समाज मे फैली विषमतायें आज भी हृदय को झकझोंर देती है



सबकी राहों मे नहीं होती है चादर फूलों की
किसी की तक़दीर होती है डगर शुलों की
ज़िन्दगी क्या होती है जरा उनसे पुछो
जिनके घर रोज जंग होती है भूख और उसूलों की

सबको नहीं मिलता जीवन मे खुशियों का संसार
हालाँकि सबकी आँखों मे होता है सपनो का अंबार
ज़िन्दगी क्या होती है जरा उनसे पुछो
ज़हाँ हर रोज जाता है होंसला बेबसी से हार

सबके दिल मे होता है आसमाँ छुने का अरमान
पर कहीं हर घडी हर पल लुटता है आत्मसम्मान
क्या होती है घुटन जरा उस परिंदे से पुछो
कैद है जिसकी पिंजरे मे हर एक उड़ान

कहीं हर पल उठती और पूरी होती एक नयी फरमाइश
कहीं हर पल आँसुओं मे धुलती हर एक ख्वाइश
ज़िन्दगी क्या होती है जरा उनसे पुछो
जहाँ हर रोज होती है वजूद की आजमाइश

दिनेश गुप्ता ‘दिन’

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Akshaya Gaurav

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