डा0 कृष्णमणी चर्तुवेदी ‘मैत्रेय’
सुलतानपुर (उ0प्र0)

वह जो भी था वस्तुतः इतना साहस का गिरा नहीं था कि ऐसी ललकार को भी पचा जाता। ठिठका और खुरदुरे स्वर में उसने जबाब दिया- ‘‘जाओं, उसे बता दो कि ‘मायावी’ सुरक्षा व्यवस्था भेदकर युद्ध हेतु नगर में प्रबिष्ट हो गया है। .... मैं पलायन गामी नहीं हूँ मूर्खों!’’
    ‘‘मायावी!’’ नाम सुनकर एक बार सबकी बोलती बन्द हो गयी। तार ने पुनः वार्ता का क्रम आगे बढ़ाया-‘‘महाराज बाली शेर की भाँति इस काल विश्राम कर रहे हैं मायावी! वस्तुतः यह युद्ध का समय नहीं है, तथापि वे शत्रु की आवाज सुनकर महल में नहीं रुक सकते। लेकिन तू उन्हें क्या करेगा? तेरा वध मेरे हाथों लिखा है।’’
    मायावी ने भीषण अट्टहास किया-‘‘हा......हा......हा। समझ गया; बाली डर गया है।’’ फिर वह तीव्र स्वर में चिल्लाया। ‘‘बाली!......! कहाँ छिपे हुये हो? .......आकर युद्ध करो।’’
    ‘‘चलो मायावी! मैं तुम्हें युद्ध प्रदान करता हूँ।’’ कहते हुये तार उसके निकट पहुँचे। फिर.....छिड़ गया रक्त रंजित संग्राम।
   
उनका संग्राम अधिक समय तक नहीं चला.....सम्राट-अनुज पुत्र एवं सुरक्षाकर्मियों के साथ युद्ध हेतु प्रस्तुत हो गये।
    ‘‘यह वही राक्षस है महाराज! जो रहस्यमयी गुफा में बसता है।’’कहकर रम्भ ने मायावी का परिचय दिया।
    एक ही दृष्टि में मायावी का अवलोकन करके बाली ने गदा सँभाली और संकेत मात्र से तार को युद्ध से विरत कर दिया।.......
    मायावी ने तलवार की मुठिया कसकर पकड़ा, उसे कमर में बँधी म्यान से खींचा फिर आक्रामक प्रहार झोंक दिया। लक्ष्य था बाली का सिर, जिसे वह एक ही वार में खरबूजे की भाँति काट देने को उत्सुक था।    
    बाली गोपनीय ढंग से मुस्काराये; कितनी बचकानी आकांक्षा थी शत्रु की। उनका हाथ ऊपर उठ गया, फिर भीषण टकराहट और चिंगारियाँ प्रस्फुटित हुई। प्रथम प्रहार विफल होते  देख शत्रु झंेप गया; उसने फिर बाली  की ग्रीवा को लक्ष्य बनाया; वानरेन्द्र ने उसे भी निष्फल कर दिया।
    मायावी तिलमिलाया, जिस गति से उसके प्रहार को रोका गया है उससे शत्रु की शक्ति प्रमित करने में अथाह प्रतीत हुई उसे।......उसने तीसरा प्रहार किया। इस बार बाली ने एक साथ दो कार्य किया, उसके प्रहार को गदा पर टेक देकर त्रिकोणात्मक ढंग से एक झटका दिया फलतः तलवार मायावी के हाथ से इतनी दूर जा गिरी कि प्राप्त करना कठिन था।
