‘फिर भी मैंने आगे के पृष्ठ को पलटना शुरू किया, इस विश्वास के साथ, शायद कुछ और मिल जाये इनके विषय में समझने की, डायरी के कुछ पन्ने खाली थे मैं सोची, शायद सच में कुछ भी नहीं लिखा है, लेकिन कुछ पन्नों को पलटने के बाद पुन: मैंने देखा-
मुझे याद है जब तुमने मेरा साथ छोड़ा था तो मेरे सिने में दर्द होने लगा था, दो-तीन दिन तक मैंने अपने दर्द को गैस का दर्द समझकर छोड़ दिया था। तीन दिन के बाद भी जब दर्द कम नहीं हुआ तो मैंने आदि का काढा बना कर पीया, हल्दी का भी काढा मैंने पीया था फिर भी दर्द कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, तब मुझे मेरी माँ की बात याद आयी, ‘मेरी माँ कहती थी, यदि शरीर के किसी भाग में दर्द हो तो कपड़ा गर्म करके उसे सेंकने से दर्द कम हो जाता है'। मैंने भी; कितनी बार गर्म चावल कपड़े में रख कर सेंका, लेकिन फिर भी मेरे दिल के दर्द कम नहीं हुए और तुम्हें पता है प्रमीता? ‘’मेरे आँखो से आँसू निकलते ही रहते हैं, मुझे लगा की मेरी चश्मे की पावर बढ़ गयी है, मैंने डॉक्टर से भी दिखाया, फिर भी मेरे आँखो से आँसू लगातार निकलते ही रहते हैं, समझ में नहीं आ रहा है की मुझे कौन सी बीमारी हो गयी है, मैं बीमार हो गया हूँ न, प्रमीता? मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है। मेरी माँ कहती है जब कोई बीमारी दवा से ठीक न हो; तो दुआ से ठीक हो जाती है। मैं मंदिर-मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारा सभी जगह गया, मैंने अपनी बीमारी भी बताया लेकिन क्या तुम्हें पता है? वहाँ से भी दुआ मुझे नहीं मिली ठीक होने का। मेरे दिल का दर्द कम नहीं हो रहा है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है प्रमीता। मुझे तुम्हारी याद बहुत आती है।
प्रमीता, क्या तुम्हें पता है? लोग अब मुझे पागल कहते हैं। मैं पागल नहीं हूँ, मैं तो तुम्हें प्रेम करता हूँ और इतना करता हूँ जिसकी कोई पराकाष्ठा नहीं है, तुम्हारे स्नेह के आँचल में रहने वाला तुम्हारा ये परम अपने दिल के दर्द से परेशान है और दुनिया मुझे पागल समझती है।
प्रमीता, उस दिन की घटना ने तो मेरे समस्त जीवन को ही बदल कर रख दिया। दिन शनिवार था रात के समय बहुत तेज आँधी और तूफान आया था, मुझे बहुत डर लग रहा था, मन करता था तुम्हारे दुपट्टे में अपना सर छुपा लूँ, लेकिन तुम मेरे पास तो थी नहीं। मेरे दिल का दर्द और भी तेज हो गया था, मुझे डर भी लग रहा था, फिर मैंने अपना लैपटॉप खोला और तुम्हारा विडियो देखने लगा, उसमें तुम- मुझे बोल रही थी “परम साहब, मैं तो भूत हूँ, आपको इस जन्म में पकड़ ली हूँ तो अब सात जनमों तक अपको नहीं छोड़ने वाली'। पता है प्रमीता? फिर क्या हुआ..!! तुम्हारे विडियो को देखते ही मेरे दिल के दर्द छूमंतर हो गये और मेरे आखों के आँसू भी गायब हो गये, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, तब तक तूफान भी थम गये थे, मैंने लैपटॉप को औफ कर उसे रख दिया और सोने चला गया, अरे ! ये क्या! फिर से मेरे दिल में दर्द और आखो से आँसू निकलने लगे। अब मुझे समझ में आ गया था, तुम्हारे आवाज सुनने से ही मेरे दिल के दर्द कम और आँसू रूक गये थे, फिर मैंने झट से तुम्हारे विडियो को अपने मोबाइल में कॉपी कर लिया और हेडफोन लगाकर चौबीस घँटा तुम्हारी आवाज को सुनता रहता था, तुम्हारी आवाज सुन कर मेरे दिल के दर्द और आँसू अब रूक गये थे, अब मैं ऑफिस जाने लगा। चार दिन तक बॉस ने मुझे कुछ नहीं कहा, लेकिन पाँचवे दिन बॉस मुझ पर बरस पड़े, ये सब क्या है परम? तुम ऑफिस में हेडफोन लगा कर क्यों रहते हो? तुम यहाँ के ऑफिसर हो कोई चपरासी नहीं! चलो हेडफोन निकाल दो। प्रमीता, उनसे मैंने बहुत बार कहा ‘मैं इस आवाज को नहीं सुनूंगा तो मेरे दिल में दर्द होंगा और मेरी आँखो से आँसू निकलने लगेंगे। लेकिन प्रमीता, बॉस ने मेरी एक न सुनी और मेरे हेड्फोन निकाल दिये, तुम्हें पता है? हेडफोन निकालते ही मेरी आँखो से आँसू निकलने लगे थे। बॉस एकदम से डर गये थे और उनके भी आँखो से आँसू निकलने लगे थे।
