डा0 सादिका नवाब ‘सहर’


हिन्दी में ग़ज़ल को एक नया नाम देने की इच्छा जागी और ‘गीतिका’, ‘गीतल’, ‘अनुगीत’, ‘नयी ग़ज़ल’, ‘आवामी ग़ज़ल’, ‘जनवादी ग़ज़ल’, ‘जातीय ग़ज़ल’, ‘सोहनी’, ‘गज्जलिका’, ‘ग़ज़लिका’, ‘मुक्तिका’, ‘तेवरी’, ‘भणिति’ जैसे नाम हवा में उछले। आज के लोकप्रिय ग़ज़लकार ‘नीरज’ ने हिन्दी ग़ज़ल को ‘गीतिका’ नाम दिया। आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल के सशक्त ग़ज़लकार ‘चन्द्रसेन विराट’ इसे ‘मुक्तक’ की संज्ञा देते हैं। ‘‘वर्तमान कालमें जबकि इस विधा (ग़ज़ल) का पूर्ण प्रचार एवं वैकल्पिक नाम नहीं हो जाता, हिन्दी ग़ज़ल को ‘मुक्तिका’ की संज्ञा से जाना जा सकता है’’1
  माधव मधुकर परंपरागत ग़ज़ल से हिन्दी ग़ज़ल के कथ्य में बदलाव के कारण उसे ‘आवामी ग़ज़ल’, ‘जनवादी’ या ‘जातीय ग़ज़ल’ की संज्ञा देने के हक़ में हैं। ज़हीर क़ुरैशी ग़ज़ल के लिए ‘हिन्दी प्रकृति की ग़ज़ल’ नाम उचित समझते हैं। ‘तेवरी पक्ष’ के संपादक रमेश राज हिन्दी ग़ज़ल की नयी तेवरोंवाली प्रकृति के कारण उसे ‘तेवरी’ नाम देने के पक्ष में हैं। तेवरी नाम का समर्थन करनेवालों से उसका विरोध करनेवालों की संख्या बड़ी है। आलोक भट्टाचार्य ‘ग़ज़ल बनाम तेवरी’ नामक अपने निबंध में कहते हैं-
      ‘‘अलीगढ़ी तेवरी अच्छी ग़ज़ल है। ग़ज़ल है, तेवर नहीं। उसे ‘तेवरी‘  कहने की कोई ज़रूरत नहीं।’’2 ‘‘दुष्यंत के तेवर क्या ख़ूब तेवर हैं, पर दुष्यंतने तेवरी नहीं ग़ज़ल कही। उन्हें ‘प्रवर्तक’, ‘संस्थापक’, वग़ैरह बनना नहीं था न!’’3
   यही नहीं अनेक ग़ज़लकारों ने ‘ग़ज़ल’ को ग़ज़ल कहने का ही समर्थन किया है। वास्तव में ग़ज़ल में तीखे बाण चलाने वाले तेवर बहुत पहले से मौजूद हैं। तीखे विद्रोह भरे तेवर भारतीय भाषाओं में आधुनिक युग की देन हैं। उर्दू में 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में ग़ालिब, इक़बाल, हाली औरा हिन्दी में दुष्यंत कुमार ने साठ के आस-पास आम आदमी से जुड़ी ग़ज़लें कहीं। कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं:-


          ‘‘जो मैं सर-ब-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीं से आने लगी सदा,

           तेरा दिल तो है सनम-आशना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में।’’4

             ‘‘है जुस्तजू कि ख़ूब से है ख़ूब तर कहाँ,
              अब देखिए ठहरती है जाकर नज़र कहाँ।’’5
            ‘‘जब कि तुझ बिन कोई नहीं मौजूद,
             फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है।’’6
         ‘‘यारब वो न समझे है न समझेंगे मेरी बात,
          दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।’’7


