आज परीक्षा का अंतिम परिणाम आया तो उसमें भी मेरा नाम नहीं था, पता नहीं? मेरी किस्मत में क्या लिखा है, कब मेरी जॉब होगी यह कहते हुये मैं रूँआसा हो गया था। आप तनिक भी घबराओ नहीं जब कुछ अच्छा होने को रहता है तो ईश्वर हमारे हाथ को खाली कर देते हैं जिससे हम अपनी खुशीयों को दोनों हाथों से समेट सकें, रूद्राणी ने मेरे चेहरे से गिरती आँसूओं को पोछ्ते हुये बोली। मै रूद्राणी के सामने नि:शब्द हो गया।
अगले दिन मै कोलकाता के वही पुराने ऑफिस पहुँचा और अपने केबिन में चला गया। मै अपने भविष्य को ले कर पूरे दिन परेशान रहा। शाम में ट्रेन द्वारा ऑफिस से घर लौट रहा था।  ट्रेन में अचानक किसी ने आवाज दी परम जी? मैने मुड़कर देखा तो मै पहचान नही पाया और पूछ ही दिया जी आप कौन? उन्होने बोला ‘आपने मुझे नही पहचाना’? मैने कहा नहीं? तो उसने शूरू की ‘जी मै प्राची बनर्जी हुं और मैं आपके ऑफिस में आज ही ज्वाइन की हुँ, आप तो अपने ऑफिस के स्टाफ को ही नही पहचानते और मुझे देखिए मैने झट से आपको पहचान लिया। हुँ न मै स्मार्ट, बोलिये? हाँ बोलिये? बोलिये? मैने युँहि अपना सर हाँ में हिला दिया और वो मंजिल के अंतिम पड़ाव तक बोलती रही, मैं चुपचाप सुनता रहा या कहें उसने मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया।
सुबह-सुबह वो मेरे केबिन में आ जाती कुछ बातें करती, मेरे अकेलेपन में उसका मेरी जिंदगी में आना, मुझे जिंदगी को जिने की आशा दे दी, उसकी मिठी मुस्कान ने मेरे दिल को जीत लिया, उसकी प्यारी बातों ने मुझे बहुत प्रभावित किया, शायद मुझे उससे प्यार हो गया था। वो मेरे दिलो-दिमाग पर धीरे-धीरे छाने लगी फिर शूरू हो गयी हमारी मोहब्बत् और ये मोहब्बत कब हमारी जरूरत बन गयी। मुझे पता नही चला, मुझे याद है जब मै मुम्बई गया था परीक्षा देने और उसमे भी मेरा अंतिम चयन नही हुआ तथा मै रूआसा होकर प्राची को फोन किया तो मुझे रूँआसा देख कर उसने मुझे तब तक ‘मै आपसे प्यार करती हुँ’ बोलती रही जब तक मैने हँस नही दिया, मेरे सोये हुये प्रेम को प्राची ने कुरेद कुरेद कर बाहर निकाल दिया, सत्य है। जब इसान जिद्गी के तलाश मे रहता है तो उसे एक सहारे की आवश्यकता होती है और जब सहारा लक्ष्य बन जाये तो जिदगी और भी खुबसूरत लगने लगती है।
 
करीब दो साल बाद मुझे आई आई टी त्रिवेन्द्रम में जॉब मिल गयी इन दो वर्षों मे प्राची ने एक सच्चा हमसफर होने का परिचय दिया था, मेरी हर वस्तु से उसने प्यार किया और मुझे भी उसकी हर अदा से सच्चा प्रेम हो गया था, मै तो उसके बिना साँस भी नही ले पाता था, वो हमेशा मुझे फोन पर बोलती रहती खाना खाये, घड़ी बाँधे की नहीं, अच्छा सा शर्ट पहन कर ऑफिस जायेगे न, समय पर खाना खा रहे हैं न, परम आपको पता है कुछ दिन बाद जब मैं आपके पास दुल्हन बन कर आ जाउँगी तो न? मैं आपको बहुत तंग करुगी, बहुत बातें करूँगी आपसे। अब तो आपको मुझे जिंदगी भर झेलना होगा, ‘मै तो भूत हुँ परम साहब’ एक बार आपको पकड़ ली, तो अब जिंदगी भर नही छोड़ुगी, प्राची के मुहब्बत और अपनापन देख कर मेरी तो हालात यह हो गयी थी की प्राची के बिना मै जीवन जीने का कल्पना भी नही कर पा रहा था और ये लाजिमि भी था क्युंकि प्राची भी मेरे से सच्चा प्यार करती थी और वो भी मेरे बिना जीवन नही जी सक्ती थी इसलिए अब हम दोनों ने फैसला किया की हम शादी कर लें फिर मै उसके पिता से मिला उन्होने साफ शब्दों मे मना कर  दिया ‘बेटा आप तमिलनाडु से हो और हमलोग बंगाल से है, हम दोनो की संस्कृति भिन्न है।
प्राची के पिता की बातें सुन मै तो सकते मे आ गया, मै कुछ बोलता तब तक उन्होने दरवाजा बन्द कर दिया था, मै उनसे पुछना चाहता था ‘ जब ईश्वर ने रक्त में कोई अंतर नही किया, रूह में अंतर नही किया, तो हमारी सोच मे अतर कैसे हो गयी। पता नही? मैने प्राची मे अपनी माँ का अक्स देखा था, मेरी माँ तो तमिल थी और प्राची बगाली फिर मुझे उसमे माँ का अक्स क्यूँ दिखाई दिया, ना जाने कब हमारे बुजुर्गो की मानसिकता बदलेगी, ना जाने उन्हे कब समझ आयेगा कि शादी दो दिलों का मिलन होता है न की दो शरीर का और जिस शादी मे दिलो का मिलन होता है वो जाति या समुदाये नही देखा करती उसे तो बस दिल को सभालने वाला चाहिये, जिस तरह एक कलम जज के हाथो से लिखती है परंतु उस कलम को ये नही मालुम की उसने क्या लिखा। ठीक ऐसे ही ये दिल प्यार कर लेता है और मालुम नही की सामने वाला दिल किस जाति और किस प्रदेश का है।
खैर, मै अपने आप को सँभालते हुये प्राची को फोन किया, परंतु प्राची का उत्तर सुन कर मै तो हतप्रभ रह गया, मेरा दिल और दिमाग सुन्न हो गया, मेरी आखो से अविरल अश्रुधारा फुट पड़ी, मेरी दुनिया समाप्त हो चुकी थी, मेरे ख्वाब टूट चुके थे, कल तक मैं उसके लिये सब कुछ था आज वो मुझे छोड़ चुकी थी, समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूँ, मैं किसी तरह अपने कमरे में पहुँचा और ईश्वर अयप्पा स्वामी के सामने खड़ा हुआ इधर आँखो से लगातार आँसू गिरते जा रहे थे, मेरी आँसूओं को पोछकर हँसी देने वाली अब वापस नहीं आने वाली थी, मैने लम्बी साँस लेते हुये कहा, काश मेरी जिन्दगी मे एक रीसायकल बिन होता, तो पुन: रीस्टोर कर लेता मैं उन लम्हों को और पूरा कर देता मेरी और प्राची की अधूरी कहानी को।

आशीष कमल
सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष
योजना एवं वास्तुकला विद्यालय,
विजयावाड़ा , आन्ध्र प्रदेश
Mob. 09440614701
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in



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Akshaya Gaurav

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