प्रमीता, लगता है बॉस भी तुम्हें बहुत प्यार करते हैं शायद उनके भी दिल में दर्द हो रहा होगा, मैंने उनसे कहा ‘बॉस आपको भी प्रमीता की आवाज सुनाउँ क्या? आपकी आँखो के आँसू रूक जायेंगे। लेकिन बॉस ने कहा..नहीं!! तुम अपने केबिन में जाओ। मैं चुपचाप चला गया। कुछ देर के बाद बॉस पुन: मेरे पास आये और बोले ‘परम, तुम रिजाईन दे दो, मैंने पूछा क्यों? तो बॉस ने कहा, ‘तुम्हारे दिमाग का ब्राउजर हैंग हो गया है जिससे तुम्हारा दिमाग न सर्फिंग कर रहा है और न डाउनलोड और न तुम्हारे दिमाग का होम पेज खुल रहा है, तुम आज ही रिजाइन दे दो। प्रमीता, तुम्हें तो पता है न? मैं बॉस की हर बात को मानता हूँ, इसलिये मैंने रिजाइन दे दिया और मैं घर आ गया।
प्रमीता, अगर बॉस दो दिन पहले बोलते, तो मैं इंटरनेट पर दिमाग के ब्राउजर को इंस्टॉल करने का तरीका खोज कर अपने दिमाग में इस्टॉल कर लेता। लेकिन बॉस ने मुझे अवसर ही नहीं दिया। नौकरी से निकाल देने के बाद जो भी रुपये थे सब धीरे धीरे खर्च हो गये अतएव; कुछ दिन के बाद मेरे मकान मालिक ने मुझे अपने घर से निकाल दिया। मेरे सभी समान भी ले लिया, क्योंकि मेरे सारे रूपये भी समाप्त हो गये थे। तुम्हें पता है प्रमीता ? मेरे सर में चक्कर आने लगा है... मुझे भूख नहीं लगती थी, लेकिन खाना देख कर मेरे मुँह में पानी आ जाता था। फिर मुझे तुम्हारी बात याद आयी तुम बोलती थी ‘परम जब आपके सर में चक्कर आये तो मेरे कंधे पर सर रख देना, आपकी सर दर्द ठीक हो जायेगा और जब रूपया समाप्त हो जाये तो मुझसे बोलना, मैं आपको रूपया दूंगी', इसलिए मैं तुम्हे खोजने लगा, पूरे दिल्ली में, मैंने तुम्हे ढूँढा, लेकिन तुम मुझे कहीं नहीं मिली। किर मुझे याद आया ‘मेरे से दूर जाते वक्त तुमने अपना पता बताय था, शायद ब.. से नाम था, मुझे याद भी नहीं आ रहा है, क्योंकि मेरे दिमाग का ब्राउजर हैंग हो गया है न! इसलिये कुछ भी सर्फिंग और नहीं डाउनलोड कर पा रहा है। तुम बहुत चॉकलेट खाती हो न इसलिए मैंने तुम्हे चॉकलेट के दुकान पर भी ढूंढ़ा, तुम वहाँ पर भी नहीं मिली; तुम तो प्रतिदिन स्टेशन पर मिलती थी न मुझसे? तो आज मैं स्टेशन पर आया हूँ, वहाँ पर नवविवाहित पति-पत्नी बैठ कर वेज-रोल खा रहे थे। मुझे देख कर उन्होने मुझसे रोल खाने को पूछा -तो मैंने दो रोल उनसे ले लिया एक मैं खाने लगा और दूसरे को अपने शर्ट में रख लिया तुम्हारे लिये! जब तुम आयेगी तो तुम्हें दूँगा। तुम जब भी स्टेशन पर मुझसे मिलती थी तो मैं, तुम्हें कुछ न कुछ खिलाता था। लेकिन आज तो मेरे पास रूपया नहीं है न! इसलिये मैंने एक छुपा लिया है तुम्हारे लिए। मेरा पेट बहुत दुख रहा था तो प्रमीता; मैंने दुसरा वाला भी अब खा जाता हूँ, तुम नाराज नहीं होना! तुम ही तो अक्सर बोलती थी, खाली पेट नहीं रहना चाहिये, वरना पेट गर्म हो जाता है और दुखने लगता है, मैं तो 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया; तो मैंने रोल को खा लिया है। लेकिन, तुम गुस्सा नहीं करना, जब तुम आओगी तो तुमसे रूपया लेकर फिर तुम्हारे लिए खरीद लूंगा।

