जेन-एक्स और जेन-वाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल हम अक्सर कैजुअल तरीके से करते हैं। लेकिन कॉरपोरेट दायरे में ये बीस साल के अंतर वाली दो पीढ़ियों के बिल्कुल ठोस नाम हैं। ऐसे ही तीन और नामों को बहुत कम लोग जानते हैं। फ्लेक्सी करियर्स इंडिया के मुताबिक 1920 से 45 के बीच जन्मे लोग वेटरन, 1945 से 60 के बीच जन्मे फ्री-जेन, 1961 से 70 के बीच जन्मे जेन एक्स, 1971 से 80 के बीच वाले ई जेन और 1981 से 90 के बीच जन्मे लोग जेन वाई कहलाते हैं। इनमें आजादी से पहले जन्मे लोग, यानी वेटरन अब किसी काम-धंधे में कम ही नजर आते हैं। ऊंचे पदों पर आजादी के बाद जन्मी फ्री-जेन का बोलबाला है। परिश्रमी होने के साथ-साथ यह पीढ़ी अपने विकास और स्वास्थ्य की फिक्र भी करती है। जेन-एक्स के लोग सोशलिज्म से लिबरलाइजेशन के बीच के हैं। ये स्वयंभू, आत्मनिर्भर और सरल हैं। अपने समय के अनुभवों से घबराए ये लोग नई पीढ़ी के साथ कदम मिलाने की कोशिश करते हैं। ई-जेन को बदलाव के साथ होना अच्छा लगता है। इस पीढ़ी ने एकसाथ कई बदलाव देखे हैं। यह टेक्नो सेवी जेनरेशन परफेक्ट करियर में बिलीव करती है।
कॉरपोरेट दफ्तरों की सबसे नई पीढ़ी जेन वाई एग्रेसिव होने में कतई संकोच नहीं करती। उसे यकीन है कि वह लोगों को प्रभावित करने की और सौदेबाजी की ताकत रखती है। फ्लेक्सी करियर्स इंडिया की मानें तो इस समय फ्री जेन के 20 फीसदी, जेन एक्स के 25 फीसदी, ई जेन के 29 फीसदी और जेन वाई के 26 फीसदी लोग कामकाज में लगे हैं। हर पीढ़ी का अपना मिजाज, प्राथमिकता और उद्देश्य हैं। अलग माहौल में पैदा होने के कारण सबकी खुशी और सफलता के पैमाने अलग हैं। ऐसे में मैनेजरों को इन सब के बीच खास तरह का रिश्ता और माहौल बनाने में मेहनत करनी होती है। आईटी सेक्टर में जेन एक्स और टेक सेवी जेन वाई के लोग बड़ी तादाद में हैं। असल संघर्ष जेन वाई और फ्री जेन के बीच रहता है। वाई के बारे में फ्री का मानना है कि उसे अनुशासनहीन होने के कारण काम से अलग किया जा सकता है। फ्री जेन के ऐसा मान लेने भर से यह सच नहीं हो जाता कि जेन वाई मेहनती नहीं है। बहरहाल, टकराव के बावजूद ये सभी एक साथ काम तो कर ही रहे हैं। 


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Akshaya Gaurav

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