तू जो नहीं इस दिल में, तो मैं धड़कन का क्या करूँ,
तू जो नहीं इस जीवन में, तो मैं जी कर क्या करूँ,
तुम्हारे मुस्कान से, मैंने अपने होठों को सजाया है।

तुम्हारे साथ रहने के लिए मैंने, अपनों से की है रुसवायी,
जब इस धरा पर तू नहीं, तो मैं धड़कन का क्या करूँ...
दिन रात तुम्हारे ख्यालो में डूबा रहता है ये मन,
जब भी देखता हूँ तस्वीर तुम्हारी, मचल जाता है ये मन।

ये गुलबदन; मेरे ख्वाबों की शहजादी,
मैंने तुम्हें अपने जीवन में भर लिया साँसे बनाकर,
तू जो नहीं इस जीवन में, तो मैं जी कर क्या करूँ....

अगर तू है उस गगन में तो आ जाओ,
सारा कायनात तेरे पलकों के मध्य कर दूंगा,
उठा कर तुम्हारी डोली, अपने आँगन ले जाऊंगा,
तू मत कर इतना सितम मेरे जज्बातों पर,

मैं  तेरा छाया हूँ, डूब जाऊंगा तेरे अँधेरे में जाने के बाद,
तू जो नहीं इस दिल में, तो मैं धड़कन का क्या करूँ,
तू जो नहीं इस जीवन में, तो मैं जी कर क्या करूँ....।



आशीष कमल
उप-संपादक
लेखक योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा,
आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर
 कार्यरत हैं
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in


© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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