहनदास नैमिशराय, पृ. 5
12. आज बाजार बंद है, मोहनदास नैमिशराय, पृ. 64
13. आज बाजार बंद है, मोहनदास नैमिशराय, पृ. 87
14. ठाकुर डॉ.हरिनारायण, दलित साहित्य का समाजशास्त्र, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या- 495


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
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