    बाली ने अद्भुत स्फूर्ति का प्रदर्शन करते हुये शत्रु पर गदा प्रहार किया। .....लेकिन वह भी मायावी था, सामने को झुकते हुये उसने अपना सिर बचा लिया। अगले क्षण प्रहार पीठ पर हुआ और वह डकारते हुये औंधे मुख भूतल पर गिर गया। दर्द की लहर उसके सम्पूर्ण शरीर में दौड़ गयी। वह कराहते हुये जैसे-तैसे उठा, फिर झुके-झुके ही भागने लगा। थोड़ा आगे बढ़ते ही वह सीधा हुआ और द्रुतगति से उछलकर प्राचीर फाँद गया।
    ‘‘उसका पीछा किया जाय....।’’ राजाज्ञा जारी हुयी और तार सहित कई लोग प्राचीर से निकलकर शत्रु के पीछे लग गये।
    बाली ने परिजनों पर दृष्टिपात करके समझाने वाले स्वर में कहा - अंगद, हनुमान, द्विविद गवय एवं महाबली जाम्बवान! आप लोग नगर रक्षा में तत्पर रहंेगे। सुग्रीव को मेरे साथ चलना है; मैं मायावी को पाताल से भी खोद निकालना चाहता हूँ।’’
    अंगद हड़बड़ाये। पिता की विमल मूर्ति समक्ष थी जिसे एक बार खो देने पर पुनः प्राप्त करना असम्भव है। पिता की उपस्थिति ही अमूल्य सुरक्षा कवच हुआ करती है। पिता का स्थान व्योम से ऊँचा और समस्त रिश्तों से सर्वोपरि होता है। बोले- ’‘रात्रि बेला में शत्रु-नगर में प्रवेश करना क्या समीचीन होगा पिता महाराज! आप मेरे प्रत्यक्ष देवता हैं। आपकी सन्तुष्टि मात्र से समस्त तीर्थों के सुकृत का फल प्राप्त होता है। पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म एवं सत्कर्म है। आप यों शत्रु के गढ़ में न जायें यह मेरी प्रार्थना है। ‘‘कहते-कहते अंगद के नेत्र सजल हो गये।
    ‘‘अंगद बेटे! इन्द्र प्रदत्त यह विजयदायिनी माला जब तक मेरे कण्ठ में है, तब तक तुम किसी अनिष्ट की कल्पना मत करो। स्नेह की अधिकता मंे हो, जाओ विश्राम करो।’’ बाली ने स्नेहिल शब्दों में कहा।
    ‘‘प....... पिता श्री!  मुझे भी अपने साथ ले चलिये। आपको छोड़कर मैं नगर में क्या करूँगा? आप नहीं रहेंगे तो राज्य सदन की दीवारें मुझे काटने को दौड़ेंगी। मुझे राष्ट्र सम्पदा नहीं प्रत्युत आपका स्नेह चाहिए। अंगद के नेत्र सजल हो गये।
    पुत्र स्नेह से बाली अभिभूत हो गये। उन्होंने अंगद का सिर सहलाया-‘‘पुत्र! चिन्ता मत करो, मैं शत्रु का वध करके वापस आ जाऊँगा।’’   
    अंगद के होंठ हिलकर रह गये........। वे पिता को रोकने में सर्वथा  असफल रहे। उनके देखते-देखते बाली सुग्रीव एवं कुछ सुभट के साथ आगे बढ़ गये। अंगद तब तक खड़े रहे जब तक बाली आँखांे से ओझल नहीं  हो गये। अंगद मन ही मन बड़बड़ाये-‘‘मैं भी आपके पीछे आ रहा हूँ.......।’’
    पुत्र!