   ‘‘बांग्ला में ‘नज़रूल-इस्लाम‘ ने सत्तर-अस्सी वर्ष पहले बेहतरीन, क्लासिक, तेज़-तर्रार और ऐसी ग़ज़लें कहीं जो बांग्ला काव्य-साहित्य की अमूल्य-निधि है।’’8
   इसके अतिरिक्त मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलगू आदि भाषाओं में क़ाफ़ी बेहतर ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। यह और बात है कि हर युग की ग़ज़ल में किसी-न-किसी रूप से युगबोध झलकता रहा है। ग़ज़ल नाम के पक्षधर दुष्यंतकुमार जैसे हिन्दी ग़ज़ल के मील स्तंभ इसे ग़ज़ल कहते हैं। अपने ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ की प्रस्तावना में उन्होंने स्वीकार किया है कि ‘‘....उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़कऱ् कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा-से-ज़्यादा क़रीब ला सकूँ इसलिए से ग़ज़लें उस भाषा में कही गयी हैं, जिसे मैं बोलता हूॅं।’’9

           ‘‘जिन हवाओं ने तुझको दुलराया,

            उनमें मेरी ग़ज़ल रही होगी।’’10

  इनके अतिरिक्त ‘भवानी शंकर की हिन्दी ग़ज़लें’, ‘चैखटे के पार’, ‘निर्वसना चाँदनी’, ‘कचनार की टहनी’, ‘परिवर्तन की आहट’, ‘आस्था के अमलतास’ तथा ‘धार के विपरीत’ (चन्द्रसेन विराट), ‘एक टुकड़ा धूप’, ‘चाँदनी का दुःख’ (ज़हीर क़ुरैशी), ‘शामियाने काँच के’, ‘पत्थर की बाँसुरी’ (कुँअर बेचैन) आदि ग़ज़ल संग्रहों में हिन्दी ग़ज़लें लिखी गयीं। हनुमंत नायडू अपनी ग़ज़लों को हिन्दी ग़ज़ल की संज्ञा देना चाहते हैं। इसका कारण वे यह बतलाते हैं कि लिपि को छोड़कर भाषा के गठन के स्तर पर हिन्दी और उर्दू में अंतर नहीं है, जिसके कारण हिन्दी ग़ज़लकारों की बोझिल शब्दों से भरी ग़ज़लें पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। इन उर्दू प्रकार की ग़ज़लों से हिन्दी ग़ज़लों को पहचान दिलाने के लिए हिन्दी ग़ज़ल नाम का उपयोग करना आवश्यक है। हनुमंत नायडू का यह तर्क कुछ विचित्र-सा लगता है; क्योंकि आजकल उर्दू ग़ज़ल में भी हिन्दी के शब्दों का प्रयोग घड़ल्ले से होता रहता है। यहाँ उदाहरण स्वरूप देखें कि उर्दू की ग़ज़ल में हिन्दी-शब्दों का प्रयोग तथा हिन्दी-ग़ज़लकार के यहाॅं उर्दू-शब्दों के प्रयोग की छटा कैसे बिखरी हुई हैै:-

 ‘‘सभी बोल मधुर, सभी नैन सजल किन गलियों में तुम हमें ले आये,

  इस मन को न लोगो भटकाओं, यह मन है किसी के बंधन में।’’11

          ‘‘कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
           क्हाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।’’12

   हनुमंत नायडू ग़ज़ल को हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुसार, बिना बिन्दी के, उपयोग में लाये जाने का आग्रह करते हैं और हिन्दी ‘ग़ज़ल’ नहीं, ’’हिन्दी-‘गजल’’ की संज्ञा इसके लिए उचित समझते हैं, परंतु संस्कृत निष्ठ हिन्दी शब्दावली को उसके लिए उपयुक्त नहीं समझते।
   इस सारे विवेचन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पंजाबी ग़ज़ल, गुजराती ग़ज़ल, मराठी ग़ज़ल की तरह हिन्दी ग़ज़ल की संज्ञा उचित है; क्योंकि विशेषण हिन्दी भाषा की ओर संकेत करता है। शब्द ग़ज़ल और संज्ञा ग़ज़ल उसकी परंपरागत विरासत, शिल्प और शैली की ओर। अतः केवल ग़ज़ल कहने का आग्रह भी उचित नहीं लगता।
             
