ममता का आँचल, भावनाओं की प्रतिमूर्ति,
स्नेह की पराकाष्ठा, शर्म की विभूति है स्त्री,
दुख - वेदना को अपने  सिने में है रखती,
त्याग और तप से खुशीयाँ है बिखेरती,
निश्छल मन, सह्रद्यी होती है स्त्री।

होठों पर मुस्कान लिए, चेहरे पर खुशी,
सबको हर्ष, सबकोस्नेह बाँटती है स्त्री,
क्या पुत्र, क्या पति, ससुराल से लेकर मायका तक,
सबकी खबर है रखती,
सबको भाव वात्सल्य और मोहब्बत की सीख है देती।


करूणा की सागर, संस्कारों की जननी,
प्रथम शिक्षक,चरित्र का निर्माणकरती है स्त्री,
वफा की खुशबू और प्रित का बंधन,
त्याग की मूर्ती, ईश्वर के रूप को परिभाषित करती है स्त्री।

श्रृँगार की प्रेयसी, विश्वास की प्रतीक,
फुल जैसी कोमल, चट्टान जैसी दृढ़ है स्त्री,
रात को थक कर जब विस्तर पर आती,
तनिक न वेदना उसकी आँखों में दिखती,
पुन: सुबह के लिए पुत्र-पति के सुख हेतु योजना है करती।

पुत्री के रूप में पिता की छाया, 
पत्नी के रूप मे पति की संगीनि,
जब रूप बदलता और बनती माँ है,
रोम रोम से निकलता है मोहब्बत की रागिनी,
अपना वजूद स्वयं बनाती है स्त्री।

ध्न्य है वो पिता जिसने स्त्री को जनम दिया,
पुलकित हो गयी वह आँगन जिसमें स्त्री का आगमन हुआ,
संसार की गती तुमसे है तुमसे ही है नवीन जीवन,
तुमही हो पुत्री, माता तुमही हो,
तुमही हो पत्नी और बहन तुमही हो,
इतने कोमल चरित्र का निर्वाह करती है स्त्री। 




आशीष कमल
लेखक योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा,
आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर
 कार्यरत हैं तथा अक्षय गौरव पत्रिका के उप-संपादक भी है।
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in


© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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