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मैं ग़मों से घिरा हुआ हूँ कई सदी से 
तुम आना कभी तो नज़र उतार देना 

माँ नहीं रही तो कमी बहुत खलती है 
तुम आना तो मेरा आँगन बुहार देना 

अँधेरों का शागिर्द ही हो गया हूँ जैसे 
रौशनी सा तुम मेरा जीवन सुधार देना 

वक़्त सारा उड़ गया काम-काजों में 
मुझे भी अब कोई खाली इतवार देना 

जिसे चाहा बस वही मेरा न हो पाया 
मुझे न अब कोई रिश्तों का बाज़ार देना 

तू चाहता है कि साँसें कुछ दिन और चलें 


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मुझे मैकदों की खबर दे,अभी प्यालों को खबर न दे  
मैं खुद को खोना चाहता हूँ ,उजालों की खबर न दे 

उलझ के रह गया गया हूँ ज़माने की रहबरी में ही 
सुलझाने में कुछ वक़्त लगेगा,ख्यालों की खबर न दे 


सो गयी है सारी दुनियादारी,मैं भी सोना चाहता हूँ 
मेरी नींद,मेरे ख़्वाबों को तो नालों* की खबर न दे 

जो मिला है वही बहुत मिला, इसका बहुत शुकून है 
मेरे मिज़ाज़ को दो वक़्त सही,मलालों की खबर न दे 

जो जवाब मिले मुझे तुझसे,बहुत चुभते है आज भी 
मैं अपनी बात तो कह लूँ,नए सवालों की खबर न दे 



लेखक सलिल सरोज के बारे में संक्षिप्त जानकारी के लिए क्लिक करें।



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दरिया भी देखा,समन्दर भी देखा और तेरे आँखों का पानी देख लिया
दहकता हुश्न,लज़ीज नज़ाकत और तेरी बेपरवाह जवानी देख लिया

कचहरी,मुकदमा,मुद्दई और गवाह सब हार जाएँगे तेरे हुश्न की जिरह में
ये दुनियावालों की बेशक्ल बातें देखी और तेरे रुखसार की कहानी देख लिया

किताबें सब फीकी पड़ गयी  तेरी तारीफ के सिलसिले हुए शुरू ज्योँ ही
चौक-चौराहे और गली-मोहल्ले में तेरी क़यामत के चर्चे बेज़ुबानी देख लिया

तुमसे मिलने से पहले तक कितनी बेरंग थी मेरी तमाम हसरतें नाकाम
तुमसे मिलके मैंने कायनात में गुलाबी,नीली,हरी और आसमानी देख लिया

तुम चलो जहाँ हवाएँ चल पड़ती हैं और रुको ज्यों तो धरती रो पड़ती है
तुम्हारा रहम देखा,तुम्हारा करम देखा और तुम्हारे हुश्न की मनमानी देख लिया