 ‘‘शब्द ग़ज़ल अरबी भाषा का स्त्रीलिंग शब्द है जिसका अर्थ शब्द कोश में किसी सुंदर स्त्री से बातचीत करना है।’’13 (2) ‘‘प्रसिद्ध साहित्यालोचक प्रोफ़ेसर मसऊद हसन रिज़्वी ‘अदीब’ ने इसके अर्थ का विस्तार करते हुए इसे औरतों से बातें करने की बजाए, औरतों की बातें करना, करार दिया है।’’14 (3) ‘‘पारिभाषिक शब्दावली में ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ नारियों से प्रेम की बातें करना लिखा है।’’15
     कुछ साहित्यालोचकों के विचार से ग़ज़ल नाम के एक शायर के नाम पर इस विधा का नाम रखा गया है जो सारी जि़ंदगी प्रेम और मस्ती में मग्न रहा। कहीं-कहीं अरबी शब्द ग़ज़ल से भी इसका आरंभ माना जाता है, अर्थ है हिरण अर्थात् हिरण जैसी सुन्दर आँखोंवाली युवती के प्रेम में लिखी हुई कविता।

     ग़ज़ल के आरंभ के बारे में जो विचार अधिक विश्वसनीय माना गया है, वह यह है कि अरबी में क़सीदा विधा के पहले भाग को जिसे तशबीब या नसीब या क़ौल (ग़ज़ल) कहा जाता है ने इसको जन्म दिया। तशबीब को क़सीदे के परिचयात्मक भाग के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है जिसमें प्रकृति के दृश्यों मौसम आदि का हाल लिखा जाता था। ‘वज़ीर आग़ा’ के अनुसार सातवीं सदी हिज्री के शमसुद्दीन मोहम्मद बिन क़ैसूल राफ़ी ने पहली बार तशबीब, नसीब और ग़ज़ल जैसी शब्दावली के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा था कि तशबीब में शायर आपबीती का अन्दाज़ अपनाता है जबकि नसीब में वह जगबीती का तरीक़ा अपनाते हुए काल्पनिक और परंपरागत प्रेम को अपना विषय बनाता है। ग़ज़ल के बारे में उसने लिखा है- ‘‘हदीसे-ज़नान व सिफ़ते इश्क़-बाज़ी बा ईशां’’ है। 16 इसका अर्थ यह निकाला गया कि ग़ज़ल नारी से बात करने का एक ढंग है।
    क़सीदे के आरंभिक भाग में शायर प्रेम का एक ऐसा दृश्य और वातावरण पैदा करता है कि जिसमें उसकी कल्पना में युवाकाल की स्मृति, प्रेयसी का रूप और मिलन, विरह सभी दिखाई देते हैं और वह उनकी बातें करते हैं। क़सीदे के इस आरंभिक भाग नसीब, व शबील या कौल और ग़ज़ल की विधा में बहुत साम्य है किंतु दोनों के स्वभाव में बहुत अंतर है। वज़ीर आग़ा के अनुसार ‘‘यह फ़कऱ् सिर्फ़ नज़्म और ग़ज़ल का फ़कऱ् नहीं है बल्कि अरब और ईरान का भी है।’’17 क्योंकि रेगिस्तान में अपने क़बीलों के साथ फिरते-फिरते अरबी नये-नये अनुभवों से गुज़रता रहता था। जिसके कारण क़सीदा जैसी विधा ही रिवाज पा सकती थी। दूसरी ओर ईरान में प्राचीन युग से ही स्थाई समाज था। अर्थात् ईरान में व्यक्ति का महत्व होते हुए भी वह समष्टि का केवल एक पुजऱ्ा था और वह स्वयं अनुभवों से जूझने की जगह समाज के (सामान्य) अनुभवों से ज्ञान प्राप्त करता है। इसीलिए ग़ज़ल जैसी विधा साहित्य में प्रचलित हुई जो व्यक्ति और समष्टि के मेलजोल का परिणाम थी।
   उर्दू के प्रसिद्ध साहितयालोचक मजनँू गोरखपुरी के अनुसार- ‘‘ईरान में आरंभ से ही ‘चामा’ नामक एक ऐसी विधा प्रचलित थी जो हिन्दी की तरह शायरी भी थी और संगीत भी। चामा या चामाह ईरान के देहाती गाँवों में विशेषकर लोकप्रिय थे और स्त्रियों के कहे हुए चामाह बहुत आकर्षक और पसंदीदा हुआ करते थे।’’18
   डाॅं. रोहिताश्व अस्थाना ने ग़ज़ल का अरबी शब्द ग़ज़ल (हिरण) से संबंध बतलाते हुए लिखा है - ‘‘हो सकता है कि हिरण जैसे नेत्रोंवाली सुन्दरियों के संबंध में लिखी गई छंदों में प्रेम कविताएँ ही ग़ज़ल से अभिहित की जाने लगी हों परंतु ग़ज़ल का व्युत्पत्ति संबंधी विषय ग़ज़ल या मृग से जोड़ना समीचीन नहीं प्रतीत होता क्योंकि भारत के मृग के नेत्र सुन्दरता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ अवश्य ही दिखाई देते हैं जबकि अरब या ईरान में नरगिसी नेत्र को महत्व दिया जाता है यह तथ्य शांतिपूर्ण प्रतीत होता है।’’19
     डाॅं. अस्थाना का यह विचार जो शब्द ग़ज़ल से संबंधित है को मान्यता देने में कुछ शंका होती है; क्योंकि बाण खाए हुए ग़ज़ल या हिरण की आह जैसी हृदय में पीड़ा अनुभव करके काव्य में ढालने को ग़ज़ल कहा जाता है और हिरण की आॅंखों से इसका ज़रा भी संबंध नहीं है। ‘‘ग़ज़ल बहरहाल ज़ख़्मी ग़ज़ल की आह या तीरे-नीम-कश (अटका हुआ तीर) यह मेहबूब से बातें करने का नाम है। यानि यह इश्किया (प्रेम-परक) और विनाई (लयात्मक) शायरी हैं लेकिन यह इश्के हक़ीकी (अलौकिक प्रेम) भी हो सकता है और मज़ाजी भी। ख़ुदा से भी, किसी अक़ीदे (धार्मिक विश्वास) या किसी मुल्क से भी यानी मसला नज़ारे का नहीं, नज़र का है।’’20
    उर्दू, भाषा और साहित्य के सुधारक मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली ‘मुकद्दमा-