    जो अपने कृत्य से माता-पिता को सन्तुष्टि प्रदान करे। पिताज्ञा पुत्र के लिये सर्वोपरि स्थान रखती है। अंगद जानते थे उपनिषद में पुत्र की तीन श्रेणियाँ बताई गयी हंै- उत्तम, मध्यम और नीच। पिता का बिन्दु ही उसका स्वरूप है। पिता की आत्मा विभक्त होकर बिन्दु से भ्रूण फिर पुत्र के रूप में परिणिति होकर जन्म ग्रहण करती है। ऐसे पिता की अवहेलना करके पुत्र अपने स्वरूप के साथ अन्याय करता है, वह अपने को धोखा देता है। अपना लोक-परलोक नष्ट करकेे नर्क की तैयारी में अग्रसर होता है।......पिता का अभिप्राय पढ़कर आशा की प्रतीक्षा किये बिना तद्कार्य को पूर्ण करने वाला ही उत्तम पुत्र होता है। अभिप्राय जानकर आदेशोपरान्त पूर्णतः प्रदान करने वाला पुत्र ‘मध्यम’ माना गया है और पिता की आज्ञा टालने वाला ‘नीच पुत्र’ होता है। उत्तम पुत्र की उत्तम गति, और नीच पुत्र की अधोगति होती है।
    
    ‘‘अनुज सुग्रीव! तुम अपने मन्त्रिमण्डल एवं सहायकों के साथ इस गुफा के द्वार पर रुक जाओ। मैं मायावी के अन्वेषण में इस मायामयी गुफा में प्रवेश करूँगा। जब तक मैं वापस नहीं आता तब तक रातों दिन तुम यहाँ तैनात रहोगे। अपने आवास एवं खाद्य पदार्थ की व्यवस्था बना लेना। स्मरण रहे, कोई भी व्यक्ति मेरा अनुसरण नहीं करेगा।’’ बाली ने एक-एक शब्द पर जोर डालकर निर्देश दिया फिर उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना गुफा की तरफ उन्मुख हो गये।
    भीषण अंधकारमयी गुफा! मृत्यु का स्पष्ट स्वरूप ......सभी स्तब्ध रह गये। क्या हो गया है शासक बाली को.......... उन पर धुन सवार थी। उन्होंने अपने परिणाम पर भी विचार नहीं किया। किसी का साहस नहीं हुआ कि उन्हें रोक ले। देखते-देखते वे गुफा में प्रविष्ट हो गये।
    प्रवेश करते ही............
    भयानक तिमिर से द्वन्द्व मच गया। हाथ पसारे कुछ नहीं सूझता; मार्ग का अवलोकन सहज नहीं था .........दिशा का भान भी नहीं, आगे क्या है यह भी आभास नहीं। गुफा कहाँ जायेगी? किधर मुडे़ंगी ? अथवा गुफा से अन्य गुफा तो नहीं निकली है कुछ अंदाज नहीं था। भीषण चुनौती पूर्ण कार्य है। बाली को कदाचित मालूम नहीं कि वह रहस्यमयी गुफा अत्यन्त विस्तृत है। वह कुछ इसे ढंग से है कि जाने में इधर-उधर छेड़ने से उसका स्वरूप घट-बढ़ सकता था।
    बाली पलभर को चिन्ताग्रस्त हुये। अन्धकार से लड़कर पार पाना कठिन है.........और ऐसी विषम घड़ी में इन्द्र प्रदत्त माला ने अपना प्रभाव दिखा दिया। माला में जडि़त मणि गुफा के अन्धकार में अपनी आभा विखेर चुकी थी। मणि प्रकाश ने बाली का मार्ग-दर्शन प्रारम्भ कर दिया किन्तु उनके लिये दूसरी समस्या चुनौती बनी थी।   
    बाली को आभास हो रहा था जैसे वे पाषाण पर नहीं प्रत्युत बर्फ की चट्टान पर खड़े हों। तलवोें में ठण्ड लग रही थी और पैर की उँगलियाँ ऐंठती हुई निष्चेष्ट प्रतीत होने लगी। वे अगला कदम निर्धारित भी नहीं कर पाये थे कि समस्या खड़ी हो गयी। ..... समस्त स्थिति का आकलन इतना सहज भी नहीं है। .....वे तत्क्षण आगे बढ़े। वे ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये ठण्डक भी बढ़ती गयी, इतना कि सम्पूर्ण अस्तित्व सुन्न सा होने लगा।
