शाम की तन्हाई में, तुम्हारी याद बहुत आती है

जब होने लगता है अधेरा, सुर्य के जाने के बाद
सुबकने लगता हुँ तुम्हारी, आँचल में छुपने के लिए
जब मेरी आँसू रूकती नहीं,
मैं खुद ही पोछ लेता हुँ, माँ
तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है, माँ

मैं तुमसे अपना दर्द कहता नहीं,
इस भीड़ में कोई अपना नहीं, ये मैं तुमसे कैसे कहुँ
तुम ही मेरी जिंदगी हो, तेरे बिना मैं कैसे जिउँ
अपने से दुर कर दिया तुमने मुझे, अब तेरे बिना मैं कैसे रहुँ
मैं बहुत बुरा हुँ ना, माँ

तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है, माँ
तुम्हारी बातें जब भी याद आती है मुझे
मैं अपने चेहरे को आईने में चुमता हुँ
बाबू बोल कर अपने गालों को सहलाता हुँ
तुम्हारे दिये चॉकलेट को अपनी आँसूओं से भीगी होठों से लगाता हुँ
तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है, माँ
तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है, माँ

मैं क्या हुँ, कैसा हुँ; तुझे पता है ना माँ
तुम्हारे रक्त का प्रतिबिम्ब हुँ मैं
मेरे ह्रदय में तुम्हारी ही तस्वीर है
मैं अपनी दुनिया तुम्हारे चरणों में देखता
तेरे बिना मैं नहीं संभल पाता,
क्या ये मेरी खता है, माँ
तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है, माँ 


लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है अौर आप सामाजिक, साहित्यिक तथा शैक्षिक परिवेश पर लेखन करते हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।



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Akshaya Gaurav

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