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नौ दिन से चले आ रहे विश्व पुस्तक मेले का कल अंतिम दिन था मगर  पुस्तकप्रेमियों के उत्साह में अभी भी कोई कमी नही दिखाई दी। भारी संख्या में लोगों ने मेले में शिरकत की। राजकमल प्रकाशन समूह के मंच पर दिन के  पहले कार्यक्रम में ख़्वाजा अहमद अब्बास की चयनित कहानियों के संकलन 'मुझे कुछ कहना है' का लोकार्पण हुआ। इस किताब का एक खास आकर्षण  ख़्वाजा अहमद अब्बास  का एक साक्षात्कार है जिसे किसी और ने नही, कृशन चंदर ने लिया था। दूसरे कार्यक्रम मे सुधीर चंद्र कि किताब 'बुरा वक्त अच्छे लोग' का लोकापर्ण और परिचर्चा भी की गयी।
इस साल पुस्तक मेले की थीम मानुषी को भी ध्यान में रखके राजकमल प्रकाशन प्रत्येक दिन महिला लेखिकाएं जैसे अनुराधा बेनीवाल, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा और कृष्णा सोबती जैसे नामचीन लेखकों को अपने मंच पर लाये।
राजकमल प्रकाशन मंच पर जिसने लोगों को सबसे ज्यादा लुभाया वह था एक अनोखी स्कीम  सेल्फी पॉइंट 'हिंदी है हम' जहां पर पुस्तकप्रेमी फोटो लेकर फेसबुक पर  #RajkamalBooks पोस्ट करने पर किताबों पर 5% की अतिरक्त छूट ले रहे थे।
नौ दिन तक चले विश्व पुस्तक मेले में राजकमल प्रकाशन द्वारा वर्षा दास के तीन  नाटक -खिड़की खोल दो, चहकता चौराहा और प्रेम और पत्थर, कुसुम खेमानी की किताब 'जड़िया बाई'  गीत चतुर्वेदी की 'न्यूनतम मैं', दिनेश कुशवाह की 'इतिहास में अभागे', आर. चेतनक्रांति की 'वीरता पर विचलित', प्रेम रंजन अनिमेष की 'बिना मुंडेर की छत', राकेश रंजन की 'दिव्य कैदखाने में', विवेक निराला की 'धुव्र तारा जल में', सविता भार्गव की 'अपने आकाश में', समर्थ वशिष्ठ की 'सपने मे पिया पानी', मोनिका सिंह की 'लम्स', प्रकृति करगेती की 'शहर और शिकायतें' और पवन करण की 'इस तरह मैं' अल्पना मिश्र की किताब 'स्याही में सुर्ख़ाब के पँख'  क्षितिज रॉय का  उपन्यास 'गंदी बात' जैसे उपन्यासों के लोकापर्ण हुए।


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विश्व पुस्तक मेले के आठवें  दिन राजकमल प्रकाशन के मंच में कार्यक्रम में कथाकार अल्पना मिश्र की किताब 'स्याही में सुर्ख़ाब के पँख'  का लोकपर्ण हुआ और साथ ही उन्होंने अपने  उपन्यास पर  प्रेम  भारद्वाज से  बातचीत की। आठवे दिन के दूसरे कार्यक्रम में क्षितिज रॉय का उपन्यास 'गंदी बात' का लोकार्पण गीतकार प्रशांत इंगोले और प्रशांत कश्यप  ने किया और उन्होंने लेखक से किताब पर परिचर्चा की। गीतकार प्रशांत इंगोले को वाजिब मशहूरियत मैरी कॉम और बाजीराव मस्तानी फिल्मों के गानों से मिली है 'गंदी बात' राधाकृष्ण प्रकाशन के 'फंडा' उपक्रम  से प्रकाशित है। फंडा आम पाठकों के लिए मनोरंजन प्रधान, स्तरीय कथा साहित्य का प्रकाशन करता आया है।


