मानसून सत्र का आगाज हो चुका है। भारतवर्ष के तमाम योद्धा संसद भवन पहुंच चुके हैं। पक्ष विपक्ष के बीच घमासान हो रहा है,इसमें किसी भी पक्ष का कोई नुकसान होता दिखाई नही दे रहा। इन योद्धाओं को डी0ए0टी0ए0 मिल जाएगा। नुकसान आम जनता को उठाना पड रहा हैं। उक्त कार्यवाही में करोंडो रुपये का नुकसान केवल जनता से वसूले टैक्स का हो रहा है। विपक्ष का कहना है पहले घोटाला करने वालो को हटाओं फिर संसद चलेगी,ऐसा आज नही हो रहा जो लोग आज सत्ता में बैठें है वही कल विरोधी दल के नाते संसद में वही किया करते थे जो आज विरोधी है। बात सिर्फ इतनी है कि सत्ता परिवर्तन हो गया,तौर तरीका वही पुराना है। अब प्रश्न यह उठता है कि जो लोग घोटालो का राग अलाप कर यहां तक पहुंचे है उन लोगों में ये घोटाले क्यों हो रहे है। वह लोग तो अपने को राष्ट्र हितैषी कहने वाले थे। वह एक दम भ्रष्ट कैसे हो गये। जो इल्जाम वह दूसरो पर लगा रहे थे वही इल्जाम उन पर कैसे लग गये।
अब प्रश्न यह उठता है कि कमी कहां है। हमें उस पर विचार करना होगा। सत्त में लोग केवल इसलिए आते हैं कि सत्ता का सुख भोग सके चाहे उसके लिए हमें कितने ही घोटाले क्यों न करने पडें। इसका मतलब यह हुआ कि भारत को किसी से प्यार नही,उसे तो केवल अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। या यूं कहें कि भारत को भारत के रहबरो ने किराये का मकान समझकर उसका उपयोग करना समझा हुआ है। भारत की किसी को कोई चिन्ता नही । आज भारत की आर्थिक स्थिति कहां पहुंच गई है। घरेलू उद्योग धन्धें दिन पर दिन बन्द होते जा रहे है। गरीबी अपनी चर्म सीमा तक पहुंच रही है। भारत का उद्योग चरमरा गया है फिर भी मेक इन इण्डिया का नारा जोर शोर से दिया जा रहा है। भारत के प्रधानमंत्री विदेशो का दौरा करके विदेशो को भारत के लिये आमंत्रित कर रहे है। वे भारत को क्या देना चाहते हैं। जब हमारे उद्योग बन्द हो जायेगें तो हम विदेशो में क्या भेजेंगें। भारत कृषि प्रधान देश हैं। यहां के तीज-त्यौहार भी कृषि पर आधारित है,लेकिन आज जो संसद में भूमि अधिग्रहण बिल लाने की तैयारी हो रही है उसका असर सीधा हमारी सभ्यता पर पडेगा। कल जब दशहरा आयेगा कौन  सी फसल का पूजन होगा। दिपावली पर कौन सी फसल का पूजन करेंगें। 
होली पर कहां से गेंहूं की बाली लायेंगें। भारतवर्ष कृषि प्रधान की जगह कंकरीट का जंगल बनता जा रहा है। हमारी पहचान कृषि के रुप में थी,आज वही नष्ट होती जा रही है। इसके लिये कौन जिम्मेदार  हे। आज भारत मां का सेवक बनने के लिए भारत की पार्टिया केवल आगे जो की नीतियों का अनुसरण करती दिखाई दे रही है। वे साम्रप्रदायिकता की खेती करके उसे प्रवान चढाकर फसल काटना सीख गई है,जिस कारण आज उनके हौसलें बुलन्द है। वह यही साम्रप्रदायिकता की फसल को बढावा देने के लिए पार्टियों के नेता एक दुसरे पर धार्मिक उन्माद की बात करने लगे हैं। उनका यह ख्याल है साम्रप्रदायिकता से ही सत्ता में वापसी की जा सकती हैं। जिसके लिए पार्टियों ने अपने योद्धा छोड दिये है,जो साम्रप्रदायिकता फैलाकर सत्ता की फसल तैयार करने में लग गये है।अब प्रशन यह उठता है इसके लिए हम किसको दोषी ठहराया/देखा  जाएं। 
इस साम्रप्रदायिकता के लिए केवल वही पार्टिया दोषी है जिन्होने अपने को धर्म निर्पेक्ष कहा,धर्मनिर्पेक्ष पार्टियांे ने ही यह साम्रप्रदायिकता का बीज बोया है। उन्होने अपने शासन काल में केवल धार्मिक उन्माद का डर दिखाकर सत्ता में बने रहें। लेकिन यह डर निकलने में पचास साल का समय लगा,क्योंकि डर दिखाने के अलावा उनके उत्थान के लिए कुछ नही किया। इसी कारण इन लोगों का इस पार्टी से मोह भंग हो गया,और धार्मिक उन्वाद वाले सत्ता में आ गये। आज भारत की समस्त पार्टी कहती कुछ है और सत्ता में आने के बाद करती कुछ हैं। भारत की अपेक्षा अपनो ने ही की है। हर नेता देश के उत्थान के बारे में कहता बहुत है,परन्तु करने की उसके पास इच्छा शक्ति नही रही। सत्ता में आने के बाद सब भूल जाता है। अन्त में यही कहना उचित होगा- जैसा तू वैसा मैं।


डा0 फखरे आलम खान
अमता हाउस, जैदी नगर सोसाईटी, मेरठ
(लेखक अक्षय गौरव पत्रिका में प्रधान संपादक है।)


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Akshaya Gaurav

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