रंग दे धानी, चुनर मेरी रंग दे धानी
चढ़ा शीश मातृभूमि पर अपनी
अमर करें जवानी
चुनर मेरी रंग दे धानी
नस-नस में भड़काएं शोले
काँप उठे यह नभ फिर
डगमग-डगमग धरती डोले
गिरें धडाधड सीमा पर दुश्मन
तडतड छूटें बम गोले
फिर से तुम्हे पुकार रही है
भगत बिस्मिल की वाणी
चुनर मेरी रंग दे धानी
मैले आँचल में सिमटी सी
भारत माता सिसक रही
लहू बहाकर अपना रंग दो
चुनरी इसकी बदरंग हुई
नेताजी, आजाद, तिलक की
दोहरायें शोर्य कहानी
भारत माता बनेगी फिर से
इस धरती की रानी
चुनर मेरी रंग दे धानी
मत भूलो तुम याद रखो
शहीदों की कुर्बानी
चुनर मेरी रंग दे धानी
चुनर मेरी रंग दे धानी



सपना मांगलिक
लेखिका आगमन साहित्य पत्रिका की सम्पदिका है और स्वतंत्र लेखक, कवि,ब्लॉगर है। साहित्य एवं पत्रकारिता को समर्पित संस्था ‘जीवन सारांश समाज सेवा समिति’ की संस्थापक है और कई सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय सदस्य है। अब तक तेरह कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। आपको राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित किया जा चुका है।
लेखिका के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें  About Sapna Manglik


© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


Axact

Akshaya Gaurav

hindi sahitya, hindi literature, hindi stories, hindi poems, hindi poetry, motivational stories, inspirational stories, हिन्दी साहित्य, कहानियाँ, हिन्दी कविताएँ, काव्य, प्रेरक कहानियाँ, प्रेरक कहानियाँ, व्यंग्य.

loading...

POST A COMMENT :