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मेरे अज़ीम मुल्क़ से ही मेरी पहचान है
मंदिर की घंटी,मस्जिद की अजान है

सब नेमतें अता कर दी मुझपे मेहरबां होके
मेरा मुल्क ही सिर्फ मेरे लिए भगवान है

माँ के आँचल की तरह हिफाज़त की है
हर ज़ख़्म से बचा लेगा,इतना इत्मीनान है

इन्द्रधनुष से भी ज्यादा रंग हैं इसके परिधान में
सबसे अजीमोशान इतिहास होने का गुमान है

दुनिया हर मोड़ इस ओर ताकती रहती है
ज्ञान,विज्ञान और ध्यान का बेजोड़ निशान है 



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वो गया दफ़अतन कई बार मुझे छोड़के 
पर लौट कर फिर मुझ में ही आता रहा 

कुछ तो मजबूरियाँ थी उसकी अपनी भी
पर चोरी-छिपे ही मोहब्बत  निभाता रहा 

कई सावन से तो वो भी बेइंतान प्यासा है 
आँखों के इशारों से ही प्यास बुझाता रहा 

पुराने खतों के कुछ टुकड़े ही सही,पर 
मुझे भेज कर अपना हक़ जताता रहा 

शमा की तरह जलना उसकी फिदरत थी 
पर मेरी सूनी मंज़िल को राह दिखाता रहा 



लेखक सलिल सरोज के बारे में संक्षिप्त जानकारी के लिए क्लिक करें।



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तुम्हें बस ख़बर ही नहीं है
वर्ना गुनाह यहाँ रोज़ होता है

इस हुश्न की चारागरी में तो
इश्क़ तबाह यहाँ रोज़ होता है

ज़ख़्म सहने की आदत है सो
दुआ फ़ना यहाँ रोज़ होता है

भीड़ में होके भी आज इंसाँ
बेवक़्त तन्हा यहाँ रोज़ होता है

ज़िन्दगियाँ यूँ ही क़त्ल होती हैं


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ज़ुल्म होता रहे और आँखें बंद रहें 
ऐसी आदत किसी  काम की नहीं 

बेवजह अपनी ही इज़्ज़त उछले तो  
ऐसी शराफत किसी काम की नहीं 

बदवाल का नया पत्ता न खिले तो 
ऐसी बगावत किसी काम की नहीं 

मुस्कान की क्यारी न खिल पाए तो 
फिर शरारत किसी काम की नहीं 

तुम्हें छुए और होश में भी रहें तो 


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नभचर से नभ छीन चुके हैं
खेत-खलिहान छीन चुके हैं

घोंसले बनाने को दीवारें तो
खाना-पीना भी छीन चुके हैं

कृत्रिम प्रकृति की रचना में हम
इनका चहचहाना छीन चुके हैं

जहाँ-तहाँ हैं ये व्याकुल पंछी
इनसे उड़ना तक छीन चुके हैं

अपनी-अपनी लालच में आके