बातचीत के दौरान गीतकार प्रशांत इंगोले  ने कहा कि लोग समझते है कि मैं हिंदी भाषा में कमजोर हूँ । फिर कैसे  मैने बाजीराव मस्तानी का सुपरहिट गाना मलहारी लिखा। मैं यहां यह बताना चाहता हूँ कि मेरी हिंदी कमजोर जरूर है मगर भारत मे बोली जाने वाली बेसिक हिंदी मुझे अच्छी तरह आती है, जो कि हर भारतीय को आती है। गंदी बात उपन्यास के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि किताब मैने अभी तक पढ़ी नही मगर उपन्यास का शीर्षक देख के कह  रहा हूँ  कि इसे मैं जरूर पढूंगा और मेरी तरफ से लेखक को उनके उपन्यास के लिए बहुत बहुत बधाई।
उपन्यास के बारे मैं कहते हुए लेखक क्षितिज रॉय ने कहा कि गंदी बात वह नही जो सब लोग समझते है, आज के जमाने मे गंदी बात हर जगह है राजनीती से लेकर क्रिकेट के मैदान तक, बच्चों से लेकर बुढों तक। जिसे कहते हैं सब गंदी बात, क्या होती है वाकई वह गंदी-सी कोई बात। साथ ही उन्होंने कहा किताब को पढ़िए आपको जरूर पता चलेगा कहाँ-कहाँ है गंदी बात।


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आपदाएं
मार देती हैं किसानों को
ख़त्म कर देती हैं उनकी जिन्दगी
बरबाद कर देती हैं सारी फसल।
किसानों के दारुण हृदय की दर्द भरी
आवाज़
हृदय को झकझोर देने वाली,
आह...
इस ध्वनि से अथवा
किसी भयानक-बवंडर के आ जाने के
बाद का वह भयावह दृश्य,
जो एक किसान को उसके माथे पे हाथ रखने पर
मजबूर कर देता है,
और नैसर्गिकतया, न चाहते हुए भी
मुख से हाय यह शब्द निकल जाता है।
टूट जाता है,
सारे सपनों को टूटते हुए देख
बच्चे की फीस, अम्मा और बाबू जी के लिए दवाइयाँ
अगले माह बिटिया की सगाई
उसके लिए जेवर थोड़े बहुत
दहेज में गाड़ी,
उसके साथ पचास हजार नगद जैसे कई
जरूरी सपने
पर वह हार नही मानता
फिर से किसी के ढ़ाढस बंधाने पर खुद को मजबूत
करते हुए,
अपनी दूसरी फसल के बारे में सोंचने लगता है
किसान,
जैसे प्रथम पुत्र के मरणोपरांत दूसरे पुत्र के
बारे में सोंचते हैं लोग
और प्रवृत्त हो जाता है दूसरी फसल की
जुताई, बुआई, रोपाई में
पुनः लहलहाती फसलें खेतों में लहराने लगती हैं
किसान के चेहरे की वह प्रसन्नता जो
शदियों से खोई थी,
आज देखने को मिली उसके चेहरे पर।
अब वह नही चाहता इनसे दूर जाना
तनिक देर भी,
लगा रहता है निराई, गोड़ाई में,
स्पर्श करता है जब उन फसलों की
बालियों को,
लगता है पुचकार रहा हो अपने 2 साल के
पोते को जिससे निकलने लगी है
तुतलाहट भरी आवाज़,
कुछ ही दिनों के भीतर भर देता है
सारा कर्ज,
लोग कहते हैं वो देखो जा रहा है किसान
जो कभी सदमे में था।



नीलेन्द्र शुक्ल " नील " काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय से ग्रेजुएशन कर रहे है। लेखक का कहना है कि सामाजिक विसंगतियों को देखकर जो मन में भाव उतरते हैं उन्हें कविता का रूप देता हूँ ताकि समाज में सुधार हो सके और व्यक्तित्व में निखार आये। लेखक से ई-मेल sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।


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प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले के छठे दिन राजकमल प्रकाशन समूह के मंच पर पाठकों को कथाकार  शिवमूर्ति की नया कहानी संग्रह 'कुच्ची का कानून' का अंश पाठ सुनने को मिला। लेखक ने अपने उपन्यास पर प्रेम भारद्वाज के साथ बेबाक परिचर्चा की। दूसरे कार्यक्रम में राष्ट्रीय चैस चैम्पियन रह चुकी अनुराधा बेनीवाल ने अपनी बहुचर्चित किताब 'आज़ादी मेरा ब्रांड' पर लोगों के सामने कुछ अंश पढ़े तथा साथ ही लोगों के प्रश्नों के जवाब दिए।


