1. प्रेम 

मलखान साम्यवाद पार्टी के जिला अध्यक्ष का पुत्र था। आती जाती युवतियों को छेड़ना भद्दे इशारे करना और उनका पीछा करना उसके प्रमुख शगल थे। इस बार उसकी नजर नाबालिग सुमन पर थी वह उसके सुन्दर चेहरे और भोलेपन का दीवाना हो चुका था और जहाँ भी वह जाती, मलखान साये की तरह उसके पीछे-पीछे अपने प्रेम का इज़हार करते पहुँच जाता। सुमन और उसके घरवालों ने पहले तो उसे समझाने का प्रयास किया मगर मलखान कहाँ मानने वाला था वह तो उसे पाने की जिद लिए जो बैठा था। एक दिन जब स्कूल जाते समय मलखान सुमन के पीछे पीछे चलने लगा तो सुमन ने पलटकर उसे थप्पड़ जड दिया। मलखान उसे धमकी देते हुए वहां से चला गया। दूसरे दिन मलखान ने बीच सड़क पर उसे रोकते हुए कहा "सुमन मैंने तुझे सच्चा प्रेम किया था। अब सुन ले तू मेरी होगी नहीं, किसी और के लायक मैं तुझे छोड़ूगा नहीं" कहते हुए उसने हाथ में छिपाई एसिड की बोतल उसके चेहरे पर फैंक दी। सुमन का चेहरा बुरी तरह से झुलस गया था। महीनों बाद अस्पताल से सुमन लौटी तो अपने सुन्दर सुकोमल चेहरे के बजाय एक डरावना चेहरा लेकर और आते ही सबसे पहले मलखान के पास गयी और बोली "मलखान आज मैं तुम्हारे प्रेम को समझ चुकी हूँ, आओ हम एक हो जाएँ "। मलखान घबराते हुए "पागल हो क्या अपना चेहरा तो देखो, जब मैं कह रहा था तो..."। सुमन "मलखान तुम मेरे नहीं हुए तो किसी और के भी नहीं होंगे आज मैं अपने सच्चे प्रेम की छाप तुम पर जरूर छोड़ कर जाउंगी" और सुमन ने भी ठीक मलखान की तरह एसिड की बोतल में बंद "प्रेम" मलखान पर उडेंल दिया।


2. मनोरंजन 

आशा को लेखन का बेहद शौक था। या यूँ कहें कि लेखन द्वारा वह अपने दिल के हर दर्द को कागज़ पर उतार अपनी व्यस्त भागदौड़ और घुटन भरी जिन्दगी में कुछ पल सुकून के जी लेती थी। मगर उसके पति मनोज और सासू माँ को उसका लेखन कलम घिसाई और टाइम की बर्बादी लगता। वह दोनों जब तब उसके लेखन पर व्यंग्य बाण छोड़ते और लेखन को ठलुओं का काम कहकर सबके सामने उसका मजाक उड़ाते। उस वक्त आशा की आँखों से बेबसी और अपमान के आंसू निकल पढ़ते थे। एक दिन एक साहित्यिक कार्यक्रम में आशा को विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया गया तो वह मना न कर सकी और कुछ देर के लिए कार्यक्रम में चली गयी। मगर जब घर लौटी तो सासू माँ ने दरवाजे से ही अपशब्दों की बौछार करना शुरू कर दिया। इस अपमान से दुखी हो आशा अपने कमरे में आंसू पोंछती जब पहुंची तो उसका पति फोन पर उसके पिताजी को धमकी दे रहा था कि आशा ने यह लेखनबाजी नहीं छोड़ी तो वह उसे छोड़ देगा। घर के बाहर पराये पुरुषों के साथ बैठकें करने वाली आवारा औरतों की उसे कोई जरूरत नहीं है। आशा तड़प कर बोली "मनोज मैं घर के सारे कार्य निपटा कर अगर कुछ देर अपना मनोरंजन कर आई तो इसमें क्या गलत है? "मनोज लगभग चीखते हुए बोला "तुम्हारा मनोरंजन और मनोरंजन करने वालों को मैं खूब समझता हूँ उन्हह"। रोज रोज के अपमान से तंग आकर आशा ने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया। मनोज को गुनगुनाते हुए अटेची पैक करते देख आशा ने उसे सवालिया नजरों से देखा तो मनोज बोला "अरे मैं तुम्हे बताना भूल गया हमारे क्लब के सभी पुरुष थाईलेंड ट्रिप पर जा रहे हैं" आशा ने पूछा, "औरतें नहीं जा रहीं?" मनोज "पागल हो वहां औरतों का क्या काम" आशा ने हैरानी से पूछा, "फिर मर्दों का वहां कौन-सा जरूरी काम है "मनोज आँख मारते हुए "मनोरंजन नहीं करें अपना, बस तुम बीवियों से ही चिपके रहे"।

