क्या खोए? क्या पाए सोंचो?
पहले क्या थे? आज हुए क्या?
जो पहले समृद्ध कभी थे,
उनसे पूछो आज हुए क्या?

जीवन की सब गतिविधियों से,
गर्व हुआ करता था सबको।
जिनके आश्रयदाता थे हम,
उनसे पूछो आज हुए क्या?

कभी इसी पावन-धरती की,
इक हुंकार से जो डरते थे।
ऐयासी में डूबे रहने से,
पूछो हम आज क्या हुए?

देश में जिस स्त्री-जाति की,
लोग कभी पूजा करते थे।
आज उन्हीं लोगों से पूछो,
उनके साथ हैं आज हुए क्या?

वल्लभ, बोस और सिंह जैसे,
कितने वीर हुए धरती पर।
कभी मर्द जो कहलाते थे,
उनसे पूछो आज हुए क्या?

शिक्षक-शिक्षा से भारत ने,
विश्व-पताका लहराया था।
आज उन्हीं शिक्षा-शिक्षक से,
पूछो के हैं आज हुए क्या?

जो तप, संध्या-वन्दन आदि से,
ब्रह्मज्ञानी कहलाते थे।
उसी देश के ब्रह्मज्ञों से पूछो,
हैं, वो आज हुए क्या?

जो अपने उत्तम कर्मों
के द्वारा विश्व-पटल को जीते।
आज उन्हीं की हम सन्तानों से,
पूछो, हम आज हुए क्या?

विश्वामित्र, कण्व के जैसे,
ऋषि-गण कभी हुआ करते थे।
लोभ, मोह, माया में फंसकर,
उनसे पूछो आज हुए क्या?

संस्कृत, संस्कृति और सभ्यता,
के प्रतीक जो कहलाते थे।
दूषित-वाणी, गन्दे पहनावे से,
पूछो! आज क्या हुए?



नीलेन्द्र शुक्ल " नील " काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय से ग्रेजुएशन कर रहे है। लेखक का कहना है कि सामाजिक विसंगतियों को देखकर जो मन में भाव उतरते हैं उन्हें कविता का रूप देता हूँ ताकि समाज में सुधार हो सके और व्यक्तित्व में निखार आये। लेखक से ई-मेल sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।



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Akshaya Gaurav

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