इस दौरान अनुराधा बेनीवाल ने कहा कि हमारे यहां यह धारणा है कि यूरोप घूमना काफी ख़र्चीला है और यूरोप तो सिर्फ अमीर लोगो ही घूम सकते है, मगर ऐसा नही है और जब लड़की का घूमने का मामला हो तो फिर ये और पेचिदा हो जाता है। मैने यूरोप के करीब 36 देशों का भम्रण किया वो भी अकेले और लगभग एक लाख रूपये में।
'कुच्ची का कानून' के लेखक शिवमूर्ति ने कहा कि उनका यह उपन्यास एक औरत की कोख पर आधारित है जो विधवा होती है, मगर उसके गर्भ में पांच महीने का बच्चा होता है। समाज में यह अफवाह है कि यह बच्चा किसका है यही उपन्यास कि मूल कहानी है। आगे वो ये भी कहते हैं कि औरत को पूर्ण अधिकार है कि वह अपने गर्भ में किस पुरुष का बीज रखना चाहती है।
हिंदी में ग्रामीण कहानी की इमारत में शिवमूर्ति सबसे मजबूत दीवार हैं। 'कुच्ची का कानून' भी इसकी ताकीद करती है। इसकी शीर्षक कहानी 'कुच्ची का कानून' स्त्री सशक्तिकरण के इस दौर में गांव की एक स्त्री के सशक्त चरित्र के लिए याद किया जाएगा। शिवमूर्ति की कहानियों में नाटकीयता, संवाद बहुत जीवंत होते हैं। संग्रह की कहानियां उसका प्रमाण हैं।


छठे दिन भी राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर पुस्तकप्रेमियों के चलाई जा रही अनोखी स्कीम एक सेल्फी पॉइंट को लेकर लोगो का उत्साह अब भी बरकरार है। यहां सेल्फी पॉइंट पर 'हिंदी है हम' पर फोटो लेके फेसबुक पर #RajkamalBooks पोस्ट करने पर किताबों पर 5% की छूट मिल रही है।


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पच्चीसवे दिन सिंहासन में जड़ित पुतलियों से त्रिनेत्री नामक पच्चीसवीं पुतली जाग्रत हो उठी और बोली, राजन! राजा विक्रमादित्य प्रतापी और ज्ञानी होने के साथ दूरदर्शी भी थे, जो प्रजा के साथ पूरा न्याय करते थे। सूनो! मै तुम्हे उनकी एक कथा तुम्हे सुनाती हूॅ।
राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा के सुख दुख का पता लगाने के लिए कभी-कभी वेश बदलकर घूमा करते थे और खुद सारी समस्या का पता लगाकर निदान करते थे। उनके राज्य में एक दरिद्र ब्राह्मण और भाट रहते थे। वे दोनों अपना कष्ट अपने तक ही सीमित रखते हुए जीवन-यापन कर रहे थे तथा कभी किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं रखते थे। वे अपनी गरीबी को अपना प्रारब्ध समझकर सदा खुश रहते थे तथा सीमित आय से संतुष्ट थे। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, मगर जब भाट की बेटी विवाह योग्य हुई तो भाट की पत्नी को उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी। उसने अपने पति से कहा कि वह पुश्तैनी पेशे से जो कमाकर लाता है उससे दैनिक खर्च तो आराम से चल जाता है, मगर बेटी के विवाह के लिए कुछ भी नहीं बच पाता है। बेटी के विवाह में बहुत खर्च आता है, अतः उसे कोई और यत्न करना होगा।
भाट यह सुनकर हँस पड़ा और कहने लगा कि बेटी उसे भगवान की इच्छा से प्राप्त हुई है, इसलिए उसके विवाह के लिए भगवान कोई रास्ता निकाल ही देंगे। अगर ऐसा नहीं होता तो हर दम्पत्ति को केवल पुत्र की ही प्राप्ति होती या कोई दम्पति संतानहीन न रहते। सब ईश्वर की इच्छा से ही होता है। दिन बीतते गए, पर भाट को बेटी के विवाह में खर्च लायक धन नहीं मिल सका। उसकी पत्नी अब दुखी रहने लगी।
भाट से उसका दुख नहीं देखा गया तो वह एक दिन धन इकट्ठा करने की नीयत से निकल पड़ा। कई राज्यों का भ्रमण कर उसने सैकड़ों राज्याधिकारियों तथा बड़े-बड़े सेठों को हँसाकर उनका मनोरंजन किया तथा उनकी प्रशंसा में गीत गाए। खुश होकर उन लोगों ने जो पुरस्कार दिए उससे बेटी के विवाह लायक धन हो गया। जब वह सारा धन लेकर लौट रहा था तो रास्ते में न जाने चोरों को कैसे उसके धन की भनक लग गई। उन्होंने सारा धन लूट लिया। अब तो भाट का विश्वास भगवान पर था और उसके पास बेटी के ब्याह के लिए धन नहीं था। वह जब लौटकर घर आया तो उसकी पत्नी को आशा थी कि वह ब्याह के लिए उचित धन लाया होगा।
भाट की पत्नी को बताया कि उसके बार-बार कहने पर वह विवाह के लिए धन अर्जित करने को कई प्रदेश गया और तरह-तरह को लोगों से मिला। लोगों से पर्याप्त धन भी एकत्र कर लाया पर भगवान को उस धन से उसकी बेटी का विवाह होना मंजूर नहीं था। रास्ते में सारा धन लुटेरों ने लूट लिया और किसी तरह प्राण बचाकर वह वापस लौट आया है। भाट की पत्नी गहरी चिन्ता में डूब गई। उसने पति से पूछा कि अब बेटी का ब्याह कैसे होगा। भाट ने फिर अपनी बात दुहराई कि जिसने बेटी दी है वही ईश्वर उसके विवाह की व्यवस्था भी कर देगा। इस पर उसकी पत्नी निराशा भरी खीझ के साथ बोली कि लगता है, ईश्वर महाराजा विक्रम को विवाह की व्यवस्था करने के लिए भेजेंगे। जब यह वार्तालाप हो रहा था तभी महाराज उसके घर के पास से गुज़र रहे थे। उन्हें भाट की पत्नी की टिप्पणी पर हँसी आ गई।

