शिक्षा मूल रूप से मानव के चेतना शक्ति को विचारशील, ज्ञानशील तथा विनम्र बनाता है जिससे मनुष्य अपने समाज के उत्थान हेतू नवीन आविष्कार तथा नूतन एवं ज्ञानवर्धक विचारों का उत्कृष्ट सृजन करता है जिससे समाज के साथ-साथ देश का भी विकास होता है। अब प्रश्न यह है कि; शिक्षा का स्रोत क्या है? निश्चित रूप से शिक्षा के स्रोत का बुनियाद; शैक्षिक संस्थान से ही होगा, किंतु शैक्षिक संस्थान का बौद्धिक ह्रदय कौन है? तो पुस्तकालय को बौद्धिक ह्रदय के अलंकार से, शैक्षिक संस्थान को अलंकृत करना; कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी; क्योंकि, शिक्षा और पुस्तकालय एक दूसरे के पूरक हैं, इनमें अविभाज्य संबंध स्थापित है, जिस प्रकार शिक्षा के बिना शैक्षिक संस्थान की कल्पना नहीं की जा सकती; ठीक ऐसे ही; पुस्तकालय के बिना शैक्षिक संस्थान की बुनियाद नहीं रखी जा सकती। जिस प्रकार शिक्षा चेतना शक्ति को विचारशील, ज्ञानशील तथा विनम्र बनाता है, ठीक वैसे ही; पुस्तकालय भी मानव के चेतना स्थल में उभरे हुये विचार और ज्ञान संबंधी, विषय प्रसंगों की सूक्ष्म व्याख्या कर; उन्हें ज्ञानार्जन करने की दिशा-निर्देश देती है साथ ही मनुष्य के कौतूहलता को एकिकृत सूचना देकर अपने उपयोगकर्ताओं को आश्वस्त करती है।

पुस्तकालय का उदभव

मनुष्य अपने अस्तित्व के प्रथम सोपान से ही नित्य नूतन सृजन करता रहा है। 12वीं शताब्दी के मध्य दिनों में मनुष्य को पूर्व के किये गये अपने कार्यों कि पुनरावृति हेतू उसे पत्रकों की आवश्यकता महसूस हुयी। अतएव; उन पत्रकों को एक स्थान पर एकत्रित करना उन्होंने प्रारम्भ किया जिससे वे उक्त सूचनाओं का उपयोग कर उसे विस्तारित कर सकें। 16वीं शताब्दी के उपरांत संकलित पत्रकों तक की पहुँच, सामग्रीयों का अर्जन, प्रबंधन तथा ढूँढ़ने का उपकरण, पुस्तक प्रचलन, विभिन्न प्रकार के लिखित सामग्री के भौतिक स्वरूप तक पहुँच, भाषा वितरण क्रिया, शिक्षा की भूमिका, शैक्षिक अनुपात, नई भर्ती, बजट, पुस्तकालय के विशिष्ट उपयोगकर्ता, वास्तुकला दृष्टि, पुस्तकालय उपयोग करने के तरिके, राष्ट्रीय संस्कृति विरासत, सरकार की भूमिका इत्यादी महत्वपूर्ण प्रसंगो के जानकारी हेतू पुस्तकालय की आवश्यकता प्रतित हुयी; क्रमश: पुस्तकालय का स्वरूप वृहत होता गया। 1960 के दशक से कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण की क्रिया पुस्तकालय में कार्यांवित होने लगे। वर्तमान में सूचना एवं सार को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय को; सूचना केन्द्र के रूप में स्थापित किया गया, जिसमें शैक्षिक, बौद्धिक तथा तकनीकी तीनो प्रकार के सूचनाओं का अलंकरण किया गया जो किसी भी राष्ट्र को विकसीत करने में राष्ट्र को अलंकृत करता है। 

