लोकसभा चुनावों में चली मोदी लहर केंद्र की सत्ता ही नहीं बल्कि कई गैर भाजपाई राज्य सरकारों को भी हिला गई। यही नहीं चुनावों में कई मजबूत क्षेत्रीय दल अपना खाता भी नहीं खोल सके। अब भाजपाई खेमे में जहां बधाइयों का दौर जारी है वहीं गैर भाजपाई खेमे में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है। चुनावों में 'बदलाव' की बात तो सभी महसूस कर रहे थे लेकिन इस प्रकार के परिणामों की किसी को उम्मीद नहीं थी। शायद ही किसी ने सोचा हो कि 'मोदीमय' माहौल में जनता भाजपा को पूर्ण बहुमत देने के साथ ही दस वर्षों से केंद्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस को सत्ता से तो बाहर करेगी ही, इस लायक भी नहीं छोड़ेगी कि वह संसद में मुख्य विपक्षी दल बन सके। वाकई इन चुनाव परिणामों ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल कर रख दिया है। गठबंधन राजनीति, जातिवादी राजनीति, वंशवादी राजनीति और क्षेत्रीय दलों की अनुचित दबाव वाली राजनीति को जनता ने इस बार तगड़ा झटका दिया है।

कांग्रेस के लिए यह आजाद भारत में सबसे निराशाजनक हार है। पार्टी हार के कारणों पर अब चिंतन की बात कह रही है लेकिन उसे तो तभी सतर्क हो जाना चाहिए था जब पिछले वर्ष के अंत में हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। इस बार के चुनावों में पार्टी का आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में तो खाता ही नहीं खुला साथ ही राजधानी दिल्ली में तो वह सभी सीटों पर तीसरे नंबर पर पहुंच गयी। माना जा रहा है कि पार्टी संगठन में अब जबरदस्त बदलाव होगा ताकि जनता के बीच फिर अपनी पैठ बनायी जा सके। पार्टी के लिए यह भी बड़ी चिंता की बात है कि प्रधानमंत्री पद के उसके अघोषित उम्मीदवार राहुल गांधी को अपने गढ़ अमेठी में कड़ी टक्कर मिली। हार की जिम्मेदारी लेने के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी कार्यसमिति से इस्तीफा दे सकते हैं लेकिन इस परिवार के प्रति प्रतिबद्ध कांग्रेस नेता शायद ही ऐसा होने दें।
कांग्रेस का जो हश्र हुआ उस पर ज्यादा हैरत किसी को भी नहीं है लेकिन इन चुनाव परिणामों का जिस प्रकार राज्यों पर असर पड़ा है वह काबिलेगौर है। जम्मू-कश्मीर से शुरुआत करें तो देखेंगे कि वहां पांच वर्षों से सत्तारुढ़ नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया फारुक अब्दुल्ला अपना ही चुनाव नहीं जीत पाये। यह उनकी पहली चुनावी हार भी है। देश में कोई मोदी लहर नहीं होने की बात कहने वाले फारुक की पार्टी का कोई भी उम्मीदवार इस बार लोकसभा नहीं पहुंच सका। जल्द ही विधानसभा चुनावों का सामना करने जा रही उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की सरकार में सहयोगी भाजपा को भी राज्य सरकार के खिलाफ नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा है। अमृतसर से जहां उसके कद्दावर नेता अरुण जेटली चुनाव हार गये वहीं राज्य में आम आदमी पार्टी ने चार सीटें जीतकर अकाली-भाजपा सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
हरियाणा में अपने दस वर्षों के कार्यकाल में भूपिन्दर सिंह हुड्डा पर कई प्रकार के आरोप लगे लेकिन आलाकमान का पूरा समर्थन होने के चलते वह अपने पद पर बने रहे। लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम उनका राजनीतिक कॅरियर दांव पर लगा गये हैं। हुड्डा सिर्फ अपने बेटे की सीट बचाने में ही सफल रहे। राज्य में कांग्रेस अध्यक्ष सहित कई वरिष्ठ नेता चुनाव हार गये। इस वर्ष राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। हुड्डा का गिरता ग्राफ कांग्रेस के प्रदर्शन पर फिर प्रभाव डालेगा। यदि सरकार का ज्यादा कार्यकाल बचा होता तो निश्चित ही राज्य के कांग्रेसी नेतृत्व परिवर्तन की मांग करते।
देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश चुनाव परिणामों में इस बार सबसे ज्यादा इसलिए चौंका गया क्योंकि वहां पूर्ण बहुमत वाली समाजवादी पार्टी सरकार राज्य की 80 में से मात्र पांच सीटों पर ही विजय हासिल कर पाई। सपा के वही उम्मीदवार जीते हैं जोकि यादव परिवार के हैं। पार्टी के सभी धुरंधर इस बार चुनाव हार गये। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिन पर कि पहले भी शिथिल तरीके से सरकार चलाने के आरोप लगते रहे हैं वह इस बार अपनों के साथ ही विरोधियों के भी निशाने पर हैं क्योंकि उनकी सरकार के खिलाफ नाराजगी ने उनके पिता के प्रधानमंत्री बनने के सपने को तोड़ दिया है। अखिलेश और मुलायम सिंह राज्य में भाजपा को कोई तवज्जो नहीं दे रहे थे लेकिन पिछले चुनावों में दस सीटों पर विजयी रही इस पार्टी ने 73 सीटों पर विजय हासिल कर सपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