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दूसरी तरफ ब्राह्मण अपनी आजीविका के लिए पुश्तैनी पेशा अपनाकर जैसे-तैसे गुज़र-बसर कर रहा था। वह पूजा-पाठ करवाकर जो कुछ भी दक्षिणा के रूप में प्राप्त करता उसी से आनन्दपूर्वक निर्वाह कर रहा था। ब्राह्मणी को भी तब तक सब कुछ सामान्य दिख पड़ा जब तक कि उनकी बेटी विवाह योग्य नहीं हुई। बेटी के विवाह की चिन्ता जब सताने लगी तो उसने ब्राह्मण को कुछ धन जमा करने को कहा। मगर ब्राह्मण चाहकर भी नहीं कर पाया। पत्नी के बार-बार याद दिलाने पर उसने अपने यजमानों को घुमा फिरा कर कहा भी, मगर किसी यजमान ने उसकी बात को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया। एक दिन ब्राह्मणी तंग आकर बोली कि विवाह खर्च महाराजा विक्रमादित्य से मांगकर देखो, क्योंकि अब और कोई विकल्प नहीं है। कन्यादान तो करना ही है। ब्राह्मण ने कहा कि वह महाराज के पास ज़रूर जाएगा। महाराज धन दान करेंगे तो सारी व्यवस्था हो जाएगी। उसकी भी पत्नी के साथ पूरी बातचीत विक्रम ने सुन ली, क्योंकि उसी समय वे उसके घर के पास गुज़र रहे थे।
सुबह में उन्होंने सिपाहियों को भेजा और भाट तथा ब्राह्मण दोनों को दरबार में बुलवाया। विक्रमादित्य ने अपने हाथों से भाट को दस लाख स्वर्ण मुद्राएँ दान की। फिर ब्राह्मण को राजकोष से कुछ सौ मुद्राएँ दिलवा दी। वे दोनों अति प्रसन्न हो वहाँ से विदा हो गए। जब वे चले गए तो एक दरबारी ने महाराज से कुछ कहने की अनुमति मांगी। उसने जिज्ञासा की कि भाट और ब्राह्मण दोनों कन्या दान के लिए धन चाहते थे तो महाराज ने पक्षपात क्यों किया। भाट को दस लाख और ब्राह्मण को सिर्फ कुछ सौ स्वर्ण मुद्राएँ क्यों दी। विक्रम ने जवाब दिया कि भाट धन के लिए उनके आसरे पर नहीं बैठा था। वह ईश्वर से आस लगाये बैठा था। ईश्वर लोगों को कुछ भी दे सकते हैं, इसलिए उन्होंने उसे ईश्वर का प्रतिनिधि बनाकर अप्रत्याशित दान दिया, जबकि ब्राह्मण कुलीन वंश का होते हुए भी ईश्वर में पूरी आस्था नहीं रखता था। वह उनसे सहायता की अपेक्षा रखता था। राजा भी आम मनुष्य है, ईश्वर का स्थान नहीं ले सकता। उन्होंने उसे उतना ही धन दिया जितने में विवाह अच्छी तरह संपन्न हो जाए। राजा का ऐसा गूढ़ उत्तर सुनकर दरबारी ने मन ही मन उनकी प्रशंसा की तथा चुप हो गया।

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