मनोविज्ञान द्वारायह सिद्ध हो चुका है कि प्रत्येक मानव में चाहे वह पुरूष हो या स्त्री, सभी में ईष्र्या, द्वेष तथा स्पर्धा जैसी स्वाभाविक मूल प्रवृतियाँ पाई जाती हैं।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञनिक फ्रायड ने कहा है कि, “विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण तथा समान जाति के प्रति द्वेष ही मानव का स्वभाव है।”
अर्थात् पिता को पुत्री से तथा माँ को पुत्र से अधिक लगाव होता है। पुरूष वर्ग तो पहले पठन-पाठन में, फिर जीविका उपार्जन में इतने व्यस्त तथा घर से बाहर रहते हैं कि उन्हें घर के तथा स्त्रियों के आपसी मतभेदों की बहुत कम जानकारी रहती है।
नारी ही हर समय साथ-साथ रहती हैं चाहे वे माँ-बेटी हों, सास-बहू हों या देवरानी-जेठानी या बहनें। इन सबों में आपसी मतभेद होने के कई कारण हैं, सही शिक्षा की कमी और सामाजिक मान्यताएँ तथा मनोविकास का अभाव अग्नि में घी का काम करते हैं।
नारी ही माँ के रूप में पुत्र-पुत्री में पक्षपात करती हैं घर में लड़की पैदा होते ही सबों का मुँह लटक जाता है। स्वयं माँ भी रोने लगती है, मानों उससे कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो। छोटेपन से ही माँ लड़के को अच्छा खान-पान, शिक्षा-दीक्षा व अन्य सुवधिाएँ देती हैं जबकी अधिकतर परिवारों में लड़कियों को दबा कर रखा जाता है।अगर कोई लड़की भाई के बराबर अधिकार माँगती है तो कहा जाता है कि “भाई तो कमा कर लाएगा जबकी तू तो सब घर खाली करके दूसरे घर चल देगी।” लड़की में भी इससे हीन भावना आ जाती है या, दूसरी तरफ माताएँ लड़कियों को हर तरह की अनियन्त्रित छूट देकर पूर्ण रूप से बिगाड़ती हैं। वे फिर शादी के बाद किसी के साथ निर्वाह नहीं कर पातीं। केवल अपनी ही साज-सज्जा, सैर-सपाटे में व्यस्त रहती हैं। इस प्रकार परिवार में विग्रह उत्पन्न होता है।
वह नारी जो अपनी बेटी के लिए जान देने को तैयार रहती है, सास के रूप में बहू की दुश्मन बन जाती है। आए दिन ही बहू के जलाने या स्वयं ही बहू की आत्महत्या के समाचार मिलते हैं। जब हम इसकी तह तक जाते हैं तो कारण मालूम पड़ता है कि बहु की इस गति के लिए मुख्य रूप से उसकी सास व नन्द जिम्मेदार हैं । एक तो सामाजिक मान्यताएँ ही ऐसी हैं कि दहेज तो आना स्वाभाविक व आवश्यक ही है। जब दहेज में कमी पड़ती है तब घर में कलह आरम्भ होती है और वह इतना बढ़ जाती है कि या तो बहू को जला दिया जाता है या उसे आत्महत्या के लिए मलबूर कर दिया जाता है।
माँ का प्यार बेटे की शादी के बाद बहू से बँट जाता है और बहू पति पर अपना पूरा अधिकार समझती है। इससे सास-बहू में मतभेद शादी के बाद से ही आरम्भ हो जाता है। फिर उम्र तथा विचारों का अन्तर। घर में अस्तित्व तथा अधिकारों को लेकर ईष्र्या-डाह तथा स्पर्धा आरम्भ हो जाती है, जो कि समय के साथ बढ़ती जाती है। किन्तु इसमें सारा दोष सास का ही नहीं होता। आधुनिक इंगलिश स्कूलों से शिक्षा पाई बहुएँ भी शादी के बाद नए घर के वातावरण में आकर बिल्कुल ठीक ढंग से मिल-जुलकर नही चलतीं। जिस नारी में प्रेम, त्याग व सहनशीलता की भावना आवश्यक होती हैं इस आधुनिक नारी में इनका पूर्णतया अभाव देखा जाता है। अक्सर बहुएँ अपने पीहर के ही गुण गाती रहती हैं और ससुराल के हर आदमी तथा व्यवस्था की बुराई करती हैं। इससे आपस में वैमनस्य बढ़ता जाता है, इसलिए बहू की जन्मपत्री सास से मिलानी चाहिए, लड़के से नहीं और बहू को पसंद करते समय उसकी माँ का भी स्वभाव, शालीनता देखनी चाहिए, जिससे परिवार में सुख-शान्ति तथा सद्भाव बना रहे।
स्त्रियों के पास खाली समय तथा अंधविश्वास ही अधिकतर कई विषमताओं की जड़ है। नारी जाति को उचित शिक्षा ही उन्हें अन्धविश्वासों, पुरानी सामाजिक मान्यताओं से ऊपर उठा सकती है। शिक्षा से उनके जीवन में सहनशीलता, प्रेम, त्याग जो कि स्त्री जाति के स्वाभाविक गुण हैं, और अधिक विकास हो पायेगा। वह व्यवहार में संतुलन लाना तथा खाली समय का सदुपयोग करना भी सीख लेगी। नारी ही वह शक्ति है जो एक घर को स्वर्ग या नरक बना सकती है।



डा. प्रेमपाल सिंह वाल्यान
लेखक पिछले कई वर्षो से लेखन में कार्यरत है और अब तक कई पत्रिकाओं में आपके लेख प्रकाशित हो चुके है।  लेखक से यश कोरियर सर्विस, निकट नवरंग मेडिकल स्टोर, रेलवे रोड, हापुड़-245101, जिला-हापुड़, (उ0प्र0) भारत मो0: 09917569942  पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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Akshaya Gaurav

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