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"प्यार की मजार पे चढ़ाए गए फूल भी फूल ही होते हैं,जो  बीतते वक़्त के साथ मुरझाने लगते हैं। जो फूल कभी अपनी खुशबू के लिए प्रेयसी के बालों में झूमा करते हैं, वो दिन बदलते ही किसी चौराहे पे अपरिचित की तरह दुत्कार दिए जाते हैं"
दिव्या और संभव ने अपने प्यार की शुरुआत खुशनुमा मौसम में खिले फूल की तरह की थी। जिसकी महक में दोनों ने अपने ग़म भुला कर एक नई जिंदगी की शुरुआत की थी। दिव्या और संभव एक ही एम एन सी में साथ साथ एक ही शिफ्ट में काम करते थे। एक ही डेस्क जॉब होने के कारण दोनों में नज़दीकियाँ बढ़ीं और दोनों परिणय सूत्र में बँध गए। "शादी से पहले किए गए वायदे सावन की बौछारों की तरह होते हैं ,जब तक गिरते रहते हैं राहत देते हैं और रूक जाने पर उमस बढ़ाकर बेचैन कर देते हैं"।शादी से पहले संभव ने दिव्या के साथ घर के हर काम करने की कसमें खाई थीं और हर कदम पर उसका साथ देने की जिम्मेदारी भी उठाई थी। वहीं दिव्या ने संभव को एक गृहस्थ जीवन की हर खुशी देने और एक बेहतरीन जीवन साथी बनने की कसमें खाईं थी।
महत्वाकांक्षा अगर जीवन को सुखी बनाने हेतु की जाए तो अच्छी है और अगर उसे दूसरों से आगे बढ़ने का जरिया बना लिया जाए तो परिणाम बहुत ही भयानक सिद्ध होता है।दिव्या और संभव दोनों जवानी की दहलीज पर अपने लिए सब हासिल करना चाहते थे। अच्छा घर,अच्छी सैलेरी,अच्छा खान-पान,अच्छी गाड़ी और वो सभी भौतिक सुविधाएँ जो उन्हें अपने दोस्तों से आगे खड़ा कर सके।"रेस में दौड़ने वाले को पता होता है कि जीत में क्या मिलेगा लेकिन अक्सर ये पता नहीं होता कि जीत कर भी क्या हार जाएँगे। रेस जीतने वाले कई बार रिश्तों की मिठास भूल जाते हैं। दिखावा इस कदर हावी हो जाता है कि खुद को पहचानने के लिए आइने की आवश्यकता महसूस होती है।"दिव्या और संभव को 2 साल के लिए विदेश में इंटर्नशिप के लिए अलग देशों में भेजा गया। दूर से रिश्ते निभाना उतना ही कठिन है जितना कि पास होके रिश्ते ना निभाना। पहले दोनों  फोन पे, इंटरनेट पे बातें किया करते थे। मिलते भी थे 15-20 दिनों में। पर काम बढ़ता गया और दूरियाँ भी । विदेश की चकाचौंध ,खुला जीवन और अनियंत्रित जीवन शैली ने दोनों की ज़िन्दगियों पर प्रतिकूल असर डाला। संभव ने सिगरेट,शराब पीना शुरू कर दिया। रात को देर तक जागना और पैसों की बेवजह खपत से उसकी सारी बैंक बैलेंस खत्म होती जा रही थी। वहीं दिव्या अकेलेपन की ज़िन्दगी से ऊब कर नए दोस्त तलाश करने लगी। संभव का फोन उठाना बंद कर दिया। झूठ बोलना शुरू कर दिया।
महत्वाकांक्षा ने दोनों को पारीवारिक सुखों से वंचित कर दिया था। दोनों की शादी को 4 साल होने को थे। दिव्या का शरीर काम से थक चुका था,मन कहीं न कहीं मरता जा रहा था। संभव का जिस्म शराब की लत में पड़कर गल चुका था। जिन बच्चों को देख कर संभव का चेहरा खिल उठता था ,अब अपनी असमर्थता को देख कर ,अपने बच्चे नहीं कर पाने की कोफ़्त से जल उठता था।
आज दिव्या और संभव अपने दोस्तों के बीच भौतिक सुख में काफी आगे खड़े थे। लेकिन मात्र 30 साल की उम्र में उनके चेहरे का रंग और शरीर का ढाँचा खत्म हो चुका था।
"शहरी जीवन अगर संतुलित न हो तो,वो आयु आधी जरूर कर देता है"। इंटर्नशिप खत्म करके जब दोनों वापस आए तो दोनों की आँखों में बस एक ही सवाल था-"हमारा प्यार,हमारे महत्वाकांक्षा के आगे इतना छोटा कैसे पड़ गया। हम एक दूसरे को क्यों नहीं समझ पाए। एक दूसरे को क्यों नहीं बाँध पाए।"
और दोनों के दिमाग में बस यही उत्तर घूमता रहा-"काश हमने सिर्फ प्यार को जिया होता,महत्वाकांक्षा को नहीं।"



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क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा
अपनी बेबसी पर दिन-रात रोता रहा ।।1।।

भाईचारे की मिठास इसे रास नहीं आई
गलियों और मोहल्लों में दुश्मनी बोता रहा ।।2।।

बेटियों की आबरू बाज़ार के हिस्से आ गई
शहर अपना चेहरा खून से धोता रहा ।।3।।

दूसरों की चाह में अपनों को भुला दिया
इसी इज्तिराब में अपना वजूद खोता रहा ।।4।।

जवानी हर कदम बेरोज़गारी पे बिलखती रही
सदनों में कभी हंगामा,कभी जलसा होता रहा ।।5।।

बारिश भी अपनी बूँदों को तरस गई यहाँ
और किसान पथरीली ज़मीन को जोता रहा ।।6।।

महल बने तो सब गरीबों के घर ढ़ह गए