प्रवेश सिंह
अल्मोड़ा, उत्तराखंड ।


उसे मालूम है
कि विद्यालय कहाँ है
मगर बता नहीं सकती
कि किस दिशा में है ।
कभी वास्ता ही नहीं पड़ा,

मुझे छोड़ने जाती थी
मुख्य द्वार तक
और वहाँ से लौट आती थी ।

वो नहीं पढ़ सकती थी
मेरी अंक तालिका के अंक
दैनन्दिनी में लिखे निर्देश
चैराहे पर लगा साइनबोर्ड
टी. वी. स्क्रीन पर चलते समाचार ।

मगर वो पढ़ लेती है
मेरे माथे की शिकन,
मेरे चेहरे के भाव
मेरे ह्रदय के उदगार
मेरे मन की हर बात ।

अंगूठा लगाती है
अपने नाम की जगह
दस्तखत के लिये
मेरी अनपढ़ माँ ।

क्या वाकई अनपढ़ ?


Axact

Akshaya Gaurav

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