ए-शायरी’ में कहते हैं कि ग़ज़ल का विषय प्रेम के अतिरिक्त कुछ और नहीं।’’21 किंतु उर्दू के प्रसिद्ध साहित्य समीक्षक डाॅं. इबादत बरेलवी ग़ज़ल की परिभाषा इस प्रकार देते हैं -‘‘ग़ज़ल की विधा बुनियादी या मूल विषय प्रेम के मामलों या प्रेम संबंधित घटनाओं की विभिन्न कैफि़यतों का चित्रण है। स्वयं ग़ज़ल या तग़ज़्ज़ुल का अर्थ शब्दकोश के अनुसार सामान्यतः स्त्रियों से या स्त्रियों के संबंध में बातें करने से है किंतु ग़ज़ल की यह परिभाषा संपूर्ण और विस्तृत नहीं है। इसमें बहुत कुछ इज़ाफे़ की ज़रूरत है। ..... ग़ज़ल सिर्फ़ इश्क़ और मोहब्बत तक सीमित नहीं है, उसमें इन विषयों के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिसमें जीवन के नवीन पहलुओं का एहसास और उसका चित्रण भी मौजूद है इसमें दार्शनिकता की गहराइयाँ भी है और अपनी सामाजिक परिस्थितियों का एहसास भी, साथ ही ऐतिहासिक घटनाएॅं और राजनैतिक दृष्टिकोण भी प्रतिबिंबित होते है; अर्थात् इसके विषय उतने ही विस्तृत नवीन और संपूर्ण हैं जितना की यह जीवन है। ग़ज़ल की विधा की महानता का रहस्य इसी में है कि वह इन सभी पहलुओं को एक ऐसे साँचे में ढालकर और एक ऐसे रंग में रंगकर पेश करती है जो इसी के विशिष्ट है यह रंग वह है जिसमें विश्व की पीड़ा को भी स्थान मिलता है और प्रेम की पीड़ा को भी।’’22
   अरब जब ईरान पर विजयी हुआ और ईरान के साहित्य पर इनके प्रभाव पड़े तो क़सीदा जो अरबों के यहाँ बहुत लोकप्रिय था ईरान के दरबारी वातावरण में और पनपा। इन क़सीदों के दौरान शायर बादशाह या धनवानों की शान में ज़मीन-आसमान एक करते थे। इस युग में प्रेम और सौंदर्य को भी कसीदे के माध्यम से ही व्यक्त किया जाता था। क़सीदे के इस आरंभिक भाग में शायर प्रेम और परिस्थितियों के बारे में बहुत भावुकता के साथ लिखता था; क्योंकि इसके फौरन बाद इन्हें इस विषय से ‘गुरेज़’ करना (हरना) होता था अर्थात् उसमें कसीदे के वास्तविक विषय बादशाह की अतिशयोक्ति युक्त प्रशंसा करनी होती थी। कदाचित् इसीलिए कसीदें के पहले भाग तशबीब में वह बड़ा मन-मौजी हो उठता था।

