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इस बदन को यूँ ना खरोंचो,
मेरी आत्मा को तुम ना नोंचो,
क्या कर रहे हो कुछ तो सोचो,
मुझे मेरे वस्त्र दे दो।।।।

अभी तो चलना सीख रही हूँ,
मैं दर्द में हूँ चीख रही हूँ,
अपनी इज़्ज़त की मांग भीख रही हूँ,
मुझे मेरे वस्त्र दे दो।।।।

किसी को कुछ भी बता ना पाउंगी,
पल पल तड़पूंगी, आंसू छुपा न पाउंगी,
कोई अपनाएगा नहीं, कहाँ जाऊँगी,
मुझे मेरे वस्त्र दे दो।।।।

छोटे छोटे हिस्सों में चिर जाउंगी,
टूट कर टुकड़ों में बिखर जाउंगी,
जियूंगी कैसे, मैं मर जाउंगी,
मुझे मेरे वस्त्र दे दो।।।।


ग़ाज़ियाबाद की शालिनी गुप्ता एक नयी लेखिका है। हाल ही में प्राची डिजीटल पब्लिकेशन की आेर से प्रकाशित होने वाली ई-बुक पंखुड़ियाँ में भी लेखिका की एक कहानी शामिल है।


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1

कुछ आगे बैठे नेहरू है
कुछ पीछे दुबके कलाम है
इस प्रांगण के हर कक्ष में 
भारत का भविष्य विराजमान है 
कुछ बीच के टाटा है
हर विषय के ज्ञाता है
कुछ शिक्षकों के प्रिय विद्यार्थी
तो कुछ हमेशा क्षमा के प्रार्थी 
इस विद्यालय के आंगन में खेलते 
भारत के भाग्य विधाता है"

2

"घर वो जा चुके है
जो रहते थे यहां
अब मुझे घर नही
वो कहते है मकाँ"

"सुनसान हुए स्थान को एकांत करते है
मेरी चौखटों में दीमक
और दरवाजो पर ताले लटकते है
ये मकड़ी और छिपकली
आजकल मुझे अपना घर समझते है"

"इस आंगन में तुलसी उगी थी
चंपा चमेली संग संग खिली थी
वहां अब दूर तलक दूब बिछी है, 
जिसमे कुछ घरेलू, कुछ जंगली है"


देवेश प्रधान युवा कवि है जो वर्तमान में मेरठ में निवास कर रहे है। आपसे 8979353969 पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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'मेरा डायनामाइट दुनिया में शांति के लिए होनेवाले हजारों सम्मेलनों से भी जल्दी शांति ला देगा।’ —अल्फ्रेड नोबेल
एक ऐसा विलक्षण कोश जो 116 सालों में बदली दुनिया का आईना हैं।
डायनामाइट का आविष्कार करनेवाले 'पागल वैज्ञानिक’ ने जब अपनी वसीयत में एक ऐसी संस्था स्थापित करने की बात कही, जिससे 'उन लोगों को पुरस्कार (राशि) बाँटे जाएँ, जिन्होंने मानव जाति के लिए अपनी सेवाएँ प्रदान की हों’, तो यकीनन उनका सपना विश्व शांति ही था। लेकिन इसके बावजूद विवाद लगातार सामने आते रहे। सोवियत रूस की सरकार ने सखारोव को 'शांति पुरस्कार’ दिये जाने का विरोध जताया, तो चीन ने दलाई लामा को पुरस्कार दिये जाने पर। फिर भी नोबेल पुरस्कारों की स्वीकार्यता या इनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। सौ वर्षों से भी अधिक समय से इन पुरस्कारों की निरंतरता अपने-आपमें एक अद्भुत करिश्मा है।
'नोबेल पुरस्कार कोश’ का उद्देश्य है नोबेल पुरस्कारों के संबंध में पाठकों को पर्याप्त और प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराना। इस कोश में नोबेल पुरस्कारों के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के साथ ही उससे जुड़े विवादों व अन्य तथ्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। चिकित्सा, भौतिकी, रसायन, साहित्य, शांति और अर्थशास्त्र के लिए दिये जानेवाले नोबेल पुरस्कार के 1901 से 2016 तक के विजेताओं के नाम, परिचय के साथ पुरस्कार के मद्देनजर उनके कार्य का विस्तृत ब्यौरा इस कोश में संकलित हैं। पुरस्कार विजेताओं की सूची के साथ ही पुरस्कृत संस्थाएँ, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित महिलाएँ, दो बार पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों, एक ही परिवार के पुरस्कृत विजेताओं, मरणोपरांत पुरस्कार प्राप्त करनेवालों, पुरस्कार लेने से मना करने वालों इत्यादि की भी विस्तृत व प्रामाणिक जानकारी इस कोश में उपलब्ध कराई गई है।
इससे पहले नोबेल पुरस्कार के बारे में इतनी अधिक और परिपूर्ण जानकारी देनेवाला कोई कोश हिन्दी में उपलब्ध नहीं था। इस दिशा में यह अपने-आपमें बहुत बड़ा प्रयास है। 116 वर्षों के अनूठे इतिहास को सँजोए यह कोश पाठकों के लिए संग्रहणीय है।

