चौराहे पर लगी भीड़ को देख कर मैं रूक गयी। दिमाग ने कहा ‘इस अंजान शहर में कौन होगा, सोचा नहीं जाऊँ; लेकिन दिल ने कहा, देखते हैं क्या हुआ है? भीड़ को चीरते हुए, मैं अन्दर पहुँची। जब मैंने अन्दर के दृश्य को देखा; तो मेरा कलेजा मुँह को आ गया। आँखो से आँसू निकलना चाहते थे किंतु मैंने रोक दिया, होठ कुछ बोलना चाहते थे, लेकिन शब्द जिव्हवा में अटक गये।
मैं अपने आप को सँभालते हुये उसके नजदीक गयी और जोर से कहा, मैं इन्हें जानती हुँ, फिर मैं उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल ले गयी, वह बेहोश था, उसके थैले को खोला तो उसमें से एक डायरी मिली, मैंने चुपके से सबकी नजरों से छुपा कर उस डायरी को अपने बैग में डाल लिया, ये चोरी था; लेकिन मैने चोरी किया, क्योंकि इस व्यक्ति को मैं अच्छी तरह से जानती थी।
अस्पताल की फीस जमा कर के मैं वापस अपने घर को आ गयी। मन में उत्सुकता के बादल छाये हुए थे, ह्रदय की धड़कन व्याकूल थी, आत्मा से एक ही प्रश्न उभर के उपस्थित हो रहा था, ‘क्या ये बदल गये या पहले जैसे ही होंगे, प्रमीता के लिय इनके आँखो से तो मोहब्बत की धारा छलकती थी, परंतु ये विक्षिप्त कैसे हो गये? क्या इन्हें इनकी मँजिल नहीं मिली? ये तो लोगों में प्रेम के दीपक जलाते थे, समाज की सहायता के लिये सदैव सजग रहते थे, किंतु आज इन्हें ऐसा देखकर लग रहा है जैसे इन्हें किसी श्रेष्ठ अनुभूति की तलाश है जिसमें वो पूरी तरह से डूब गये हैं, क्या वह प्रमीता है या कोई और? या इनके साथ कोई अन्य दुर्घटना हुई है?
मेरे मस्तिष्क के अन्दर उमड़ रहे अनेकों प्रश्न ने, मेरे ह्र्दय को ज्वारभाटा बना दिया था, मैंने जल्दी से फ्रेश होकर डायरी निकाली और पढने लगी। प्रथम पृष्ठ को देखते ही मेरे बहुत से प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था, क्योंकि उस पृष्ठ पर लिखा था ‘प्रमीता तुम्हारे जाने के बाद’। मेरे मन को थोड़ी तसल्ली हुयी, कम-से-कम ये प्रमीता को तो नहीं भूले हैं।
-तत्पश्चात अगला पृष्ठ मैंने पढ़ना शुरू किया...
 ‘कैसे लोग अपने एहसास को शब्दों में बयान कर देते हैं, ऐसा मुझसे क्यूँ नहीं होता..प्रमीता?
मैं तुमसे कुछ कहना चाहता था किंतु बोल न सका, तुम्हें रोकना चाहता था किंतु रोक न सका, मैंने समझा; तुम मेरे एहसास को समझती हो, मेरे भावुक आँखो को पढ़ लेती हो...किंतु तुम नहीं पढ़ सकी....खैर??’
तुम्हें पता है? जब मुझे खुशी होती है तो मेरे दिल में एक लहर सी दौड़ जाती है जिसे मैं बयान नहीं कर पाता; मैं करना भी चाहता तो मुझसे नहीं हो पाता, बस मेरी धड़कनों की गति बढ़ जाती है और जब दर्द होता है तब भी मैं अपने एहसास को बयान नहीं कर पाता, बस मेरी आँखों से अविरल अश्रु धारा निकलते हैं जिसे मैं रोक नहीं पाता, मैं उसे रोकना भी चाहता हूँ तो वे नहीं रुक पाते।
तुमने मेरे भावुक आँखो को नहीं देखा और चली गयी, मेरी दुनिया से दूर...अरे मूर्ख! मेरे इस भावुक आँखों में सिर्फ तुम्हारे लिये ही प्यार भरा था...काश! तुम देख सकती।
प्रमीता! मुझे खुशी है कि तुमने अपनी जिंदगी को, अपने मन से चयन किया, मैं तुम्हे रोकूँगा नहीं। तुम्हें जाना है तो जाओ, लेकिन प्रमीता! मैं बस इतना ही कहूंगा, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ। हाँ ये सच है कि मुझे अपने प्यार को जताने नहीं आता लेकिन मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता।
आशीष कमल द्वारा रचित दो शब्द तुम्हारे लिए..
‘’तुम्हारे कदमों की शीतलता से मेरा आँगन गुलजार था, तुम्हारे मन की चँचलता से मेरा जीवन गुलजार था,  जबसे तुमने रखा था कदम मेरे जीवन के नभ में, मेरा ह्रदय और मेरे मस्तिष्क की शक्ति भी उदीयमान था...  किंतु; तुम चले क्या गये...मेरे हमराज
मेरे जीवन के उपवन में दर्द और चुभन का अब संसार है...’’
प्रमीता! अब मेरा दिमाग शून्य होता जा रहा है, पता नहीं, मैं इस डायरी को लिख पाउँगा या नहीं..।।
उपरोक्त पन्नों को पढ़ कर मेरा दिल भाव-विह्ल हो गया था, मन में उम्मिदों के किरण दिखायी दिये थे और डर भी लगा रहा था, पता नहीं क्या हुआ होगा..।


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लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है और योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा, आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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