बादशाह को हुस्न और इश्क़ जैसे विषय से प्रेम होता था और वह उसमें डूबना पसंद करता था। धीरे-धीरे क़सीदे की तशबीब का भाग अलग भी लिखा जाने लगा और ग़ज़ल के नाम से प्रचलित हो गया। ‘‘यह भी विचार है कि रौदकी ने क़सीदे से तशबीब के हिस्से को अलग करके उसको अपने तौर पर एक स्थाई विधा की हैसियत दी है और उसका नाम ग़ज़ल रखा है।’’23 ‘रौदकी’ को फ़ारसी का ‘बाबा आदम’ कहा जाता है। उससे पहले भी ग़ज़ल की विधा को एक स्थाई रूप देने की कोशिश भी अवश्य हुई होगी किंतु इस संबंध में ‘रौदकी’ का महत्व हर शायर ने स्वीकार किया है। ‘रौदकी’ ने ग़ज़ल में केवल प्रेम-परक विषयों को ही अपनाया है। कदाचित् यहीं कारण रहा होगा कि एक लंबे समय तक ग़ज़ल हुस्न और इश्क़ से जुड़ी रही। यानी ‘‘ग़ज़ल अरबी ज़बान का लफ़्ज़ मगर ईरानी शायरों की इस्तेलाह है।’’24 ‘‘प्रो. अदीब ने ग़ज़ल के आरंभ के बारे में दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, जो इस संबंध में हमारे काम आ सकते हैं। पहली पुस्तक ईरान के प्राचीन लेखकों की उपलब्ध पुस्तकों में से सबसे पुरानी है जिसमें ग़ज़ल की परिभाषा मिलती है। यह हैं ‘रशीदुद्दीन दक़वात’ की ‘हदाएॅं कुल बहर व दकाएॅंकुल शेर’ यह पुस्तक लगभग 550 हिज्री में यानी आज से 800 वर्ष पहले लिखी गई है। इसमें तशबीब, नसीब और ग़ज़ल को समानार्थक माना गया है।’’25 ‘‘रशीद अहमद सिद्दीक़ी ने ग़ज़ल को ‘उर्दू शायरी की आबरू’ कहा है।’’26
      ग़ज़ल शब्द भारत में अरबी भाषा से आया है। अरबी से फ़ारसी में इसे इसी नाम से अपनाया गया है और फ़ारसी से उर्दू फिर उर्दू से अन्य भाषाओं में ग़ज़ल, ग़ज़ल बनकर ही लोकप्रियता बटोरती रही है। कसीदे के चार भागों -‘तश्बीब’, ‘गुरेज़’, ‘मद्ह’ तथा ‘दुआ’ के पहले भाग तश्बीब को ग़ज़ल ही कहा जाता है। ग़ज़ल का स्वरूप क़सीदे के स्वरूप से साम्य रखता है अर्थात ग़ज़ल में क़सीदे की भाँति पहला शेर ‘मतला’ होता है अर्थात दोनों पद तुकांत होते हैं। अंतिम शेर मक़ता अर्थात कवि के उपनाम सहित होता है।
