आज भारत मेक इन इन्डिया के नाम से संसार को जनवाने की कौशिश मे भारत के सत्तारुण नेता जी जान से लगे है। क्या वाकई भारत मेक इन इन्डिया हो जायेगा।
प्रधान जी आप ठहरे किसान आपको मेक इन इन्डिया के नारे क्या सरोकार, तुम तो अपनी फ्रिक करो।
क्यों मुझे क्या हुआ मै तो कृषक हूं, अपनी खेती करके पूर्वजो के मार्ग पर चल रहा हूं।
खेती तो जब करो तब तुम्हारे पास यह धरती रहेगी।

क्यों धरती को कौन छीनेगा।
सरकार, तुमसे धरती छीनेगी। वह भी देश में कानून बनाकर, जब तुम क्या करोगे?
यह तो अनर्थ हो जायेगा। भारत की सभ्यता ही छिन जायेगी। भारत की पहचान कृषि प्रदान देश के रुप में होती है। जब कृषि नही होगी तो देश का जो स्वरुप है उसका क्या होगा ? हमारी सभ्यता त्यौहार सब कृषि पर आधारित हैं। अगर ऐसा होगा तो यह हिन्दू संस्कृति पर हमला होगा।
प्रधान जी आज दुख इस बात का है कि जो सरकार आज भारत में शासन कर रही है वह अपने को हिन्दू हितैशी कहकर ही सत्ता में आई है।
यह कैसी सरकार जो भारत के मूल सिद्धान्त को ही नष्ट करने में लगी है।
प्रधान जी पहली सरकार के दौर में किसान आत्म हत्या कर रहे थे। आज भी हत्या कर रहे है। किसान को भारत के लोग अन्नदाता कहते थे। अब भारत का अन्नदाता सडको पर आता जा रहा है।
शर्मा जी आजादी हमने जब से हासिल की तब से आज तक भारत के लोगो की परवाह किसी को नही हुई। आज जिधर देखो उधर ही घोटालो को पिटारा खुला दिखाई देता है। मौजूदा सरकार जब भारत के लोगों ने इस विश्वास के साथ चुनी थी कि इन्हें सत्ता स्वाद नही लगा हैं। यह जनता की सुख सुविधाओ का ध्यान रखेगें। परन्तु  बुर्जुगो ने कहा है जो रोया पिछलो को रोया। वही मिसाल आज यर्थात होती दिखाई दे रही है। अब भारत की जनता किसे अपना हितैशी समझें। किसको अपना मत दें। उसकी फरियाद सुनने वाला कोई नही है।
भारत एक प्रतातन्त्र देश है। यहां अपनी बात रखने का तथा विरोध पृकट करने का तरीका है। मगर विरोध का भी तरीका बदल गया हे। आज विरोध किसानों के समर्थन में न होकर वोट बैंक के साथ में इस्तेमाल होने लगा है। इसकी मिसाल सबके सामने है जो लोग किसानो के हित के लिए आन्दोलन संसद से सडक तक चला रहे थे, वही आज सत्ता में बैठ कर किसान विरोधी बिल लाने की तैयारी कर रहे है।
ठीक कह रहे हो। आज प्रजातन्त्र को कवल सत्ता हासिल करने का तरीका रह गया है। इस मसले का हल केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर है वह तभी सम्भव है जब भारत के राजनेता अपना निजि स्वार्थ त्यागकर राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर आम जनता की परेशानियों का निराकरण करें। तभी भारत का हर भारतवासी राम राज्य का सपना देख सकता है। इसके लिए सरकारे दोषी है या भारत की जनता। भारत का मतदाता धर्म की आंधीं में बहकर अपने मताधिकार का प्रयोग करता है। धर्म बुरी चीज नही है ,धर्म मानव को अच्दे बुरे का ज्ञान कराता है लेकिन हम विकास को छोडकर धार्मिक झगडों में फंसकर देश की अर्थव्यवस्था से खिलवाड करने में लग जाते है। कही भी साम्प्रदायिक उन्माद होता है उससे हमारे कारोबार तो प्रभावित होते है। इसी कारण हम विकास की दौड में पिछडते जा रहे है। हम देश को कहां ले जाना चाहते है । इस विषय पर सरकारे नही आम भारतीयों को सोचना होगा कि हमें विकास चाहिए या धार्मिक उन्माद तभी भारत मेक इन इन्डिया की ओर अग्रसर हो सकता है।


डा0 फखरे आलम खान
अमता हाउस, जैदी नगर सोसाईटी, मेरठ
(लेखक अक्षय गौरव पत्रिका में प्रधान संपादक है।)


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Akshaya Gaurav

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