“टिक-टाक-टिक-टाक!”
स्विच से खेलते हुए 3 साल के ‘सोमू’ को उसके बाबा ने डांटा और गोद में उठाकर नीचे ले गए! “तुम्हे सब कब से नीचे ढूंढ रहे हैं और तुम यहाँ तिमंजिले पर चढ़े हो! मना किया है न बाबू तुमको ऊपर आने के लिए? जाने क्या प्यार है तुमको इस स्विच से, जब देखो इसी में लगे रहते हो खिटिर पिटिर, सारे खिलौने छोड़कर!”
सोमू को जब कभी भी मौका मिलता अपने छोटे छोटे क़दमों में सीढ़ी चढ़कर घर के तीसरे माले वाले सुनसान कमरे में आ जाता था! और एक कोने में बैठकर लाईट का स्विच ऑन ऑफ करता रहता! कई बार तो घर वालों ने सीढ़ी पर कुण्डी भी लगा दी पर वो हर दूसरे दिन पहुँच जाता था वहां! उस कमरे में उसकी दादी ने सुसाइड की थी, इसलिए वो बंद रहता था! सोमू के बाबा, 'कर्नल साहब' ने उसमे ताला नहीं लगवाया क्यूंकि वो मानते थे कि उनकी पत्नी अभी भी वहां है!
सोमू की स्वर्गवासी दादी की एक ख़ास आदत थी वो हर बात बोलने के बाद अपनी नाक पर हाथ फेरती थी! और सोमू भी वैसा ही करता था यही ख़ास वजह भी थी की उसके बाबा उससे बहुत प्यार करते थे! सोमू की मम्मी कहीं न कहीं माँ होकर भी सोमू को उसके बड़े भाई से कम प्यार करती थी! क्युकी सोमू में उसकी दादी की झलक थी! और वो अपनी साँस से बेपनाह नफरत करती थी! मोहल्ले के लोग तो ये भी कहते थे कि सोमू की माँ रंजीता, ने ही दादी को मारा है! पर ये खाली उडती उडती अफवाह थी!
दादी की सुसाइड का कारण सोमू की माँ से होने वाली रोज रोज की लड़ाई और पारिवारिक कलेश था! दादी को लगता था कि सोमू की माँ ‘रंजीता” का रिश्तेदारी में किसी गैर मर्द से भी कोई सम्बन्ध था! और उसका चाल चलन ख़राब था! इसको लेकर वो कई बार घर में लड़ाई कर चुकी थी! रंजीता के पति को उस पर बड़ा विश्वास था! उसके लिए वो अपनी माँ पर भी चिल्ला देते थे! एक दिन उसने अपनी माँ को ज्यादा बुरा भला कह दिया, बात बेहद बढ़ गयी तो गुस्से में उन्होंने फांसी लगा ली!
रंजीता बड़े ही अजीब किस्म की औरत थी! इतना कुछ होने के बावजूद उसके रंग ढंग पर कोई असर नहीं पड़ा! 42 की उम्र में भी वो उसके साज श्रृंगार में कोई कमी नहीं रहती थी! हर दिन यूं सजती थी जैसे कि बस शाम में लड़के वाले देखने आ रहे हो! कोई दिन नहीं जाता था की जब वो बालों में फूल न लगाए! गाढ़ी मेहरून लिपिस्टिक और डीप नेक का स्लीवलेस ब्लाउज उसका सिग्नेचर अटायर था! सांवले रंग की रंजीता के नैन नक्श बड़े ही तीखे थे जो भी उसको देखे नजर एक पल को ठहर ही जाती थी! ख़ास गुलाब का इत्र मंगवाती थी प्रोफ़ेसर साहब से और रोज सुबह-शाम लगाती थी! वो अपनी उम्र की औरतों से बेहद अलग थी! शरीर एकदम कसा हुआ, और चेहरे पर नमक देखने लायक! जब वो गुस्सा होती तो प्रोफ़ेसर साहब उसे प्यार से कहते थे “अरे मेरी बीवी तो एकदम रति अग्निहोत्री लगती है!” ये सुनकर वो बहुत खुश होती थी!

