आज प्रदेश के किसी भी जिले का समाचार पत्र उठाकर देखे तो उनमें वहां की एक औरत, एक बच्ची और एक मां इन तीनों की बेबसी ही पढ़ने को मिलेगी। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि ये बेबस है और इनका चीरहरण रोकने के लिए श्रीकृष्ण भी नही आने वाले है। शायद! कलयुगी मानव को देखकर कृष्ण भी डर गये है। इनकी मानसिकता भांप उनकी हिम्मत भी जवाब दे गई है। वही, मर्दानगी का ढ़ोग दिखाने वाले कुत्सित मानसिकता के कुछ लोग जो सिर्फ इनका नाजायज फायदा उठाने के लिए हमेशा ताक में लगे रहते है। जिन्हे किसी समाज या कानून का भय नही होता है। ऐसे लोग सिर्फ अपने बारे में ही सोच सकते है। ऐसी मानसिकता के ज्यादातार लोग गाव-देहात में देखने को मिल जाते है। जिस कारण महिलाओं की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है और बहू-बेटी सुरक्षित ही नही रही है। उन्हे ये पता नही होता है कब कोई उसकी इज्जत के साथ खिलवाड़ कर दे या कोई उसकी इज्जत पर अपनी बुरी नजर गड़ाए हुए है।
क्या एक महिला को शौच जैसे नित्यकर्म करने का भी कोई अधिकार नही है? क्या एक बेटी अपने परिवार के साथ बिना खौफ के सो भी नही सकती? क्या एक मां अपनी बेटी के साथ बाजार तक अकेले भी नही जा सकती है? क्या एक बेटी या बहू आपात परिस्थति में घर में अकेले नही रह सकती है? ऐसे अनेको सवाल है जो शिकार हो चुकीं महिलाओं के जेहन में उठते होंगे। आए दिनों ऐसी खबरें समाज को मुहं चिढ़ाती हुई अखबारों की शोभा बढ़ाती है। जैसे- बीतें दिनों की खबर है जिसमें किसी गांव में कुत्सित मानसिकता के दो युवकों ने एक बच्ची को सोते हुए परिजनों के बीच से उठाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। वहीं, किसी दिन एक समाचार पत्र में एक खबर बशर्माे की तरह शान से टंगी हुई थी मानो खुद को विश्व सुदंरी समझ रही थी, जिसमें शौच के लिए गयी एक महिला को कुछ युवकों ने दबोच लिया और दुष्कर्म किया। ऐसी ही न जाने कितनी खबरें समाचार पत्रों में हमें, आपको और सरकार को चिढ़ाती है लेकिन इसमें फर्क किसको पड़ता है? सिर्फ और सिर्फ एक महिला को। यह तो कुछ भी नही है अधिकतर घटनाएं तो ना पुलिस तक पहुंचती है न ही समाज तक। यहां तक कि कानो कान पड़ोसी को भी खबर नही होती और समझौता हो जाता है। आखिर अबला महिला की इज्जत का सवाल जो है।
वहीं दूसरी ओर कुत्सित मानसिकता के लोगों को इस बात से बल मिल जाता है और वे नये-नये शिकार बनाते है। जबकि किसी की हिम्मत नही होती है कि उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करें। बस वह तो अपनी बेटी होने का रोना रोते है। अगर कोई हिम्मत दिखाकर शिकायत के लिए पुलिस के पास पहुंचता भी है तो दूसरे पक्ष को प्राथमिकता मिलना आम बात होती है जो पहले पक्ष को बिल्कुल तोड़ने में कोई कसर नही छोड़ती, जिसकी चुगली समाचार पत्रों की खबरें स्वयं करती है। कभी-कभी तो बात यहां तक पहुंच जाती है कि पीडि़त महिला स्वयं आत्महत्या का कदम उठाकर अपनी जिन्दगी से इतिश्री करने का प्रयास करती है। करें भी क्यों न क्योंकि समाज में ऐसी महिलाओं को इज्जत की नजरों से कहां देखा जाता है। समाज तो दूर की बात है उनके खुद के रिश्तेदार भी उनसे दूरी बनाने लगते है।
