भावनाओं की साड़ी ओढ़े हुए,
माथे पर परेशानी की उभरी हुयी रेखायें,
फिर भी,
चेहरे पर मुस्कान, आँखों में ममत्व की ओज लिए,
ढुँढ्ती रहती है मुझे, अपने आँचल में छुपाने के लिए मेरी माँ।

बाल्यावस्था में पिता की छाया निस्तेज हो गयी,
आँखों के सपने नि:शब्द हो गये,
किंतु,
मुझे युवा निर्मित करने में,
अपने स्नेह और त्याग से अलौकिक शक्ति दिया हमेंमेरी माँ।
आज भी भावनाओं की आँचल में सिमटी हुइ,
अपने अधिकारों से वचिंत हुई,
लेकिन हमें बनाया सुयोग्य कर्मठ और चिरंजीवी,
वो हमेशा हमें अपने कलेजा की टुकड़ा समझी मेरी माँ।

उसकी मासूमियत उसकी पहचान है,
परिवार ही उसकी जान है,
सिने में छुपा लेती है वो हमें,
सर्द मौसम, या गर्म हवा के थपेड़ों से,
जब भी हो जाता हुँ मैं उदास,
पिता के उदाहरण से समझा देती है हमें मेरी माँ।

सबको एक नजर से ही देखती,
उसकी नजर में कोई छोटा; ना कोई बड़ा,
सबको एक समान ही अपने रक्त से सिंचती,
एकता में रहने की, हमें सीख है देती मेरी माँ।
हमारी उमँगे उसकी खुशी, हमारी प्रयत्न उसकी सफलता,
हमसबका कर्म उसका दृढ निश्चय,
हमें अग्रसर है करती,
हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा है देती मेरी माँ।

सबसे अलग सबसे जुदा,
हमारी पलकों पर खुशीयाँ देती सदा,
उसमें ही हमें रब और ईश्वर दिखता,
कर देती है क्षमाहमें, हमारी सारी खता मेरी माँ।
जब हमारा वर्तमान अँधेरों के भँवर में घीर जाता,
भविष्य की डर है जब सताता,
अपनी ममत्व की कश्ती,
स्नेह के पतवारे से यूँ निकाल देती है मेरी माँ।




आशीष कमल
लेखक योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा,
आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर
 कार्यरत हैं तथा अक्षय गौरव पत्रिका के उप-संपादक भी है।
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in


© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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