राजेन्द्र सिंह नेगी, मेरठ।

 चित्रकारो, राजनितिज्ञो, दार्शनिको की
दुनिया के बाहर
मालिको की दुनिया के बाहर
पिताओ की दुनिया के बाहर
और बहुत से काम करती है।
वे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठ
नौजवान बना देती है।
आटे को रोटी मे
कपड़े को पोशाक में
और धगे को कपड़े मे बदल देती है।
वे खंडहरो को
घरो मे बदल देती है
और घरो को स्र्वग में।
वे काले चुल्हे को
मिटटी से चमका देती है
और तमाम चीजो संवार देती है।
वे बोलती है और
कई अंध् विश्वासो को जन्म देती है व
कथाऐं व लोकगीत रचाती है।
बाहर कही की दुनिया के आदमी को
देखते ही खामोश हो जाती है।


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Akshaya Gaurav

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