उत्तराखण्ड राज्य ने 9 नवम्बर 2014 को अपनी 14वीं वर्षगांठ और 15 वां जन्मदिन मनाया। हर व्यक्ति ने किसी ना किसी प्रकार का व्याख्यान दिया जिसे भी मौका मिला होगा। दूरदर्शन पे चलने वाले समाचारों में भी जिस नेता को सुना वह महान नेता उत्तराखण्ड के बारे में बहुत चिंतित नजर आ रहा था। प्रत्येक नेता पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन के लिए इतना चिंतित लग रहा था कि मानो 10 नवम्बर 2014 को य प्रत्येक नेता उत्तराखण्ड के दुर्गम अति दुर्गम में वास्तविक भ्रमण पे निकल पड़ंेगे, उत्तराखण्ड के वास्तविक उत्तराखंडियों का दुखःदर्द समझने के लिए। लेकिन परिस्थितियों की विपरित कुछ बिन्दुओ पर मेरी नजर गई जो मै यहां पेश कर रहा हूं।
1- पलायन पर चिल्लाने वाला छोटे से छोटा और बड़े से बड़े नेता पहले पलायन करने वाली आम जनता को यह तो समझाये कि चुने जाने के डेढ़ साल से 2.5 साल के अन्दर इनकी कोठियां देहरादून में कैसे और क्यों बन जाती है। इनके परिवार कैसे स्थायी रूप से सुविधा सम्पन्न क्षे़त्रों में पहुंच जाते हैं। इनमे से कितने नेता आसानी से उस आमजन को उपलब्ध हो पाते है, जिनके पलायन का चिल्ला-2 कर यह सत्ता में पहुंचे होते है।
2- 30-35 हजार की जनंसख्या पर जहां एक डाक्टर हो, वह भी फिजिशियन और नौसिखिया वर्ग का। किसी का हाथ/कोई भी अंग फ्रैक्च्चर हो जाए तो एक्स रे की सुविधा 60-100 किलोमीटर पर भी ना हो, राज्य बनने के 15 साल बाद और देश की आजादी के 68 वर्षों के पश्चात भी तो वहां से अगर जनमानस पलायन नहीं करेगा तो क्या करेगा।
3- जहां की उपजाऊ भूमि को डैम, सड़क, निजी धनाढ्यों के होटल व्यवसाय खा गए हो, जाल साजी से वहां का जन पलायन नहीं करेगा तो क्या करेगा।
4- जहां की कृषि भूमि पर नाली का सरकारी रेट लगभग एक लाख के पास है, वहां आपका कोई भी बैंक 40-50 नाली तक के स्वामी को 50,000 से अधिक किसान क्रेडिट नहीं दे रहा है। वहीं आप बात और सवालात करते है कि पलायन क्यों हो रहा है।
5- आप के डैम प्रोजेक्ट ने उत्तराखण्ड के उत्तराखण्डियों की सिंचित भूमि को तो डैम के नाम पर डाम-डाम करके अधिग्रहित कर लिया है, मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरा जैसे दिया जा रहा है। विस्थापन की बात करो तो डैम मालिक बची हुई उखड़ भूमि बंजर भूमि की मात्रा अधिक होने की बात करता है। वह भी ऐसी भूमि जहां बकरी तक चरने को ना जाए। आप बात करते है कि पलायन क्यों हो रहा है?
6- शिक्षा व्यवस्था का बुरा हाल किसी से नही छुपा है एक ओर तो 10-15 शिष्यों पर 5-12 तक अध्यापक है। दूसरी और 400-700 तक की छात्र संख्या वाले विद्यालय है, जहां विषय सृजित तो हुए है लेकिन तब से वहां अध्यापक भेजे ही नही जा सके है। कुकरमुत्ते की तरह केवल वोट की राजनीति के चलते स्कूलों का उच्चीकरण और नव सृजन किया जा रहा है, शिक्षकों की व्यवस्था का हाल ये है कि, कहीं एक या दो अध्यापक ही जुटा पाई है सरकार। कहीं तो शिक्षक विहिन विद्यालय भी है। विद्यालयों को तो पेट भरने का रेस्टोरेन्ट बना कर छोड़ दिया है, सरकार ने। ज्ञान अर्जन का उद्देश्य तो समाप्त सा हो गया है। विद्या के मन्दिरों से। पहाड़ के स्कूलों में अध्यापक वही फंसा पड़ा है, जिसका किसी मंत्री-संत्री से कोई लिंक नहीं है। प्रथम नियुक्ति दुर्गम में और 3 साल का बान्ड बंधन का ड्रामा भी असहाय शिक्षक के लिए है। वरना 3 साल के अनुबंध की ऐसी-तैसी लोग 3 दिन ओर 3 महीनें में ही करके स्थानांतरण करवा कर अपनी इच्छानुसार स्थल पर पहुंच रहे है। यह संख्या अनगिनत है। लाल, पीले, हरे फीते सो काल, पट्टे अध्यापक के लिए जब से बने है और पास करने की बाध्यता कर दिया गया है तब से पहाड़ में तो शिक्षा की पूरी व्यवस्था का सत्यानाश हो गया हैं हमारे आगू नेता चिल्ला रहे है कि पहाड़ से पलायन क्यों, क्या मजाक नहीं लगता उनका यह कहना?