पुस्तकालय सौन्दर्य से अभिभूत छात्रों पर पुस्तकालय का प्रभाव


एक नवीन पुस्तकालय की सफलता के मानदण्ड का महत्वपूर्न भाग “अभिकल्पना” और उसके “भविष्य योजना” से होता है। एक अच्छी पुस्तकालय में मजबूत फर्श, पूर्ण प्रकाश का आवागमन, समुचित रूप से शांत वातावरण ही छात्रों को पुस्तकालय की तरफ आकर्षित करते हैं। वर्तमान समय में पुस्तकालय का स्वरूप तकनीकब्द्ध हो गया है जिसमें छात्र अपने इच्छानुसार किसी भी समय अपनी शोध जिजीविषा को शांत कर सकते है जैसे –
1. शोध हेतू शोध पत्र संग्रह, जिसमें देश के सभी छात्रों ने अपने शोत्र-पत्र को सम्म्लित किया और उस संग्रह को राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय अपने उपक्रम संस्थान के द्वारा पुस्तकालय को उपलब्ध कराता है 
2. राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय अपने उपक्रम संस्थान के द्वारा कंसोर्टीया का निर्माण विभिन्न विषयगत पत्र (जर्नल्स) एव पत्रिकाओं का संग्रह करके पुस्तकालय को उपलब्ध कराता है जिससे छात्र उक्त जर्नल्स को एक स्थान पर अपने समयानुसार उपयोग कर सकते हैं 
3.   पुस्तकालय अपने सबंधित संस्थान के प्राध्यापकों की प्रकाशित शोध पत्रों को डिजिटल रूप में निर्माण कर छात्रों को उपलब्ध कराता है इत्यादि। 

शिक्षा मे पुस्तकालय संसाधन की भूमिका


पुस्तकालय अपने जन्म से ही शिक्षा के उज्जवलता हेतू शिक्षा संबंधी अनेक कार्य किये जैसे- रेफरल सेवाएँ, सूचना तथा शैक्षिक साधन इत्यादि, इनके माध्यम से पुस्तकालय ने अपनी सतत प्रयास से शिक्षा के स्वरूप को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण रूप से एक नया आयाम दिया है जिससे शिक्षा प्राप्त करना सुगम हुआ है। दूसरे पक्ष से देखा जाये तो पुस्तकालय ही एकमात्र ऐसा निकाय है जिसमें शिक्षा का बहुमुखी स्वरूप देखने को मिलता है।
पुस्तकालय ने अपने प्राँगण तथा बाह्य स्थानों पर अपने शैक्षिक तथा आंशिक शैक्षिक दोनों प्रकार के उपयोगकर्ताओं हेतू एकल प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा अकादमिक पाठ्यक्रम का आयोजन करता है जिससे उपयोगकर्ताओं को विशेष प्रकार का लाभ मिलता है और वे समाज तथा देश के साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगते हैं। इसके अलावा विशिष्ट व्यक्ति समूह तथा शिक्षा में अक्षम लोगों को विशेष प्रकार के कार्यक्रम द्वारा उन्हें शैक्षिक सुविधाओं से भी वशीभूत करता है जिससे उन्हें शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से वंचित न रहना पड़े। अस्पताल, जेल, सुधार गृह, वृद्ध तथा अपंग आश्रम, शैक्षिक सुविधाओं से वंचित समूह, अपराध में लिप्त अल्पव्यस्क, बेरोजगार तथा जिन्हें पुस्तकालय की अवश्यकता है, अन्य संस्थान जिन्हें पुस्तकालय निर्माण करने के लिए वित्त की समस्या है उन्हें भी सामग्री के साथ वित्त प्रदान करता है; इस प्रकार, पुस्तकालय निश्चित रूप से शिक्षा के बुनियाद के रूप में स्थापित होता है। 
वर्तमान समय में कुछ पुस्तकालय अशिक्षित अभिभावकों को विदेशी तथा देशी भाषा सिखाने हेतू वर्गों का आयोजन भी कर रहे हैं साथ ही उनके परिवार के सद्स्यों को पुस्तक पढने हेतू आकर्षित भी कर रहे हैं। कुछ पुस्तकालय समय-समय पर विभिन्न तथा नूतन विषयो पर सगोष्ठी, सम्मेलन तथा परिसंवाद का आयोजन कर शोध-पत्र का मांग करते हैं जिसमें शोध छात्र के साथ-साथ सभी प्रकार के शैक्षिक तथा बौद्धिक क्षमता वाले लेखकगण अपने शोधपत्र के माध्यम से ज्ञानवर्धक विचार को प्रस्फुटित करते हैं जिसमें नवोन्मुखता का संचार होता है और समाज तथा राष्ट्र को एक नयी दिशा मिलती है।  20वीं शताब्दी में कम्पुटर का आर्विभाव पुस्ताकलय के लिए स्वर्णिम रहा है इसके माध्यम से उक्त शोध-पत्रों तथा नवीन एवं पुरातन सूचनाओं को आसानी से संरक्षित करना तथा तीव्र गति से अपने उपयोगकर्ताओं को वाछिंत सूचना उपलब्ध कराना। पुस्तकालय अपने पूरे उत्साह से अकादमिक शोध तथा शिक्षा को प्रोत्साहित करता है जिससे एक समय पर अनेक उपयोगकर्ता पुस्तकालय का उपयोग एक साथ कर सकें। 
यदि, अकादमिक क्षेत्र की तरफ देखें तो विद्यालय, विश्वविद्यालय तथा शोध संस्थान में शिक्षा प्राप्त करने हेतू पुस्तकालय की अग्रणी भूमिका रही है जैसे थीसीस, प्रश्नपत्र, प्रकाशित प्राध्यापकों की रचनायें, वैज्ञानिक रचनायें, सार इत्यादि अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों को पुस्तकालय सहेज कर रखता है जिससे उक्त उपयोगकर्ताओं को शिक्षा प्राप्त करने में सहायता मिलती है। 