बिहार में तो मोदी लहर का प्रभाव इतना रहा कि इससे ना सिर्फ राजग की सीटें बढ़ीं बल्कि मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार का इस्तीफा भी हो गया। आठ वर्षों से राज्य में सत्तारुढ़ जनता दल युनाइटेड के प्रमुख शरद यादव सहित पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता चुनाव हार गये। पार्टी को 40 में से मात्र दो सीटें मिलीं। माना जा रहा है कि पार्टी के कई विधायक गुस्से में थे और इससे पहले कि वह कोई बड़ा कदम उठाएं, नीतीश ने खुद ही इस्तीफा दे दिया ताकि जनता की सहानुभूति अर्जित की जा सके और नए नेतृत्व की अगुवाई में यदि विधानसभा चुनावों में हार मिलती है तो ठीकरा उनके सिर ना फूटे।
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में राज्य की सभी सीटों पर भाजपा के विजयी होने ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसी प्रकार एक अन्य पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की सत्ता भी गंभीर संकट में है। सभी पांचों सीटों पर कांग्रेस की बुरी हार हुई है। यही नहीं मुख्यमंत्री की पत्नी भी जीत पाने में विफल रहीं। पार्टी के कई विधायकों में असंतोष के चलते राज्य सरकार की स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
महाराष्ट्र जोकि कांग्रेस के मजबूत किलों में से एक रहा है वहां इस बार वहां पार्टी को 48 में से मात्र एक सीट पर विजय मिली है। राज्य में इस वर्ष ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो निश्चित ही अब तक मुख्यमंत्री बदलने का फैसला ले लिया गया होता। पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता चुनाव हार गये और आश्चर्य की बात यह रही कि जिस सीट पर पार्टी जीती है वहां प्रत्याशी वह अशोक चव्हाण थे जोकि आदर्श सोसायटी घोटाले में कथित रूप से आरोपी बताये जा रहे हैं। पार्टी को इस बार ना सिर्फ अपनी स्थिति सुधारने के लिए कड़े प्रयत्न करने होंगे बल्कि अपनी सहयोगी राकांपा से भी सीटों के बंटवारे के समय पहले की अपेक्षा ज्यादा 'मोलभाव' करना होगा।
पूर्वोत्तर राज्य असम में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया है। वह अपने बेटे सहित पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवारों को जीत दिलाने में असफल रहे। झारखंड में भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का ताज खतरे में है क्योंकि कांग्रेस ने जिस उद्देश्य के साथ उनसे गठबंधन किया था वह पूरा नहीं हो पाया है। कर्नाटक में पिछले वर्ष पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी कांग्रेस मात्र एक वर्ष के अंदर अपना प्रभाव खो बैठी। सिद्धारमैया के विरोधी पार्टी में पहले से ही कई हैं ऐसे में मुख्यमंत्री बदलने की मांग उठ सकती है। केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी एकमात्र ऐसे कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे जोकि अपने राज्य में पार्टी की स्थिति बरकरार रखने में सफल रहे।
इसी प्रकार कई बड़े राजनीतिक दल भी ऐसे रहे जिन्हें इन चुनावों में ऐसा झटका लगा है जिससे वह लंबे समय तक उबर नहीं पाएंगे। लगभग दो वर्ष पहले अपने लोकसभा उम्मीदवारों की घोषणा कर चुनावों में जुटने वाली बहुजन समाज पार्टी का इस बार खाता भी नहीं खुल सका। दिल्ली विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी का दिल्ली में खाता ही नहीं खुला। तमिलनाडु में वर्षों तक शासन करने वाली द्रमुक का पहले विधानसभा चुनावों में सफाया हुआ और इस बार पारिवारिक झगड़ा इस कदर बढ़ा कि पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। हरियाणा जनहित कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस आदि ऐसे कुछ दल प्रमुख हैं जिनका एक भी व्यक्ति इस बार लोकसभा तक नहीं पहुंच पाया है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता ने अधिकांश सीटें जीत कर अपना प्रभाव बनाए रखा है लेकिन निश्चित ही उन्हें किसी सौदेबाजी की भूमिका में नहीं आ पाने का मलाल हो रहा होगा।

नीरज कुमार दुबे 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और वर्तमान में प्रभासाक्षी पर नियमित लेखन करते है।


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Akshaya Gaurav

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