संपादक अशोक महेश्वरी के बारे में

9 अक्टूबर, 1957 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे अशोक महेश्वरी ने रूहेलखंड विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी साहित्य) की पढ़ाई पूरी की। वे 1974 में प्रकाशन की दुनिया में सक्रिय हुए। 1978 में 'वाणी प्रकाशन’ का कार्यभार सँभाला। इसे सफलता की राह में तेजी से आगे बढ़ाते हुए 1988 में हिन्दी के प्रमुख प्रकाशनों में एक 'राधाकृष्ण प्रकाशन’ का कार्यभार भी सँभाला।
1991 में 'वाणी प्रकाशन’ की जिम्मेदारी से अलग हो गए। 1994 में हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान 'राजकमल प्रकाशन’ के प्रबन्ध निदेशक बने। 'राजकमल’ और 'राधाकृष्ण प्रकाशन’ को प्रगति-पथ पर आगे बढ़ाते हुए 2005 में 'लोकभारती प्रकाशन’ का भी कार्यभार सँभाला। फिलहाल वे हिन्दी के तीन प्रमुख साहित्यिक प्रकाशनों के समूह 'राजकमल प्रकाशन समूह’ के अध्यक्ष हैं।
इनकी कुछ बालोपयोगी पुस्तकें काफी चर्चित हैं।

संपादक रमेश कपूर के बारे में

14 नवम्बर, 1957 को दिल्ली में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे रमेश कपूर एक कहानीकार, अनुवादक व समीक्षक हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक हैं और स्वतंत्र रूप से लेखन, अनुवाद और सम्पादन के क्षेत्र में कार्यरत हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ व समीक्षात्मक लेख लिखने के इलावा पिछले चार वर्षों में वे अब तक अंग्रेजी व पंजाबी भाषा से हिन्दी में लगभग चालीस पुस्तकों का अनुवाद कर चुके हैं। परमवीर चक्र विजेताओं के जीवन पर आधारित पुस्तक के अतिरिक्त उनके द्वारा लिखित बच्चों की चार पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य।

आईएसबीएन -13 -978-81-8361-862-5
प्रकाशक  : राधाकृष्ण प्रकाशन 
संपादक : अशोक महेश्वरी रमेश कपूर
भाषा : हिंदी
बाइन्डिंग : हार्डबाउंड 
मूल्य : 1995/-
प्रकाशित वर्ष : 2017
पेजेज : 696


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मौन हृदय के आसमान पर
जब भावों के उड़ते पाखी,
चुगते एक-एक मोती मन का 
फिर कूजते बनकर शब्द।

कहने को तो कुछ भी कह लो
न कहना जो दिल को दुखाय,
शब्द ही मान है, शब्द अपमान
चाँदनी, धूप और छाँव सरीखे शब्द।

न कथ्य, न गीत और हँसी निशब्द
रूंधे कंठ प्रिय को न कह पाये मीत,
पीकर हृदय की वेदना मन ही मन 
झकझोर दे संकेत में बहते शब्द।

कहने वाले तो कह जाते हैं  
रहते उलझे मन के धागों से,
कभी टीसते कभी मोहते 
साथ न छोड़े बोले-अबोले शब्द।

फूल और काँटे,हृदय भी बाँटे
हीरक, मोती, मानिक, माटी, धूल,
कौन है सस्ता, कौन है महँगा 
मानुष की क़ीमत बतलाते शब्द।


श्वेता सिन्हा जी कवि व नियमित ब्लॉगर है अौर जिनका ब्लॉग 'मन के पाखी' बहुत प्रसिद्व है। आपसे E-Mail : swetajsr2014@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 
कि रुक जा ऐ दिल 
थोड़ा मचल जाता हूँ 

नफ़रत है मुझको भी, मधुशाला से
चौख़ट पर आकर तेरी 
थोड़ा सा बदल जाता हूँ  

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

मोहब्बत एक ज़हर, इल्म है हमको 
क्या करूँ ऐ दिल-ए -नादां 
होंठों से लगाता हूँ 

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

तूने किया ज़ालिम, रुख़्सत मेरी रूह को 
बड़ा ही बेआबरू कह कर 
क़ब्रिस्तान में सोता हुआ 
इश्क़ फ़रमाता हूँ

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ  

चिराग़े रौशन करते हैं वो 
मेरी क़ब्र पे आकर कभी -कभी 
नफ़रत से ही सही, ज़न्नत में आ गया 
ख़ुद को फुसलाता हूँ

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर 'एकल्वय' नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका के पास सुरक्षित है।