अविभाज्य है शिक्षा और पुस्तकालय

क्र.सं. पुस्तकालय शिक्षा
अ.








पुस्तकालय प्रतिनिधित्व करता है- सेवाओं तथा संसाधन का संग्रह, साथ ही उपयोगी शोध सामग्री, प्रकाशित तथा अप्रकाशित, सभी प्रकार के उपयोग हेतू दृश्य-श्रव्य अंतवस्तु जैसे- भूविज्ञान, जैवविज्ञान, क़म्पुटर विज्ञान, प्रौद्धोगिकी विज्ञान तथा उनसे संबंधित डाटाबेस। पुस्तकालय के पास प्रमाणित कर्मचारी होते हैं जो उपयोगकर्ताओं के शैक्षिक शोध हेतू उक्त आँकड़ों का अच्छी तरह से व्याख्या कर उन्हें आस्वश्त करते हैं। साथ ही वे सीखने के सभी स्तरों जैसे- पुस्तक चयन, ज्ञान का संग्रह तथा सरक्षित एव विस्तारित करना जैसे क्रियाओं को भी क्रियांवित करते हैं। शिक्षा का प्रतिनिधित्व समाज को सकारात्मक दिशा निर्देश देना, ज्ञान को आत्मसात करना, बौद्धिक तथा शैक्षिक वातवरण का निर्माण विद्यालय के माध्यम से करना होता है, जिससे उनका व्यक्तिगत विकास के साथ ही समाजिक विकास भी हो सके और वे उसका अनुभव एवं अवलोकन कर सकें। तथापि, यह कहना आवश्यक है कि ज्ञान का भडार, ज्ञान का संग्रह तथा ज्ञान का उद्भव पुस्तकालय के माद्यम से ही हो सकता है। अतएव; बिना पुस्तकालय का शिक्षा प्राप्त करना असंभव सा प्रतीत होता है या यूँ कहें बिना पुस्तकालय के विद्याल की कल्पना ही नही की जा सकती है।
आ.  एक अच्छा पुस्तकालय अपने उपयोगकर्ताओं को बुनियादी रूप से स्वप्रगतिशील बनाता है जिससे वे अपने समाज के साथ अपने देश तथा स्वयं का निर्माण करते है। किसी भी विद्यालय, विस्वविद्यालय, संग्रहालय, संस्थान, संगठन की कल्पना बगैर पुस्तकालय के बुनियाद के बिना नहीं की जा सकती है क्योंकि पुस्तकालय ही शैक्षिक विद्या का मूल स्र्तोत माना गया है जहाँ ज्ञान को संगठीत किया जाता है तथा शैक्षिक वातावरण का भी निर्माण किया जाता है।   एक अच्छी शिक्षा मनुष्य को आत्मज्ञान, आत्म-शिक्षा, बौद्धिक,  आत्म विश्वसनीयता जैसे कारकों पर उसकी आंतरिक दृष्टि को बढ़ाता है; साथ ही उसे तथ्यात्मक और उपयोगी जानकारी की व्याख्या करने की शक्ति प्रदान करता है जिससे मनुष्य तर्कसंगत तथा सिविक तरीके से प्राप्त ज्ञान  के द्वारा अपने व्यवहार, चरित्र, आचरण के माध्यम से  ज्ञान के सभी पहलुओं जैसे- सही और गलत, अच्छे और बुरे के बीच अंतर करता है  और सामान्य  मनुष्य से अलग हो जाता है।