7- जो गंगा आधे भारत को पानी की पूर्ति करने का सामथ्र्य रखती है, उसी के उद्वगम स्थल के नजदीकी प्रवाह क्षेत्र वाले जन और जमीन दोनों का जीवन 100 प्रतिशत ऊखड़ ऊसर हो गया है। क्या पलायन नहीं करेगा जन, तो क्या करेगा। वातानुकूलित कमरों में बैठ के पलायन रोकने की बात करने वाले महानुभावों अपने हवाई जहाजों से, एस्टीम गाडि़यों से पहाड़ का जीवन समझने वालों, धरातल पर उतर कर देखिए कि 14-30 किलोमीटर पैदल चल कर देखिए तो शायद थोड़ा शर्म आए और कोई विराट योजना आपके व्यवहारिक जीवन में आए और मेेरे इस प्यारे पहा़ड़ के हर खेत और हर जन को मां गंगा का पवित्र जल मिल जाए तो क्यों भागेगा पहाड़ी जन। खोखली बाते करने वालो घर छोड़ना और पवित्र शुद्व हवा छोड़ने का किसी को शौक थोड़े ना होता है।बात करते हो पलायन क्यों?
8- नौकरी की आश में युवा पहाड़ी पीढ़ी ने खेत बेच बेच कर अपनी उपाधियां अर्जित की तो आप ने 10-20 साल पुराने उस युवा पहाड़ी को लड़ने के लिए फ्रेशर युवा उपाधि धारकों से भिड़वा दिया, ताकि वह प्रतियोगिता से सफल ना हो सके। आप को प्रतियोगिता का इतना ही शौक है तो बुलाए शहरी युवा पीढ़ी को हमारे पहाड़ी युवा पीढ़ी के साथ प्रतियोगिता में कि कौन 14-30 किलोमीटर पैदल निश्चित गांव तक पहुंचता है। कौन आधे-एक क्विंटल तक फसल घास को पीठ पर या सिर पर उठा कर गदेरों से गांव तक पहुंचता है पहले। आप प्रतियोगिता की बात करते है वातानुकूलित गाडि़यों/कमरों में बैठ कर भूल गए है पहाड़ का  कठिन जीवन। आपकी सोच को बाकियों का तो पता नहीं लेकिन जीत रमोला का सत सत नमन पहुंचे, इस प्रार्थना और निवेदन के साथ कि पलायन की बात बिना व्यवहार में उतरे मत करिये। आप की कुटिलता भरी नीतियां आपको मालूम ही नही है, कि आप मजबूत, कठोर संघर्षशील पहाड़ी जवानी को किस तरफ पहुंचा देगी एक दिन।
9- पहाड, स्वर्ग से पहाड़, शुद्वता भरे पहाड़, पवित्रता और निष्ठता निष्छलता भरे पहाड़ के खेत को जे0सी0बी0 के सूफा लगा कर तोड़ने को आप पहाड़ के विकास के लिए बनी, को आप सड़क कहते है तो फिर जो छोटे से छोटा और बडे़ से बड़ा नेता जीतने के बाद इस प्रगतिशील सड़क को छोड कर जीतने के 2 से 2.5 साल बाद क्यों भाग रहा है। इसको प्रगति की सड़क कहने वाले क्यों नही, इस प्रगतिशील सड़क पर सवारी गाडि़यों में भ्रमण करते, क्यों नहीं अपनी प्रेगनेंट पत्नी, बहु, बेटी को इस प्रगतिशील सड़क पर सफर करवाते। आप ऐसा करवाइये तो अपने अपनों से शुरूआत पहाड़ से पलायन स्वयं रूक जाएगा। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो कृप्या करके 10-10 बाॅडीगार्ड के बीच घिर कर मत मजाक उडाइये हमारा कि पलायन क्यों, क्यों कह कर?