    बाली अब क्या करंें? उन्हें लगा कि रक्त का प्रवाह जाम हो जायेगा। समक्ष विकट समस्या, ऐेसे में कहीं मायावी या उसका परिचर टपक  पड़ा तो सामना करना अत्यन्त दुरूह होगा। ......सहसा का कार्य सदैव अनुकूल नहीं हुआ करता।......ठिठुरन भरी ठण्डक से कैसे बचें? कुछ नहीं सूझा तो धावक की शैली अपनाया बलवान बाली ने। .........वे मणि प्रकाश में दौड़ते रहे। दौड़ने के कारण उपर्युक्त माला बार-बार हिल भी रही थी। दौड़ते-दौड़ते शरीर में कुछ गर्मी आई किन्तु हाथ-पाँव की उँगालियाँ पूर्ववत ऐंठी थी। .....अब गदा पर पकड़ बनाये रखना भी उनके लिये कठिन हो गया। ....... सहसा उन्हें रुकना पड़ा। आगे गुफा मार्ग दो भागों में विभक्त दिखाई दिया-एक दम कैंची सदृश। उनकी समझ में नहीं आया कि बाईं तरफ की गुफा में बढ़ें अथवा दाहिनी तरफ। मायावी न जाने किस मार्ग से आगे बढ़ा होगा। यहाँ सब कुछ अनुमान पर केन्द्रित है।
    परीक्षण हेतु वे दाहिनी गुफा पर थोेेड़ा अग्रसर हुये। उनके मुख से सिसकारी निकल गईं; कारण पहले की अपेक्षा और भीषण ठण्ड तन को प्रभावित करने लगी; .......वहाँ एक पल भी ठहरना उनके लिये असम्भव हो गया। वे मुड़े और बाईं गुफा में चार कदम प्रविष्ट हुये। उसमें उन्होंने चैन की मीलों लम्बी साँस लिया; अन्दर से आँच आ रही थी। कुछ यों आभास हुआ जैसे कहीं अलाव जल रहा हो। इसमें निशाचरों की दुरभिसन्धि पूर्ण चेष्टा थी। वानरराज तत्क्षण पीछे हट गये, वे परम सावधान रहे और उन्होंने इस प्राणान्तकारी षड़यन्त्र को अपनी सूझ-बूझ से विफल कर दिया।
    उस षड़यंत्र को बाली जैसे मेघावी ही भाँप सकते थे। कोई और होता तो ठण्डी लगी हो उस समय यदि एकाएक गर्मी शरीर में प्रवेश करती है तो रक्त में विपरीत प्रतिक्रिया होकर-प्राणान्त हो जाता है। ठण्डी लगने पर उन्होंने खड़े रहकर शरीर को संतुलित किया और पूर्ववत तापमान प्राप्त करने पर कदम आगे बढ़ाया; लक्ष्य बाईं गुफा थी।
    मात्र दस-बारह कदम वे आगे बढ़े होंगे कि पैरों के नीचे कम्पन की प्रतिक्रिया हुई। पल भर के लिये वे स्तब्ध रह गये। उन्होंने कम्पन का औचित्य समझने की भरपूर चेष्टा की। उस घड़ी उनके पाँव जहाँ के तहाँ चिपक गये। अगले पल ‘घर-घराहट’ की आवाज ने उन्हें चैकन्ना कर दिया, कान खड़े हो गये। वे एडि़यों के बल घूमकर चारों तरफ निरीक्षण करने लगे।    
    आश्चर्य........! जिस स्थान से गुफा कैंची सदृश दो भागों में विभक्त हुई थी ठीक उसी के सामने का शिलाखण्ड अपने स्थान से सरक रहा था। बाली की आँखें आश्चर्य से फट गई। वे सब कुछ जैसे समझ गये हों और एकाएक स्वस्थान पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगेे। शिला सरक कर ठण्डी गुफा के द्वार पर चली गयी, अब ठण्डी गुफा एक दम बन्द हो गयी थी। ..जहाँ से शिला हटी थी वहाँ नूतन गुफा दिखाई दी। .......तभी नई गुफा से दो आकृतियाँ बाहर आईं। बाली ने तत्क्षण माला को ढँक लिया था। अब वहाँ उन्हीं दोनों के आभूषण जग-मगा रहे थे। उनमें वार्ता जारी थी।
    ‘‘कहीं शत्रु ‘सुरम्या-सभा’ तक न पहुँच जाय।’’ एक का स्वर सामान्य था।
    ‘‘असम्भव!’’ दूसरी आवाज कर्कश थी ।
    ‘‘यत्न से कोई भी कार्य असम्भव नहीं होता मित्र!’’