इ.  पुस्तकालय एक समाजिक, अकादमिक तथा शैक्षिक संस्था है जिसके माध्यम से हम विभिन्न प्रकार के सूचनाओं से रूबरू होते हैं और लाभानिव्त होते हैं  शिक्षा हमारे मस्तिष्क को समाजिक, अकादमिक तथा शैक्षिक वास्तुकला को समझने की शक्ति प्रदान करता है जिससे हम सूचनाओं का सृजन कर उन्हें अपने जीवन में क्रियांवित करते हैं 
ई.  पुस्तकालय मुख्य रूप से तीन प्रकार के समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है जो क्रमश: अपने क्षेत्र में उपयोग करने पर विशिष्ट हो जाते हैं
1.विशिष्ट पुस्तकालय
2. सार्वजनिक  पुस्तकालय
3. शैक्षिक पुस्तकालय
शिक्षामुख्य रूप से तीन प्रकार के आयामों को क्रमबद्ध करता है जिससे मनुष्य अपने जीवन में श्रेष्ठ बनता है
1. विद्यालय
2. विश्वविद्यालय
3. शोध संस्थान 
उ. पुस्तकालय हमारी कौतूहलता को विराम देता है।  शिक्षा हमारी कौतूहलता का सृजन करता है। 
ऊ.  पुस्तकालय नवीन तथा पुरातन सूचनाओं को संग्रह कर उसे संरक्षण तथा विस्तारित करता है।  शिक्षा नवीन तथा पुरातन सूचनाओं को समझने, चिंतन करने तथा शोध करने की प्रेरणा देता है। 
ए.  पुस्तकालय का शाब्दिक अर्थ है पुस्तकों का संकलन करना साथ ही सूचना तथा ज्ञान का भंडारण करना जिसे पुस्तकालय के प्रशिक्षित कर्मचारीगण उक्त पुस्तकों, सूचना तथा ज्ञान को समुचित रूप से संरक्षित, सुव्यवस्थित तथा प्रशासित करते हैं ताकि वे सफलतापूर्वक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के आत्म सुधार करने उन्हें सतत शिक्षा  के लिए सार्थक तथा उपलब्ध  संसाधनों का उचित उपयोग कर लाभान्वित हो सकें।  यदि शिक्षा पर दृष्टिपात करें तो पुस्तकालय
अधिकारी  सबसे अच्छा मार्गदर्शक है पुस्तकालय में उपलब्ध साधनों तक जैसे पत्रिकाओं, सामयिक पत्रिकाओं, दुर्लभ पुस्तकों, पांडुलिपियों, सूक्ष्मदृश्य, सार, सूचकांकों ग्रंथ सूची (कैटलाग)  संदर्भ पुस्तक तथा शोध हेतू वाँछित सूचनाओं तक आपको पहुँचाने में सहायता करता है। अतएव; पुस्तकालय अधिकारी
अपने उपयोगकर्ताओं को शिक्षा तक पहुँचने में समाज के सभी वर्गों का समुचित मार्गदर्शन करते हैं जिससे पुस्तकालय अधिकारी  की भूमिका ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। 

