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गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में
तो आज  हुई न होती मुरब्बत ज़माने में ।।1।।

गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में
तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।।2।।

जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी
वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।।3।।

बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए
सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।।4।।

रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से
कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।।5।।

एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में
अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।।6।।

दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था
यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।।7।।

वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में
देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।।8।।

जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है
नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।।9।।

गर बाप हो तो  जरूर समझ जाओगे कि
कितना दर्द होता है बच्चियाँ रुलाने में ।।10।।

जो गया यहाँ से  वो कभी लौटा ही नहीं
अब कौन मदद करे उजड़े गाँव को बसाने में ।।11।।

माँ तो पाल देती है अपनी सब ही संताने
पर बच्चे बिफ़र जाते हैं माँ को समझ पाने में ।।12।।



लेखक सलिल सरोज के बारे में संक्षिप्त जानकारी के लिए क्लिक करें।



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लेखक : डॉ वागीश मेहता, राष्ट्रीय विचारक, भारत धर्मी समाज

(१ )

संसद ठप्प करने का काम, ऊपर से आया पैगाम,
हम तो चाकर बिना दाम के, कहते आला जिसे कमान। 

(२) 

नामित निर्वाचित कर भेजा, किया साथ में यह फरमान,
ऐसी तैसी सबकी कर दो, देश का जीना करो हराम। 
अरे उचक्कों कुछ तो कर दो, दहले पर नहला ही जड़ दो, 
आस और विश्वास है दोनों, ढ़ाई-चावल का बढ़ेगा दाम।
जिस मुखबिर को पाक में भेजा, वह लाया था यह पैगाम, 
हल्ला- हल्ला हो-हल्ला बस, करो इसे आदेश मानके,
अफवाहों में पैर लगा दो, भ्रम हिंसा उलटी ख़बरें,
सेकुलर घोड़े बिना लगाम, संसद को कर दो हलकान||

(३ ) 

कंकर मणि भयंकर नाम ,सावरकर का नाम हटाया,
किया शहीदों का अपमान, यूं  पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसके,
पुरखे करते थे ये काम, हो अँगरेज़ या मुगली मालिक,
कदम बोसी कर खबरें देना और झुककर फरसी सदा सलाम।

(४ )

हल्ला करते बिना प्रयोजन ,और न लेते अल्प विराम ,
हाई -कमान की ऐसी मंशा हम तो ताबे हुकम गुलाम। 
वर्ण साँकरी वंश  हमारा ,गूगल दर्ज़ हैं सभी प्रमाण,
गाज़ी कौन ,कौन गंगाधर ,क्यों कर डीएनए पहचान।| 



प्रस्तुति : वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा), सेवानिवृत्त प्राचार्य, गमेण्ट पोस्टग्रेजुएट कालिज, बादली, झज्जर (हरियाणा)


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  • काव्य संग्रह में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ 42 कविताएं
  • ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है ध्रुव सिंह 'एकलव्य' का




मेरठ। बनारस निवासी ध्रुव सिंह ‘एकलव्य’ द्वारा रचित काव्य-संग्रह चीख़ती आवाज़ें का लोकापर्ण रविवार को किया गया। प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित काव्य-संग्रह का विमोचन समारोह सहयोगी कंपनी निक्स इंफोटेक के माधवपुरम स्थित कार्यालय पर किया गया। विमोचन समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार डा. फखरे आलम खान ‘विद्यासागर’ ने काव्य-संग्रह की कुछ कविताओं को पढ़ा और कहा कि इन कविताओं में एकलव्य ने समाज की कुरीतियों पर बहुत ही गंभीरता से चोट किया है। डा.खान ने लेखक ध्रुव सिंह एकलव्य को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मुझे आशा ही नही पूर्ण विश्वास है एकलव्य भविष्य में हिन्दी के सतम्भ के रूप में अपनी जगह बनायेंगे।
इस दौरान प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के डायरेक्टर राजेन्द्र सिंह बिष्ट ने कहा कि साहित्य दुनिया में ध्रुव सिंह एक उभरता सितारा है जिनकी कविताओं में आम भाषा का प्रयोग हुआ है। जो वास्तव में एक अच्छा प्रयोग है और इसके अलावा उन्होने समाज की कुरीतियों को बहुत ही प्रभावी ढंग से कविता रूपी माला में पिरोया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उन्होने समाज को आईना दिखाने वाला बहुत ही कीमती काव्य-संग्रह दिया है।
राजेन्द्र सिंह बिष्ट डायरेक्टर प्राची पब्लिकेशन ने कहा कि हमारा मकसद उभरती प्रतिभाओं को इंटरनेट एवं प्रिन्ट दुनिया से जोड़कर नये लेखकों को हिन्दी जगत में सम्मान दिलाना है। इस दौरान निक्स इंफोटेक के डायरेक्टर तुषार सिंह, शुभम कुशवाहा, युवा अंग्रजी साहित्यकार डा. अमता खान, अक्षय सिंह व अन्य स्टाफ मौके पर मौजूद रहा।