3. होली 

अर्पिता की यह पहली होली थी। उसने और निखिल ने घरवालों के खिलाफ जाकर प्रेम विवाह किया था। उनकी शादी में कोई भी अपना शरीक नहीं हुआ और उनका दांपत्य जीवन बड़ों के आशीर्वाद के बिना शुरू हुआ, इसका निखिल से ज्यादा अर्पिता को मलाल था। मगर विवाह के दो महीने बाद जब होली का त्यौहार पास आने लगा तो अर्पिता ने इस होली में सबके गिले शिकवे दूर कर निखिल और उसके परिवार को एक करने की ठानी। उसके मन में अनेक उमंग उठ रहीं थी कि होली पर मैं यह बनाउंगी वो बनाउंगी और सब मेरी तारीफ करेंगे मुझे आशीर्वाद प्रदान करेंगे। होली वाले दिन अर्पिता निखिल के साथ ससुराल पहुंची दोनों ने बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। माता-पिता बच्चों से कबतक नाराज रहते उन्होंने भी दोनों को माफ़ कर दिया। घर में खुशियों की खिलखिलाहट गूँज उठी। तभी निखिल के जीजाजी वहां आये और अर्पिता को रंग लगाने लगे। अर्पिता भी अपने ससुराल की पहली होली का भरपूर लुत्फ़ उठाते हुए खुद बचते हुए जीजाजी को रंग लगाने की कोशिश करने लगी। होली की इस धरपकड़ में अचानक एक तमाचे की आवाज सबको सुनाई दी। जीजाजी अपना गाल सहलाते हुए बडबडा रहे "मैं तो पहले ही कह रहा था यह लड़की सही नहीं है, दिखा दी न अपनी औकात "उधर अर्पिता रोते हुए तमतमाए चेहरे के साथ घर से बाहर निकल गई, आखिर उसकी पहली होली की मिठास हमेशा-हमेशा के लिए कडवाहट में जो बदल गई थी।

4. पहनावा 

मिसेज वर्मा सोसायटी की सभी नवयुवतियों के आधुनिक पहनावे पर मौका मिलते ही तंज कसना शुरू कर देती थीं। बेचारी लड़कियां और उनकी मांए मिसेज वर्मा के इस व्यवहार से बहुत आहत और शर्मिंदा महसूस करती। मगर मिसेज वर्मा तो आदत से मजबूर थीं। आज भी वह स्वीटी और मिंकू को जींस टॉप में कालेज जाते देख मुंह बनाते हुए जोर से बडबड़ाइ “देखो तो कैसे कपडे पहने हैं, फिर लड़कों को दोष देते हैं? बेहयाई की तो हद कर रखी है इन लड़कियों ने उन्हह, मैं तो अपनी सुमन को कभी ऐसे कपडे न पहनने दूं"। एक मेरी सुमन को तो देखो कितने शालीन कपडे पहनती है कोई व्यर्थ की हंगामेबाजी नहीं जितना पूछो उतना ही जवाब देती है और आजकल की यह लडकियां। बडबडाती हुई मिसेज वर्मा वापस घर के अन्दर साफ़ सफाई करने में व्यस्त हो गयीं आधुनिक लड़कियां एवं उनके पहनावे को कोसना जारी था। ऐसे ही सफाई करते करते उनकी नज़र सुमन के कमरे में रखे डस्टबिन पर पड़ी तो मिसेज वर्मा के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी क्योंकि डस्टबिन से झांकता आई पिल का रैपर उन्हें पहनावे और परवरिश का फर्क समझा रहा था।