दूरस्थ शिक्षा में पुस्तकालय की भूमिका

वर्तमान समय में शिक्षा ग्रहण करने का एक महत्वपूर्ण मंच है दूरस्थ शिक्षा। इसमें समाज के उन वर्गों को शिक्षा मिलती है जो किन्हीं कारणों से व्यस्त हैं किंतु उन्हें शिक्षा प्राप्त करना है। तथापि, दूरस्थ शिक्षा में नियमित वर्ग की कल्पना नहीं है इसलिए पुस्तकालय की भूमिका दूरस्थ शिक्षा में अत्यंत मह्त्वपूर्ण हो जाती है।  

ई-लर्निंग शिक्षा में पुस्तकालय की भूमिका

वर्तमान परिदृश्य उच्च तकनिक से परिपूर्ण हो गया है जिसका असर शिक्षा पर समुचित रूप से हुआ है और इस प्रभाव से नवीन पीढी के लिए ई-लर्निंग शिक्षा जैसे मंच की प्राप्ति हुयी जिसमें पुस्तकालय की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण रही है जिससे स-समय देश और विदेश के शिक्षण संस्थान से जुड़कर मनोवांछित शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। 
उपरोक्त दोनों वर्तमान समय के शिक्षा ग्रहण करने का महत्वपूर्ण इकाई है और इसमें पुस्तकालय की भूमिका ससक्त और सकारात्मक रही है या यूँ कहें इसकी बुनियाद पुस्तकालय के उपर निर्भर है। इस प्रकार बहुत से ऐसे तत्व है जो शिक्षा में पुस्तकालय की महत्ता को सिद्ध करते हैं। पुस्तकालय, समाज में निवास कर रहे सभी वर्गों को अपने ध्यान में रखा और उनके सतत विकास हेतू अपना कार्य कर रहा है और भविष्य में भी करने का अनुमान है।

निष्कर्ष:  अपितू; निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शिक्षा में पुस्तकालय की भूमिका महत्वपूर्ण सिद्ध होती है।
यह भी कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि पुस्तकालय और शिक्षा अविभाज्य है दोनों एक दूसरे के पूरक है। यदि आपने शिक्षा ग्रहण किया है तो पुस्तकालय के मार्ग से होकर गुजरना ही होगा क्योंकि बेहतर शिक्षा का निर्माण तभी हो सकता है जब हम पुस्तकालय का समुचित रूप से उपयोग कर सकें। वर्तमान में पुस्तकालय ने शिक्षा के बहुमुखी विकास के स्तर हेतू अनेक कार्य किये। इसलिए आज पुस्तकालय सूचना केन्द्र के रूप में पहचाना जाता है। साथ ही, शिक्षा के प्रत्येक चरण (विद्यालय, विश्वविद्यालय तथा शोध संस्थान) में पुस्तकालय की महत्ता को नकारा नही जा सकता। जिस प्रकार शिक्षा में शिक्षकगण अपने छात्रों के चेतन स्थल में नूतन तथा पुरातन विषय प्रसंगों का बुनियाद रखते हैं ठीक वैसे ही पुस्तकालय के पुस्तकालय कर्मचारीगण भी छात्रों के चेतन स्थल में उभरे हुये विषय प्रसंगो की व्याख्या निरूपित करते हैं।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।




आशीष कमल
लेखक योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा,
आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर
 कार्यरत हैं तथा अक्षय गौरव पत्रिका के उप-संपादक भी है।
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in


Axact

Akshaya Gaurav

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