10- पीढि़यों से शहर की हवाओं के बीच रहने वाले पहाड़ी का मजाक उडाए समझ आता है, लेकिन 14 साल मेें जिसने पहाड़ी का वोट की भीख पा कर स्वयं शहर देखा हो वह भी पहाड़ी को हास्य का पात्र समझे तो इससे बड़ी शर्म की बात और विडम्बना क्या होगी, इसलिए पलायन क्यों?
11- अभी तो एक केदार की घटना से हिला हुआ है उत्तराखण्ड, उत्तराखण्ड भी क्या यू कहें की एक सच्चा उत्तराखण्डी, वरना नेताओं के लिए तो यह केदार घटना एक सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी की घटना साबित हो रही है। अगर ऐसा नहीं है तो घटना के पश्चात जो भी राशि पुनर्निर्माण के लिए आई है किसी के भी शासन काल में उस मद सहित विवरण राष्ट्रीय समाचार पत्रों में दें कि इस मद पे इतनी राशि खर्च की गई, पते के साथ। ऐसा करने में तकलीफ हो अगर तो अभी तो यह शुरूआत है प्रकृति की मार कब पड़ जाए, किस रूप में पड़ जाये, कोई नहीं कह सकता है।
12- बंगाली डाक्टर कुकर मुक्ते की तरह दुर्गम से दुर्गम में बैठे है और अपनी सेवा साथ-2 खूब पहाड़ी जवानी को खिलौना बना कर खेल रहे है। आप बात करते है कि पलायन क्यों?
13- आपके द्वारा वातानुकूलित कमरों में बैठ कर संविदा की भर्ती करने की विज्ञप्ति निकलती है केवल आप के चेले चपाटे ही लगाये जाते है, ऐसा नही अगर तो लगाए गए प्रत्येक अभ्यर्थी की शैक्षिक योग्यता और गुणांक सार्वजनिक करवाइये। 14 साल का उत्तराखण्ड केवल चेले चपाटों के लिए नहीं बना है। दूर कहीं पहाड़ में बैल के पीछे बैल की लात खा-2 कर हल लगाने वाला पहाड़ी युवा भी इस राज्य का मुझे लगता है कि एक अंश है, अगर है तो क्यों नही आप बाहर निकलवाते चयनित अभ्यर्थियों की लिस्ट को सम्पूर्ण आंकडो के साथ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय समाचार पत्रों में कम से कम पहाड़ की जवानी पहाड़ का युवा सीखेगा तो, की कहां कमी रह गई उसके प्रयास में। वह संस्थाऐं चाहे वो उपनल, नल, रोजगार डाट-काम, मास काम्युनिकेशन हो या कोई भी संस्था हो। कृपया किसी को भी पहाड़ी को छलने का अधिकार मत दे। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते है तो कृपया पलायन का ढोल बजा बजा कर वोट की भीख मांगना बंद कीजिए।
14- अंततः पहाड़ से पलायन रोकना है तो पहाड़ की धरातलयी वास्तविकताओं से हमारे छोटे से लेकर बड़े नेता, अधिकारी को घुलना मिलना होगा। सुविधा सम्पन कीजिए शिक्षा, चिकित्सा, पानी से पहाड़ को, क्यों पलायन करेगा पहाड़ का युवा, अगर हम निष्ठा से यह सुविधायें दे युवाओं को। पहाड़ के दुरह जीवन में सेवा देने वाले प्रत्येक कर्मचारी को उसके ग्रेड पे का आवासीय भक्ता, ओर दुर्गम भक्ता 100 प्रतिशत दिया जाए। सुविधा सम्पन्न शहरों में बैठे कर्मचारियों से 50 प्रतिशत अधिक सुविधाऐं वेतन अर्थात अर्थ रूप में दुरह, कठिन परिस्थितियों में सेवा दे रहे प्रत्येक कर्मचारी को दिया जाना सुनिश्चित कीजिए। बजट का बहाना अगर नेताओं और डाक्टरों के लिए नही किया जा रहा है, तो फिर कठिन धरातलीय परिस्थितियों में अपनी सेवा दे रहे कर्मचारी के लिए क्यों बजट का रोना रोया जाता है बार-बार?
पलायन को रोकने का राग अलापने वालों सच में रोकना चाहते हो पलायन को तो आइये उपरोक्त जैसे अनगिनित मुददों पर मिल कर काम करे सैद्वान्तिक ही नहीं, व्यवहारिक रूप से भी तब देखिए कि पहाड़ से पलायन कैसे नहीं रूकता है।

जीत रमोला
ग्राम सभा-धरवाल गांव, 
तहसील पोस्ट कण्डीसौड़।


Axact

Akshaya Gaurav

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