समीक्ष्य कृति  : परछाईयाँ
कृतिकार          : डा0 फखरे आलम खान ‘विधासागर’
संस्करण  : 2012
मूल्य                : 40 रुपये
प्रकाशक          : चरणदेव पब्लिकेशन्स, मेरठ।
समीक्षक   : प्रो0 डा0 शरद नारायण खरे
                        विभागाध्यक्ष इतिहास, शासकीय महिला
                          महाविद्यालय,  मण्डला (म0प्र0)- 481661

‘परछाईया’ युवा रचनाकार डा0 खान द्वारा सृजित 27 श्रेष्ठ समसामयिक व पैनी कहानियों का यह संग्रह एक नवीन ताजगी, उत्कृष्टता व विशिष्टता लेकर प्रकाशित हुआ है। निश्चित रूप से कहानियों में समसामयिक बोध के साथ ही जनवादी तेवर विद्यमान है। साथ ही विसंगतियों व विद्रुपताओं पर जो तीक्षण प्रहार किये गये है, उसके कारण भी इस संग्रह की कहानियां सारगर्भित व प्रासंगिक बन गई है।
कहानियों में जीवन के स्वर है, तो एक चेतना भी विद्यमान है। वास्तव में ‘परछाईयां’ की कहानियां जीवन की सच्चाइयों के निकट है। इनमें सुर, लय, ताल सभी कुछ विद्यमान है। ये कहानियां एक चिंतन, एक यर्थाथ, एक संदेश का प्रसारण करती है। कहानियों मे रवानगी के साथ बोधगम्यता व संप्रेषणीयता सन्निहित है। सभी कहानियां वास्तविकता के निकट है। कहानियों में गहनता व प्रखरता है।

सभी 27 कहानियां परिपक्वता, चिन्तनपरकता व एक सादगी लेकर इस प्रकार से रची गई है कि हर कहानी से एक खुशबू, एक आभा निकलती व बिखरती हुई दृष्टिगोचर होती है। यह यथार्थ है कि कोई भी रचना तब सशक्त बन पाती है जबकि रचनाकार  का नजरिया न केवल काफी व्यापक हो, बल्कि उसमें सामाजिक सर्वेक्षण की प्रखरता व व्यापकता भी विद्यमान हो। इस दृष्टि से इस कृति के सृजक डा0 फखरे आलम खान की हर कहानी प्रशंसा के योग्य इसलिए है क्योकि हर कहानी में एक मौलिकता है। कहानियों में कथ्य, शिल्प, संदेश, आदर्श, प्रवाह, सरसता, जिज्ञासा व नवीनता सभी कुछ विद्यमान है। वैसे तो सभी कहानियां प्रभावित करती है, परन्तु बुरा अंत कुंआ, गुनाहो की सजा, निराशा में आशा, ममता, बेबसी, विशेष रूप से प्रभावित करती है। इन कहानियों में गहराई, परिपक्वता, व्यापकता व अंतर्निहित सूक्ष्मता के कारण इन कहानियों का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है।
भाषा में सादगी है, एक अनुशासन है, एक संश्लिष्टता है, एक आकर्षण है, एक प्रभावोत्पादकता है। यह यर्थाथ है कि कहानीकार एक परिपक्व सृजक है तभी तो वह व्यवहार व आदर्श में एक सुन्दर समन्वय व आपसी तादारतम्य स्थापित करने में सफल रहा है। कहानियां जीवन के आस-पास परिभ्रमण करती है। कहानियों में एक सच्चाई है। निष्कपट ढंग से लिखी गई कहानियां समय की शिला पर सशक्त हस्ताक्षर दृष्टिगोचर होती है। कहानियों में जीवंतता है। कहीं भी कोई कृत्रिमता न होने के कारण कहानियां स्वाभाविक प्रतीत होती है। कहानियों में एक सरसता है। कहानियां बहुत अधिक बड़ी न होने के उपरान्त भी काफी कुछ कहने में समर्थ है। तीन व्यंग्य रूपी कहानियां भी हकीकत का खुलासा करती है।
वस्तुतः वर्तमान में वैसे तो अनगिनत कहानियां लिखी जा रही है, पर अधिकांश कहानियां प्रभावहीन दिखती है, ‘परछाइयां’ की हर कहानी गहरा असर छोड़ती है। उसका कारण यह है कि डा0 खान एक सधे व मंझे हुए कलमकार है। कहानी संग्रह का शीर्षक ‘परछाईयां’ भी इसलिए काफी सारगर्भित प्रतीत होता है क्योकि कहानियों में सच्चाई का आभास है जो कि परछाईयां बनकर पाठक को यर्थाथ बोध कराती है। ये कहानियां कहानी-साहित्य को समृद्व करने में समर्थ है। रचनाकार इस श्रेष्ठ सृजन के लिए बधाई व अभिनन्दन का पात्र है। मुखपृष्ठ सादा पर आकर्षक है। विश्वास है कि डा0 फखरे आलम खान की यह कृति काफी लोकप्रियता हासिल करेगी।



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Akshaya Gaurav

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