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प्राचीन समय में भारत में कपिलवस्तु नाम की एक बड़ी सुन्दर नगरी हुआ करती थी। उस समय राजा शुद्धोदन वहां राज्य करते थे। जो बड़े धार्मिक और न्याय-प्रिय राजा थे। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया था।
जब सिद्धार्थ बड़े हुए, तो एक बार वे मंत्री-पुत्र देवदत्त के साथ धनुष-बाण लिए घूम रहे थे। संध्या समय था। सूर्य अस्त हो रहा था। आकाश में लाली छा गई थी। बड़ा मनोहर दृश्य था। पक्षी आकाश में उड़े जा रहे थे। सहसा सिद्धार्थ की दृष्टि दो राज-हंसों पर पड़ी और देवदत्त से बोले- देखो भाई, ये कैसे सुन्दर पक्षी है। देखते ही देखते देवदत्त ने कान तक खींचकर बाण चलाया और उनमें से एक पक्षी को घायल कर दिया। पक्षी भूमि पर गिरकर छटपटाने लगा। सिद्धार्थ ने आगे बढ़कर उसे अपनी गोद में ले लिया और पुचकारने लगा। देवदत्त ने अपना शिकार हाथ से जाते देख सिद्धार्थ से कहा कि इस पर मेरा अधिकार है, इसे मैंने मारा है। सिद्धार्थ ने राजहंस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेशक तुमने इसे मारा है, परन्तु मैंने इसे बचाया है, इसलिए यह पक्षी मेरा है।
राजकुमार सिद्धार्थ ने पक्षी की सेवा की उसकी मरहम-पट्टी की और उसे चारा दिया। समय पाकर पक्षी स्वस्थ होने लगा। फिर एक बार देवदत्त ने सिद्धार्थ से कहा कि मेरा पक्षी मुझे दे दो, परन्तु सिद्धार्थ नहीं माना। लाचार हो देवदत्त ने महाराज के पास जाकर न्याय की पुकार की। महाराज ने दोनों को दरबार में बुलाया।
राजकुमार सिद्धार्थ राजहंस को गोद में लिए हुए राज-दरबार में पहुँचे। पक्षी डर के मारे कुमार के शरीर से चिपट रहा था। महाराज ने देवदत्त से पूछा कि अब तुम अपनी बात कहो। इस पर देवदत्त ने कहा- महाराज! इस पक्षी को मैंने अपने बाण से मारा है, इसलिए इस पर मेरा अधिकार है। आप चाहें तो कुमार सिद्धार्थ से ही पूछ लें।
महाराज की आज्ञा पाकर राजकुमार सिद्धार्थ ने खड़े होकर माथा झुकाकर नम्रता से कहा- हे राजन्, यह तो ठीक है कि यह पक्षी देवदत्त के बाण से घायल हुआ है, पर मैंने इसे बचाया है। मारने वाले की अपेक्षा बचाने वाले का अधिक अधिकार होता है, इसलिए यह पक्षी मेरा है।
अब राजा बड़ी सोच में पड़े। देवदत्त का अधिकार जताना भी ठीक था और सिद्धार्थ का भी। राजा कोई निर्णय न कर सके। अंत में एक वृद्ध मन्त्री ने उठकर कहा कि हे महाराज! इस पक्षी को सभा के बीच में छोड़ दिया जाए। दोनों कुमार बारी-बारी से इसे अपने पास बुलाएं। पक्षी जिसके पास चला जाए, उसी को दे दिया जाए। यह विचार सबको पसंद आया।
अब पक्षी को सभा के ठीक बीच में छोड़ दिया गया। एक कोने पर सिद्धार्थ खड़े हुए और दूसरे कोने पर देवदत्त। पहले देवदत्त की बारी थी, उसने पक्षी को बड़े प्रेम से बुलाया, परन्तु वह डर के मारे उससे और दूर हट गया। ज्यों-ज्यों वह बुलाए, पक्षी डर से सिकुड़ता जाए। अंत में देवदत्त हताश हो गया, अब कुमार सिद्धार्थ की बारी थी। ज्यों ही उन्होंने प्यार भरी आँखों से पक्षी की ओर देखकर हाथ फैलाया और उसे बुलाया, वह धीरे-धीरे चलता हुआ अपने बचाने वाले की गोद में आकर बैठ गया। हंस सिद्धार्थ को दे दिया गया।
कुमार सिद्धार्थ उस पक्षी की दिन-रात सेवा करने लगे। कुछ दिनों बाद राजहंस पूर्ण स्वस्थ होकर उड़ गया।