देश का चर्चित मामला ही देख लिजिए दुष्कर्म पीडि़ता अरूणा जिसने 42 वर्षो तक एक अपना पूरा जीवन कोमा में अस्पताल के एक कमरे में गुजार दिया। जिसके रिश्तेदारो ने भी उससे दूरी बना ली थी। उस औरत के भी इस हादसे से पहले कई सपने होंगे लेकिन उसका अपराधी सोहन लाल आज अपनी सजा पूरी करके अपने नाती पोतों के साथ खेल रहा है और उसे कोई अफसोस नही है।
क्या यही स्थिति रहेगी समाज में महिलाओं की। नही महिलाओं की स्थिति बदल सकती है लेकिन महिलाओं के प्रति ऐसी कुत्सित मानसिकता को एक व्यक्ति या एक औरत या एक एनजीओ या अकेले सरकार नही बदल सकती है। इसे बदलने के लिए समाज को एकजुट होना होगा और ऐसी मानसिकता के लोगो को बाहर करना होगा और निडर होकर पुलिस के सामने इनकी करतूतों का खुलासा कर उन्हे सलाखों के पीछे धक्का देना होगा। इतना करने से ही हम अच्छे नही बन जाते है। इसके साथ ही हमें पीडि़त महिला को पहले जैसा सम्मान देना होगा और उसको उसकी ही नजरों में सम्मान की भावना को जगाना होगा।
अक्सर पंचायतों में तुगलकी फरमान दे दिये जाते है जो किसी काम के नही होते है जो सिर्फ समाज या बिरादरी को देखकर दिये जाते है। यदि वही पंचायत अपने अधिकारों का प्रयोग कुत्सित मानसिकता के दोषी को सजा दिलाने के लिए प्रयोग करे या उसका दोष साबित कर उसे पुलिस को सौप दे तो क्या इससे उनकी वाह-वाही नही होगी। क्योंकि अक्सर ज्यादातर ऐसी घटनाएं गावों-देहातों में ज्यादा होती है जिनको लेकर यहां की पंचायत अक्सर तुगलकी फरमान जारी करती है। जैसे उम्रदराज उम्र के व्यक्ति ने किसी बालिका से दुष्कर्म किया है उसकी उससे विवाह करा देने का तुगलकी फरमान जारी कर देते है और ऐसे ही कई मामले है जिनका कोई मतलब ही नही है।
वही, सरकार समय-समय पर महिला सशक्तिकरण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों को आयोजित करती है लेकिन वास्तव में इन कार्यक्रम का कोई लाभ लक्षित समुदाय को मिल रहा है। इस तरफ किसी ने सोचने की कोशिश की है। शायद नही! भला कोई क्यो सोचेगा क्योंकि आज के भौतिक युग में किसी के पास इतना समय ही नही है और जिन्हे इस बारे में सोचने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है वो सिर्फ फार्मेलिटी पूरी कर इतिश्री कर लेते है। समाज और सरकार की नजरों में एक कर्मठ नौकरशाह या मंत्री बन जाते है। लेकिन क्या कार्यक्रम का संदेश वास्तव में उन लोगों के पास भी पहुंचता है जिन्हे इसकी जरूरत है। मुझे लगता है जो जाने माने चेहरे होते है या जिन्हे नामित किया जाता है उन्हे ही सम्मानित कर दिया जाता है और इतिश्री कर ली जाती है। अक्सर ऐसे कार्यक्रम गांव-देहात तक तो पहुंचते ही नही और मात्र शहरों में ही सीमित रह जाते है। जिससे गांव देहात में महिलाओं का एक बड़ा तबका सरकार की महिला जागरूकता के कार्यक्रमों से दूर हो जाता है।

Written by R.S. Bisht
E-mail : rsbisht.mrt@gmail.com


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Akshaya Gaurav

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