इस उम्र में भी मोहल्ले में उसके कई सारे नन्हे मुन्ने आशिक थे! जो उसके छत पर आने का इन्तेजार करते रहते थे! खैर उसका अंदाज़ भी वैसा था की जिसको देख ले तिरछी नज़रो से वो अपना काम धाम भूल जाए!
रंजीता सिर्फ 8वी पास थी और सोमू के पिता प्रोफेसर, पर उसकी फोटो एक नजर देखते ही उनके अन्दर के बुद्धिजीवी ने सीने पर विश्वामित्र का टैटू बनवा लिया! और अपनी माँ से बोल दिया की शादी करूँगा तो इसी से! रंजीता उस वक़्त भी किसी और से प्यार करती थी और एक बार घर से भागते हुए पकड़ी गयी थी! इसी के चलते छोटे उम्र में ही उसकी शादी कर दी घर वालों ने! शादी के बाद ही जाकर ये बात खुली पर वाक्या पुराना था सो दब गया!
आज घर में सोमू की दादी का ‘बरसी’ का फंक्शन था और सभी रिश्तेदार आये हुए थे! सुबह से ही तैयारियां लगी हुई थी! रंजीता घर के काम काज में बहुत तेज थी! सारा खाना उसने अकेले ही तैयार करवाया था! शाम होते होते लगभग सभी रिश्तेदार आ चुके थे! और कुछ आ रहे थे! सोमू के बाबा, कर्नल साहब, के घर के बाहर एक मकान की जगह जितना बड़ा आँगन था! टेंट वही लगे थे! सब रिश्तेदार खाना खाते हुए बात चीत कर रहे थे! रिश्तेदारों में से सोमू के दूर के फूफा, रमेश, जो कि ठेकेदार थे, जिनका मोटा पेट उनकी कमीज से बाहर निकलने की भरपूर कोशिश कर रहा था! उनकी मोटी-मोटी उँगलियाँ अंगूठियो से लदी हुई थी और हाथ में एक मोटा सा सोने का ब्रेसलेट!
“बताओ बरसी में भी पीकर आयें है! हद्द है!” फंक्शन में आये हुए लोग रमेश को देखकर आपस में खुसुर फुसुर कर रहे थे!
रमेश सारे रिश्तेदारों को छोड़कर सिर्फ रंजीता में मशगूल थे! रमेश की बीवी उन्हें बार बार घर चलने के लिए बोल रही थी पर वो किसी पेमेंट का बहाना करके बार बार बात टाल रहे थे! उनकी एक नज़र पूरे वक़्त रंजीता पर ही थी! रंजीता भी उनको बीच बीच में आँखों के किनारों से देख रही थी!
“अरे आपने खाना खाया? आईये साथ में ही खा लेते है! हमारी मिसेस तो दो बार खा चुकी हैं!” ये कहकर रमेश अपनी मोटी सी गर्दन झुकाकर जोर जोर से हंसने लगा! “मै तो प्रोफ़ेसर साहब के साथ ही खाती हूँ!” रंजीता अपने पति की ओर देख कर मुस्कुराते हुए बोली!
“अरे तो आज हम तीनों साथ खा लेंगे! क्यों प्रोफ़ेसर साहब?” प्रोफ़ेसर साहब ने धीरे से मुस्कुरा दिया!
रमेश की पत्नी को उसका ये फूहड़पन बेहद ख़राब लगता था! पूरी रिश्तेदारी में बदनाम था वो! पर सम्बन्धी होने के खातिर सब बुलाते थे उसे!
खाने पीने का दौर ख़त्म हो रहा था! और सब अपनी अपनी तैयारी में थे! रात के 10.30 बज चुके थे! प्रोफ़ेसर साहब को आगरा में लेक्चर देने जाना था! और ट्रेन सुबह 4 बजे की थी! इसलिए वो अपने कमरे में जाकर सो गए थे! कुछ रिश्तेदार बचे थे! कुछ दुसरे शहर से आये थे तो रात में कर्नल साहब के यहाँ ही रुक गए! फंक्शन ख़तम होने को था! अपने दूर के भाई को कर्नल साहब दरवाज़े तक छोड़ने गए थे तो उनके भाईसाब ने बोला “अरे सोमू को भी बुला दो भाई जाते जाते देख लें, अब देखो कब आना हो फिर?” कर्नल साहब ने पीछे मुड़कर बोला “अरे सोमू कहाँ है? सो गया क्या?”
घर के बाकी लोगों को भी कोई आईडिया नहीं था की सोमू कहाँ है! कर्नल साहब ने आवाज लगाई “सोमू? ओ सोमू? कहाँ चला गया? ये लड़का बड़ी देर से दिखा भी नहीं! पूछो तो इसकी मम्मी से!”

टेंट के पीछे देखा गया, नीचे वाले फ्लोर के सारे कमरे देखे गए पर सोमू कहीं नहीं था! कर्नल साहब परेशान होने लगे “अरे रंजीता कहाँ है पूछो उसको सोमू कहाँ गया? खोज हुई तो रंजीता का भी कोई पता नहीं! पूरा घर छान मारा पर सोमू की कोई खबर नहीं! सभी रिश्तेदार एक जगह जमा हो गए! सबको फोन किया जाने लगा! रंजीता के पति भी ये सब सुनकर उठ गए! तभी कर्नल साहब एकदम से बिना कुछ बोले सीढ़ी की तरफ भागे! और बाकी रिश्तेदार भी उनके पीछे!
हाँफते हुए तिमंजिले पर दादी वाले कमरे के पास पहुचे! सारे रिश्तेदार भी उनके साथ ही थे! जैसे ही वो लोग कमरे के अन्दर पहुचे तो कमरे में अँधेरा था! बाहर तेज बारिश शुरू हो गई थी और बादल कड़क रहे थे! लाईट ऑन करने के लिए कर्नल साहब ने बटन टटोला अँधेरे में, उससे पहले ही स्विच ऑन होने की आवाज आई!
“टिक!”- लाईट जैसे ही जली उनकी नज़र गयी सामने बिस्तर पर जहां रंजीता और रमेश साथ में लेटे हुए थे! लाइट खुलते ही वो बुरी तरह सकपका गए!
लाईट फिर बंद हुई! “टाक!”!
और फिर खुली! “टिक!”,
सबकी नज़र गयी 3 साल के मासूम से सोमू पर जो स्विच के पास फर्श पर घुटने मोड़कर बैठा हुआ मुस्कुरा रहा था! उसने अपनी माँ की ओर देखा, एकदम अपनी दादी की स्टाइल में नाक पर हाथ फेरा और एक बड़ी ही अजीब सी हंसी के साथ बोला
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“टाक!”

-अविनाश सिंह



Axact

Akshaya Gaurav

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