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  • देशभर से 24 लेखकों को पंखुड़ियाँ (कहानी संग्रह) में विशेष प्रक्रिया द्वारा किया गया शामिल
  • पंखुड़ियाँ कहानी संग्रह राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय ई-बुक स्टोर्स पर पाठकों के लिए उपलब्ध

मेरठ। आज प्राची डिजिटल पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पंखुड़ियाँ : 24 लेखक और 24 कहांनियाँ (कहानी संग्रह) राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय ई-बुक स्टोर्स पर रिलीज हो गई है। जिनमें Google Play, Kobo, Kindle, iBooks, Smashwords, Scibd, Playster प्रमुख ई-बुक स्टोर्स है।
इस कहानी संग्रह में देशभर के विभिन्न राज्यों और शहरो से 24 लेखकों ने अपनी रचनाओं का सहयोग दिया है। पंखुड़ियाँ कहानी संग्रह में लेखकों ने समाज की विभिन्न घटनाओं को सरल और पाठकों को समझ में आ सकने वाली भाषा में लिखा है। इस संग्रह के लिए लेखकों को विशेष चयन प्रक्रिया द्वारा चयनित किया गया था, जिसमें उनकी रचनाओं को हमारी संपादकीय टीम की कसौटी पर उतरना था। इन 24 लेखकों में प्रमिला वर्मा (जबलपुर, मध्य प्रदेश), इंजी. आशा शर्मा (बीकानेर, राजस्थान), पम्मी सिंह (नई दिल्ली), पल्लवी सक्सेना (पूने, महाराष्ट्र), नीतू सिंह (नई दिल्ली), विकेश निझावन (अम्बाला, हरियाणा), रविन्द्र सिंह यादव (नई दिल्ली), डा. फखरे आलम खान (मेरठ उत्तर प्रदेश), सुधा सिंह (नवी मुम्बई, महाराष्ट्र), ऋतु असूजा (ऋषिकेष, उत्तराखंड), आशुतोष तिवारी (फतेहपुर, उत्तर प्रदेश), रोनी ईनोफाइल (नई दिल्ली), श्वेता सिन्हा (जमशेदपुर, झारखंड), रोली अभिलाषा (लखनऊ, उत्तर प्रदेश), अर्पणा बाजपेई (जमशेदपुर, झारखंड), निशान्त (लखनऊ, उत्तर प्रदेश), शालिनी गुप्ता (गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश), अनु लागुरी (झारखंड), देव कुमार (हाथरस, उत्तर प्रदेश), धर्मेन्द्र राजमंगल (अलीगढ़, उत्तर प्रदेश), सुधा देवरानी (देहरादून, उत्तराखंड), अमित जैन 'मौलिक' (जबलपुर, मध्यप्रदेश), आशीष कमल श्रीवास्तव (विजयवाड़ा, आन्ध्र प्रदेश), आबिद रिज़वी (मेरठ, उत्तर प्रदेश) है।
संग्रह में सभी कहानियाँ अपने आप में बहुत कुछ बयां करती है। संग्रह में प्रकाशित कहानियों में 24 लेखकों ने 24 विषयों को लेकर अपना दृष्टिकोण दिया है। निश्चित ही पाठको को सभी कहानियां बेहद पंसद आयेंगी। कहा जाये तो संग्रह की सभी कहानियां पाठकों को रोमांच, रहस्य और कल्पना की नई दुनिया में ले जायेगी, क्योंकि इन कहानियों में लेखकों ने अपने अनुभव को पूरी तरह से उड़ेल दिया है। अब बाकी तो पाठक ही इस संग्रह के बारे में अपने विचार प्रकट कर सकते है।
प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के प्रबंधक व पार्टनर राजेन्द्र सिंह ने सभी लेखको को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हमने सिर्फ एक कल्पना की थी कि यदि प्रिन्ट में कहानी संग्रह प्रकाशित हो सकते है तो ई-बुक फार्मेट में क्यों नही। जिसका नतीजा पंखुड़ियाँ के रूप में आपके सामने है। इसमें सभी लेखकों का सहयोग हमें प्राप्त हुआ है, जो प्राची डिजिटल पब्लिकेशन के लिए गर्व की बात है क्योंकि यहां पर कुछ युवा लेखक है तो कुछ प्रख्यात लेखक है तो कुछ प्रख्यात ब्लॉगर भी है। इसके अलावा पत्रकार, गृहणी उपन्यासकार भी इस संग्रह का हिस्सा बने है।

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