    ‘‘मानता हूँ। परन्तु इसे मत भूलिये कि सुरम्या तक पहुँचने हेतु शत्रु को सात द्वार पार करना होगा। इन सातों का तोड़ नर-वानरों को नहीं मालूम है। और मान लीजिए कोई उन्हें तोड़कर सुरम्या तक पहुँच गया तो क्या पहुँचने मात्र से वहाँ महाराज मायावी को प्राप्त करना सहज होगा? सुरम्या में प्रवेश करना देवाताओं के लिये भी दुरूह है। कुछ दिन उसे.....’’
    आगे के शब्द बाली नहीं सुन सके। वे दोनों बाहर जा रहे थे और इतनी दूर निकल गये कि बहुत ध्यान देने पर भी उनकी आवाज स्पष्ट नहीं हो पा रही थी । तभी शिला गुफा से सरककर पुनः अपने स्थान पर आ गयी। बाली ने उस नई गुफा में प्रवेश करने का लक्ष्य बनाया। कैसे? यह संज्ञान में नहंीं था। गदा को उठाकर उन्होंने कंधे पर रखा शेर की भाँति निद्र्वन्द्व भाव से शिला के समीप पहुँचे कुछ क्षण वे शिला को घूरते रहे; फिर उनके जबड़े भिंच गये। दोनों मुट्ठियों में गदा का कसाव सख्त हुआ और पूर्ण मनोयोग से उन्हांेंने शिला पर प्रहार झांेक दिया।
    तीव्र ध्वनि के साथ लगा जैसे प्रस्तर टूट जायेगा और ऊपरी भाग गड़गड़ाकर बैठ जायेगा। उन्होंने द्वितीय प्रहार करने की नादानी नहीं की।  अनभिज्ञता में कार्य साधन विपरीत हो सकता है। फिर आगे कैसे बढ़ा जाय एक पल में बाली को उपाय सूझ गया। वे गर्म गुफा के मुहाने पर बैठकर उन दोनों के वापस होेने की प्रतीक्षा करने लगे जो बाहर गये थे। वापसी में बाली उनका अनुसरण करकेे अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे। .....प्रतीक्षा की घड़ी अत्यन्त दुःखदाई होती है। वे दोनों पता नहीं कहाँ जाकर अटक गये या फिर  किसी अन्य मार्ग से अन्दर आ गये थे। जो भी हो बाली ने कुछ काल और प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। दिवस गया, रात फिर दूसरा दिवस भी अवसान को प्राप्त हुआ; इस तरह पूरा पखवारा बीत गया परन्तु अभी कोई लक्ष्य पूरक सूत्र हाथ नहीं लगा। वे कुछ ऊबने लगे। क्या करें?.....
   
‘‘संकट की घड़ी जब भी आती है प्रकृति कभी-कभी पूर्वानुमान करा देती है भाभी! बाध्य होकर विषम परिस्थिति को झेलना होता है।’’
    तारा!
    बाली की पत्नी, अनुपम सुन्दरी। नख से सिख तक सर्वांग मनोरम।  गोल चेहरा, सुराहीदार गर्दन, मध्यम कद-काठी, अरुण अधर और कजरारे नयन। बोली तो जैसे कोयल कूकी हो- ‘‘संकट की घड़ी को बाध्य होकर झेलना और संकट से संघर्ष करना दोनों दो बातें हैं भैया!  उद्यम विहीन व्यक्ति समस्त थपेड़ों को बाध्य होकर झेलता है। उद्यमी भी संकट झेलता है किन्तु परिस्थितियों के आगे झुकता नहीं। वह अपने कर्म से विषम परिस्थिति को अनुकूल बना लेता है। वस्तुतः जीवन में संकट का आगमन आवश्यक होता है, क्योंकि उससे सीख मिलती है। संकट से घबराना अज्ञानता है।’’
    सुग्रीव सन्न।
    राजमहल आकर उन्होंने बाली का समाचार दिया था फिर संकट की पूर्वाख्या प्रस्तुत करने को उत्सुक थे।

जारी.....


Axact

Akshaya Gaurav

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