     ‘ग़ज़ल’ का नाम ‘ग़ज़ल’ कैसे पड़ा इस संबंध में विद्वानों में मत-वैभिन्य है- उर्दू भाषा को छोड़कर अन्य भाषाओं के काव्य समीक्षकों ने ग़ज़ल को उपेक्षित रखा है। ग़ज़ल के क्षेत्र में समीक्षात्मक साहित्य का अभाव आधुनिक युग में आश्चर्यजनक बात है जबकि आज ग़ज़ल केवल हिन्दी में ही हज़ारों की संख्या में लिखी, सुनी और गायी जाती है और यह लगभग हर पत्र-पत्रिका के सौंदर्य और हिन्दी ग़ज़लकारों के सामथ्र्य का आधर बन चुकी है। हिन्दी ग़ज़ल आज के वक्त का तक़ाज़ा है। जब व्यक्ति बहुत अधिक जज़्बाती होने लगता है तो उसके पास बहुत सारे शब्द नहीं नाना प्रकार की भावानुभूतियाॅं हांती हैं। इन थोडे से शब्दों में अंतःकरण की गूँज ग़ज़ल में ही सुनाई दे सकती है। हिन्दी के ग़ज़लकारों में ग़ज़ल के नामकरण की समस्या को लेकर पर्याप्त चिंतन और वाद-विवाद मिलता है।
संदर्भ सूचि:-
1. वार्षिकी अभिव्यक्ति, चन्द्रसेन विराट द्वारा उद्धता 1981, पृ. 40
2. ‘आरोह’, हिन्दी ग़ज़ल में, आलोक भट्टाचार्य, पृ. 33,
3. वही, पृ. 33
4. तग़ज़्ज़ुल, मुहम्मद यूसुफ़ खत्री, पृ. 172,
5. वही, पृ. 121,
6. वही, पृ. 82,
7. वही, पृ. 79
8. आरोह, हिन्दी ग़ज़ल, ज्ञान प्रकाश विवेक, पृ. 33
9. साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृ. 7,  10.वही, पृ. 28
11. फ़़ुनून-उर्दू ग़ज़ल के नये ज़ावीये, हनीफ़ फौक, पृ. 29
12. साये में धूप, दुष्यंत कुमार, पृ13
13. हमारी शायरी, मसऊद हुसैन रिज़वी, पृ. 142
14. पत्रिका निगार, फ़रबरी-मार्च 1946
15. पारिभाषिक शब्दावली, डाॅं. धीरेन्द्र वर्मा, पृ. 216
16. उर्दू शायरी का मिज़ाज़, वज़ीर आग़ा, पृ. 248,
17. वही, पृ. 249
18. शेर और ग़ज़ल, मजनू गोरखपुरी, पृ. 92
19. हिन्दी ग़ज़ल का उद्भव तथा विकास, रोहिताश्व अस्थाना, पृ. 18
20. ग़ज़ल का फ़न ‘‘उर्दू ग़ज़ल’’, कामिल क़ुरैशी, 1987, पृ. 26
21. मुक़द्दमा-ए-शेरों-शायरी, अल्ताफ़ हुसैन हाली, पृ. 97
22. ग़ज़ल और मुतालए ग़ज़ल, इबादत बरेलवी, पृ. 12-14,  23. वही, पृ. 114
24. सिन्फ़े-ग़ज़ल पर एक तहक़ीक़ी नज़र, प्रो, सैय्यद मसऊद हसन अदीब,
   पत्रिका-निगार, फ़रवरी 1942,  25. वही, पृ. 42
26. जदीद ग़ज़ल, रशीद अहमद सिद्दीक़ी


(लेखक के. एम. सी. कालेज, खोपाली में एसोसिएट प्रो. एवं हिन्दी विभागाध्यक्षा है।)



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Akshaya Gaurav

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