खान सहाब! तुम्हे अपनी ताकत पर घमंड है, तो हम दोनों से एक साथ लडकर दिखाओ, हम जानेंगें तुम वाकई ताकतवर हो।
ठीक है मुझे तुम्हारा चैलेन्ज स्वीकार है। थोडी देर में क्लास से घंटा पूरा हो जायेगा और रेसिस भी होंगी काफी समय मिलेगा, तुम अपनी हसरत भी पूरी कर लेना।
ठीक है, हम तैयार है।
थोडी देर बाद रेसिस की घन्टी लगी। खान साहब व माजिद और राशिद स्कूल के मैदान में आकर खान साहब से एक साथ भिड गये। खान साहब ने दोनों को गिरा दिया। बच्चो ने खान साहब को विजेता घोषित कर दिया।
वाकई खान साहब आप ताकतवर है। चलो कुछ खा लेते है।
तीनो दोस्त एक कैन्टीन पर पहुंचे नाश्ता किया। पैसे खान साहब ने दिये। इतनी देर में घन्टी की आवाज कानो में सुनाई दी। तीनों जल्दी-जल्दी क्लास में पहुंचे। राशिद और माजिद अपनी जगह बैठ गये,परन्तु खान साहब की सीट पर अनिल बैठ गया। अनिल को बैठा देख खान साहब आग बबूला हो गये। खान साहब को कुछ न सूझी अनिल को उठाकर क्लास में पटक दिया। अनिल के मुंह से निकला हे राम इसे सतबुद्धि दे। इसे अपनी ताकत पर घमन्ड हो गया है। तू इसकी सजा मेरी आखों के सामने दिखा जिससे मुझे एहसास हो जाए तू कमजोर का भी साथी है। खान साहब बडे घमंन्ड के साथ अपनी सीट पर बैठ गये। अनिल मायूस होकर पीछे की सीट पर बैठ गया। क्लास शुरु हो गई, परन्तु अनिल दर्द से कराह रहा था। मास्टर से शिकायत इसलिए नही की कि वह फिर मारता। थोडी देर बाद ही खान साहब को बुखार चढना शुरु हुआ। देखते- देखते खान साहब को बुखार ने इस कदर जकडा कि घन्टा पूरा करना भारी पड गया। थोडी देर बाद घन्टा पूरा हुआ। खान साहब ने अपनी किताबे उठाई तथा घर की ताफ चल दिये। घर जाकर चारपाई पर लेट गये। घर वालों ने खानसाहब की यह हालत देख डाक्टर को घर बुलाया। डाक्टर ने देखकर दवाई दे दी, लेकिन घीरे-धीरे खान साहब की हालत बिगडती चली गई। डाक्टरो ने खान साहब को कहा कि इनकी कमर में रीड की हडडी के पास फोडा है, जब तक नही फूटेगा तकलीफ इसी तरह रहेगी। डाक्टरो ने कहा कि फोडे के फूटने के बाद भी जरुरी नही कि ठीक हो जाए, क्योंकि फोडे का रीड की हडडी पर भी असर है।
खान साहब को याद आया। मैंने अनिल को उठाकर फैंका था उसके कारण कमर में चोट आई थी। खुदा ने मुझे उसी का बदला दिया है। मैं इस हालत में भी नही हूं कि उससे माफी मागूं। खुदा मुझे इतना मौका दे दे कि मैं अनिल से मिलकर माफी मांग सकूं, कहकर बेहोशी की हालत में चले गये। घर में रोना-धोना मच गया कि खान सहाब अपनी जिन्दगी की आखरी सासें गिन रहे है। रात से सुबह की अजान हो गई। घर के लोग खान सहाब के चारो तरफ बैठ थे और खुदा से दुआ कर रहे थे कि खुदा इसकी मुश्किल आसान कर दे। खान सहाब के वालिद मायूसी की हालत में मस्जिद में चले जाते है। नमाज पढने के बाद खान सहाब के वालिद से रुका नही गया और रो पडे, और लोगो से कहने लगे, भाइयों मेरा लडका बीमार है, उसकी मुश्किल आसान हो जाए या उसे सेहत  मिल जाए। नमाज पूरी हुई। नमाजीयों में एक नमाजी बाहर से आया हुआ था। उनके पास आया और आकर बोला- भाई खुदा की जात से महरुम मत हो, हो सकता है तुम्हारे लडके से कुछ गलती हुई। हो उसी की सजा उसे मिल रही हो। चलो उठो मुझे अपने लडके को दिखाओ, खुदा तुम्हारी मुश्किल आसान कर दें। खान साहब के वालिद उस अजनबी के साथ घर आते है। खान साहब को देखते है, घरवालो से पानी मगातें है पानी पर कुछ पढते हैं, पानी हाथ में लेकर उस जगह डालते है जहां वह फोडा था। थोडी देर बाद खान साहब आंख खोलते है, घर में खुशी की लहर दौड गई। खान साहब को होश आया थोडी देर बैठकर वह अजनबी वापस मस्जिद आ जाता है। धीरे-धीरे फोडा पक गया, डाक्टर ने आपरेशन किया। कुछ दिन बाद खान साहब ठीक हो गये। लेकिन दिल में इस बात का एहसास था कि मैंनें अपनी ताकत के नशें में अनिल के साथ जुल्म किया है। खान साहब स्कूल पहुंचकर अनिल को तलाश करते है। अनिल मिल जाता है। भाई अनिल मैंने उस दिन आपके साथ ज्यादती की थी, जिसकी सजा मुझे खुदा ने दी, लेकिन अभी सजा पूरी नही हुई है। तुम मुझे माफ कर दो, तभी खुदा भी मुझे माफ करेगा।
खान साहब तुम अपनी गलती को तस्लीम कर रहे हो, इससे बडी माफी और क्या हो सकती है। मैंने तुम्हें माफ किया। लेकिन याद रखना कभी कमजोर को मत सताना। कमजोर की आह इन्सान को बर्बाद कर देती है। जिसका नमूना तुम देख चुके हो। हां भाई मैं कसम खाता हूं कि आज के बाद किसी को नही सताऊगा। खान साहब जब से आज तक किसी से नही लडें, उन्हें अपनी बीमारी याद आ जाती है। यह खान साहब कोई और नही स्वंय लेखक है।

 

डा0 फखरे आलम खान

(लेखक अक्षय गौरव पत्रिका में प्रधान संपादक है।)



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Akshaya Gaurav

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