5. घुमक्कड़ 

समीर ने विवाह के एक वर्ष बाद जब अपनी पत्नी स्मिता के साथ अकेले घूमने जाने की इच्छा जताई तो माँ बिगड़ गयी बोली “अरे अभी तो पूरा परिवार खाटू श्याम के दर्शन करके आया है और तुम्हारी शादी के तुरंत बाद भी पापाजी सबको वैष्णो देवी के दर्शन कराकर लाये ही थे, अब अलग जाने का फितूल कहाँ से आया, फिर स्मिता की तरफ टेडी नजर करते हुए बोलीं जरूर इसी महारानी ने तुम्हें उलटी सीढ़ी पट्टी पढ़ाई होगी बड़ी घुमक्कड़ लड़की पल्ले पड़ी है हमारे “स्मिता की आँखों में अपमान के आंसू तैर आये और समीर भी मन मसोस कर ऑफिस निकल गया। कुछ महीनों बाद समीर की बहन नेहा की शादी हुई। नेहा की शादी को दो महीने हो चुके थे स्मिता ने माँ को दुखी होकर पिताजी से शिकायत करते सुना “सुनो जी कैसा कंजूस परिवार ढूँढा है आपने मेरी बेटी के लिए, पूरे दो महीने शादी को हो गए हैं और दामाद जी अभी तक नेहा को हनीमून पर नहीं ले गए, कैसे घुट रही होगी मेरी नन्ही सी बेटी को घर में पड़े-पड़े।"

6. चुनावी दंगे 

हथोडा पार्टी की रैली में फूला पार्टी के नेताओं ने विद्रोह का स्वर उठाया इतने में हथोडा पार्टी के कार्यकर्त्ता रामनाथ के सर पर फूला पार्टी के कार्यकर्ता मौजीराम ने पत्थर फैंककर मारा जिससे उसके सर से खून की धारा निकल पड़ी और रामनाथ को तुरंत एम्बुलेंस से अस्पताल पट्टी कराने भेजा गया, एम्बुलेंस के पीछे पीछे रिपोर्टरों की फ़ौज और टीवी चेनल के आँखों देखा हाल बताने वाले रिपोर्टर भी अपना कैमरा और माइक संभाले नाटकीय अंदाज में लाइव टेलीकास्ट करने पहुँच गए। हथोडा पार्टी बाधा चढ़कर फूला पार्टी पर आरोप लगा रही थी। शाम को रामनाथ जब अपने घर से निकल रहा था तो फूला पार्टी के मौजीराम ने उसे आवाज लगाई “रामू भैया, अकेले ही जीम जाओगे क्या? अरे हमारा हिस्सा भी तो दे दो भैया “रामनाथ ने मुस्कुराते हुए उसके हाथ में पांच सौ के चार नोट रख दिए और दोनों साथ में दारु के ठेके की और चल पड़े।

7. महिला एकता समिति 

महिला एकता समिति की अध्यक्ष अपनी समिति की सदस्याओं के साथ जब तब धरने पर बैठ जाती थी आखिर यह संस्था और उनकी अध्यक्ष महिलाओं और उनके हितों की रक्षा के लिए मर मिट जाने को प्रतिबद्ध जो थी। इस बार मामला विधायक की बहु का था, जो कि दहेज़ प्रताड़ना कि शिकायत पूरे सबूतों के साथ लेकर महिला एकता समिति की अध्यक्ष से मिलने आई थी, अध्यक्ष ने उसके खिलाफ हुए जुर्म के खिलाफ आवाज उठाने का आश्वासन भी दिया और विधायक के घर के आगे धरना देने के लिए इकठ्ठा हुईं, विधायक ने अध्यक्ष महोदय को अपने कार्यालय मिलने को बुलाया और करीब आधे घंटे बाद अध्यक्षा ने विधायक जी से हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए विदा ली और बहु को घर का मामला घर में ही निपटाने की सूझबूझ भरी सीख देते हुए धरने का अंत किया।




सपना मांगलिक
लेखिका आगमन साहित्य पत्रिका की सम्पदिका है और स्वतंत्र लेखक, कवि,ब्लॉगर है। साहित्य एवं पत्रकारिता को समर्पित संस्था ‘जीवन सारांश समाज सेवा समिति’ की संस्थापक है और कई सामाजिक संस्थाओं की सक्रिय सदस्य है। अब तक तेरह कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। आपको राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित किया जा चुका है।
लेखिका के बारे में अधिक जानकारी के लिए देखें  About Sapna Manglik


© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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