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मन श्याम रंग विचार में रच,  भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत , चित्त रोअत है अभिभूत  बन। 

धरे हाथ सुंदर बाँसुरी , कसे केश अपने मयूर पंख 
जग कहत जिनको त्रिकालदर्शी , हो प्रतीत ह्रदय निकट।

मन श्याम रंग विचार में रच, भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत , चित्त रोअत है अभिभूत बन....   

बन बिम्ब मेरी वो खड़ा , पत्थर की प्रतिमा में कहीं 
है झाँकता मन में मेरे , बन ह्रदय की धड़कन-सा मेरे। 

ब्रह्माण्ड मुख में समात है , पर चरण धरती पर धरत 
जग का तू पालनहार , पर पालत माँ है, यशोदा बन। 

मन श्याम रंग विचार में रच, भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत , चित्त रोअत है अभिभूत बन....  

छुप-छुप के माटी खात है , जो धरती तेरे तन बसी 
लीलायें अद्भुत करता है ,जो मन को शीतल हैं लगत। 

दिनभर क्रीडायें  करत है, बन लाल गोकुल का मेरे   
माखन चुराये घर में जाकर, गोपियों  के साँवरे। 

यशोदा है झिड़कत नित-पहर, नट्खट बड़ा है साँवरे 
लीला दिखाए हर घड़ी , जानत यशोदा बावरे।  

मन श्याम रंग विचार में रच, भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत , चित्त रोअत है अभिभूत बन....  

भर आँख आवत याद कर, ममता यशोदा के तले 
रज से भरे मैदान सब, कालिंदी तट से थे लगे। 

मन श्याम रंग विचार में रच, भूलत है सबको  अभी 
कुछ नींद में सपने सजत , चित्त रोअत है अभिभूत बन.... 


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर 'एकल्वय' नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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ज़मीन के हाथों की लकीर जब उकेड़ी गयी 
कहीं लाश,कहीं लहू,कहीं सिसक पाई गयी 

आसमान भी कोई बहुत  दूर तलक  न था
उसके दामन में भी दुखती नब्ज़ पाई गयी 

सरफिरे हवाओं के घुमड़ते  उड़ते लटों में 
ग़ुमनाम स्याह रातों की दास्तान पाई  गयी 

चाँद के पूरे शबाब का जब नक़ाब हटा तो
अमावस के परछाई  की  ज़ुबान पाई गयी 

सूरज के तेवर सारे नरम पड़ गए यकायक 


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उसने इज्तिराब में न जाने क्या ठुकरा दिया 
अपनी  किस्मत  को  ही धूल  में उड़ा दिया 

दो घड़ी को भी तुम्हारी उल्फत न रह सकी
जिसको  चाहा  उसी  को बेकार बना दिया  

तुम्हारी बदमस्ती कौन सा सैलाब लेके आए 
पल में हमनशीं, पल  में बीमार बना दिया 

मोहब्बत  एक उफ़क , एक वफ़ा माँगती है 
तुमने तो इन  सबको  ही  बाज़ार बना दिया 

तुम्हारे फरेब  दिल  को  ये  हिदायत है मेरी
मैंने  चाहा  तो हूर  नहीं तो  बेनूर बना दिया


लेखक सलिल सरोज के बारे में संक्षिप्त जानकारी के लिए क्लिक करें।



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तू वक़्त की तरह मुझ में गुज़र जाता अगर
मैं फिर से जी उठता और संवर जाता अगर

वही अलसाई भोर, सोया दोपहर, थकी रात
मिलती मुझे और मैं भी कहीं खो जाता अगर

बेफिक्री की कुछ साँसें और थमी हुई नब्ज़
तड़प मेरा भी बेचैन हो कर घुट जाता अगर

ख्वाहिशों का बोझ,नाकामयाबियों की चुभन
मेरे सपनों के सामने थोड़ा झुक जाता अगर

मेरा कोफ़्त खुद ही सिसक के रह जाता


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बस यूं ही आहत मन से भारत धर्मी समाज के प्रमुख डॉ.  नंद लाल मेहता वागीश जी से मन की व्यथा कही थी।"" 'पूजा' को प्रतिबंधित करतीं कोलकाता में दीदी जी ,चप्पल धोती दीदी जी।"" ताकि मोहर्रम का जुलूस शांति से निकल जाए फिर चाहे जो हो सो हो ....और बस वागीश जी ने पूरा इतिहास उड़ेल दिया ,राष्ट्रीय उद्बोधन के संग -संग कर्तव्यबोध से च्युत दिखती दीदी जी को उनका कर्तव्य भी याद करवा दिया बंगला गौरव भी उनका दुर्गेश रूप भी। इस कविता के माध्यम से जो हुंकार बन के उठी है और करुणा से संसिक्त हो प्रार्थना  के स्वरों में ढ़ल गई है :

धोती चप्पल दीदी जी | 

ऐसा कर्म नसीबी  जी || 

(१)

झांसी झपटी अंग्रेज़न  पर ,

टूट पड़ी तुम कमरेडन पर | 

कमर तोड़ दी उनकी ऐसी ,

अब तक करते सी सी सी || 

मत भूलो कोलकाता है ,

भारत गर्व सुहाता है ,

माँ गौरी और माँ काली ,

इन के बिन क्या बंगला री | 

इनकी आस -निरास करोगी ,

तुष्टि हेतु घास चरोगी | 

काम न आएं चाँद सितारे ,

सूरज का उपहास करोगी | 

राजनीति यह छिछली जी ,

कुछ तो सोच करो सीधी | 

धोती चप्पल दीदी जी ||  


(२)

कोलकाता का अपना मानक ,

अपना वेष और अपना बानक | 

मिल -फोटो में जल्दी क्या थी ,

माया -जीव देख लिपटी -सी | 

ईस्ट इंडिया भारत आई ,

मॉम इठलिया साथ जमाई | 

पर के सपने, सपने हैं ,

अपने तो फिर अपने हैं। 

राम, रवींद्र, नरेन काली ,

भाषा कितनी मधुराली | 

करो न ऐसा, रूठे काली ,

आज की कुर्सी कल खाली | 

फिर क्या बैठ करीसी जी,

इतनी समझ करीबी जी | 

धोती चप्पल दीदी जी ||  


(३)

वोट बड़ा या देश बड़ा ! 

मन का प्रश्न कहीं गहरा | 

देश बचा तो प्यार मिलेगा ,

ज्यों वर्षा -जल -भीगी जी | 

धोती चप्पल दीदी जी | | 


प्रस्तुति : वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा ), पूर्व -व्याख्याता भौतिकी, यूनिवर्सिटी कॉलिज, रोहतक एवं प्राचार्य राजकीय स्नाक्तोत्तर कॉलिज, बादली (झज्जर ), हरियाणा।