द्धापर युग का समय था। उस समय हस्तिनापुर में कौरव और पांडवो का साम्राज्य था। भीम अपने भाईयों में सबसे महाबली थे, जिस कारण उन्हे अपनी शक्ति का बहुत घमंड था। कौरव से जुए में हार के बाद वनवास झेल रहे पांडव जब बदरिकाश्रम में रह रहे थे तब एक बहूत ही सुन्दर और महक वाला सहस्त्रदल कमल द्रोपदी का मन मोह लेता है। द्रोपदी उसे उठा लेती है और महाबली भीम से ऐसा ही दूसरा सहस्त्रदल कमल लाने की कामना करती है।
भीम कमल को ढ़ूढ़ने के लिए जंगल में निकल गए और चलते-चलते भीम को गंधमादन पर्वत की चोटी पर केले का बहुत बड़ा सा बगीचा मिला जिसमें वे चले जाते है। हनुमान जी भी इसी वन में निवास करते थे। उन्हें भीम के आने का पता लगा, तो उन्होंने सोचा कि अब आगे स्वर्ग के मार्ग में जाना भीम के लिए हानिकारक होगा। वे भीम के रास्ते में लेट गए। भीम ने वहां पहुंचकर हनुमान से मार्ग देने के लिए कहा तो वे बोले- यहां से आगे यह पर्वत मनुष्यों के लिए अगम्य है।
भीम अपने आप को बहुत बड़ा महाबली समझता था और उसे लगता था की उस देश वीर इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं। इसी सोच के साथ वो उस वानर से कहता है- मैं मरूं या बचूं, तुम्हें इस बात से क्या मतलब है? तुम थोड़ा सा उठकर मुझे रास्ता दे दो।
इस पर वानर रूप में हनुमान कहते है कि मैं रोगी हूँ। मुझमे हिम्मत नहीं रही की खुद अपने आप दूसरी जगह बदल लूं। अतः तुम मुझे लांघकर चले जाओ।
भीम बोले- परमात्मा सभी प्राणियों की देह में है, इसलिए किसी को लांघकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। तब हनुमान बोले- तो तुम मेरी पूंछ पकड़कर हटा दो और निकल जाओ।
भीम यह सोचकर कि यह तो उसके लिए चुटकी का खेल है और वो हनुमान की पूंछ को हटाने का प्रयास करता है, लेकिन वानरराज को टस से मस भी नहीं कर पाता है। हर तरह से सभी कोशिश निष्फल होने के पर थक-हार कर माफी मांगता है और वानरराज से उनके परिचय जानने की इच्छा जाहिर करता है। तब हनुमानजी भीम को अपने दर्शन देते है और बताते है कि मैंने तुम्हे इस मार्ग से जाने के लिए रोका है क्योंकि इस मार्ग में आगे देवताओं का निवास है और यह मार्ग मनुष्य के लिए सही नहीं है। भीम के आग्रह करने पर हनुमान ने उन्हें अपना विशालतम रूप दिखाया जिस रूप से उन्होंने त्रेता में समुन्द्र लांघा था।
हनुमानजी से यह सबक सीखकर भीम को अपनी त्रुटि का ज्ञान हुआ। उन्होंने कभी घमंड न करने का वचन दिया और हनुमानजी को प्रणाम कर आगे चले गए। 


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Akshaya Gaurav

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