जानती हो प्रमीता एक ट्रेन स्टेशन पर आकर रूकी, बहुत से लोग बंगलोर-बंगलोर चिल्लाने लगे, तो मुझे याद आया की तुम भी तो बंगलोर में ही रहती हो न? इसलिये मैं भी ट्रेन में चढ गया, ट्रेन में चढते ही टीटी ने मुझसे टिकट मांगा, मैंने उनसे कहा की मेरे पास रूपया ही नहीं है तो टिकट कहाँ से लाउं। मैं तो रूपया लाने ही बंगलोर जा रहा हूँ, जब मैं वापस आउंगा तो आपको टिकट दे दूंगा। उसने मुझे बहुत कुछ बोला, वो मुझे धक्का देकर बोला भिखमँगा कहीं का, ना जाने कहाँ कहाँ से चले आते हैं। प्रमीता; क्या मैं भिखमंगा दिखता हुँ? तुम तो मुझे बोलती थी ‘मेरे परम तो राजकुमार से दिखते हैं' तो फिर टीटी ने मुझे भीखमंगा क्यूँ कहा? तुम अगर उस वक्त मेरे साथ रहती तो उसे थप्पड़ जरूर लगाती। प्रमीता; मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है!! मैं उतरने ही वाला था तब तक 15 से 16 विद्यार्थी आ गये और उस टीटी से बोले ‘ये हमलोग के साथ है। फिर वे लोग मुझे अपने सीट पर बैठा दिये। मुझे सीट पर बठा देख कर उनमें से एक लड़की ने उन लड़को से कहा ये कौन से पागल को तुमलोग मेरे सीट पर बैठा दिये यार?
 ‘प्रमीता; इन लोगों को क्या हो गया हो गया है.. कोइ मुझे भीखमंगा तो कोई मुझे पागल बोल रहा है। मैं पागल नहीं हूँ, मैंने तो किताब लिखा है और बहुत से पुरस्कार भी मुझे मिला है और... मैं तो तुमसे बहुत प्यार भी करता हूँ, तुम तो मुझे सोना बाबू, अनमोल बोलती हो? तो मैं पागल कैसे हुआ? बोलो न प्रमीता? अच्छा; जब तुम मेरे पास आयेगी तो इनको जरूर बोलना, मैं पागल नहीं हूँ। मैं कुछ उस लड़की को बोलता तब तक सारे लड़के उसको डाँटने लगे- अरे यार; ये मशहूर लेखक और सूचना वैज्ञानिक परम सर हैं, छोटी उम्र में ही इन्होने बहुत से अनुपम कार्य किये जिससे ये मशहूर हो गये हैं। लेकिन प्यार ने इन्हें ऐसा बना दिया है। ये एक लड़की से बहुत प्यार करते थे उससे शादी करना चाहते थे। लेकिन हम विद्यार्थीयो को तथा समाज को एक नयी दिशा देने हेतू अपना पूरा समय किताब लिखने और नये आविष्कार में व्यतीत कर देते थे जिसके कारण, इनकी गर्लफ्रेंड ने इन्हें छोड दिया, जिससे ये पागल हो गये। बेचारे को नौकरी से भी निकाल दिया गया, इनके बॉस ने इनका इलाज भी कराने का प्रयत्न भी किये लेकिन ये वहाँ से भाग गये ये बोलकर कि ‘’मैं पागल नहीं हूँ'। पता नहीं कहाँ जा रहे हैं, रूको; मैं इनसे पूछता हूँ। इतना बोलकर वो लड़का चुप हो गया और मेरे पास आने के लिये बढ़ा।
एक बात बताओ प्रमीता; तुम तो मेरी गर्लफ्रेंड नहीं मेरी पत्नी हो न? और तुम मुझे छोड़कर नहीं गयी हो न? तुम तो शादी करने गयी हो न? शादी करके फिर मेरे पास आ जाओगी न प्रमीता? अब यह बात इन लोगो को कौन बताये। जब तुम इनसे मिलना तो बोल देना। मैं कुछ भी नहीं बोलूंगा। तुम्हें तो पता है न, जब मैं तुम्हारे और अपने बारे में बोलना शुरू करता हूँ तो बस बोलता ही चला जाता हूँ। इसलिए; मैं इनसे कुछ नहीं बोलूंगा। मैं तुम्हें याद करते हुए कब सो गया, मुझे पता ही नहीं चला। सुबह मेरी नींद खुली तो मैंने स्टेशन पर गाड़ी रुका हुआ पाया; मैं ट्रेन से  नीचे उतर गया और तुम्हें खोजने लगा। पूरे स्टेशन पर खोजने के बाद मैं शहर में गया। मैंने सबसे पूछा, आपने प्रमीता को देखा है? तो वे लोग मुझसे तुम्हारी तस्वीर पूछते थे; तो मैं बोलता था ‘मेरी आखों में देखो ना आपलोग'- मुझे तो वो हमेशा दिखायी देती है आप लोगों को क्यूँ नहीं दिखती। तो सब लोग मुझे पागल बोल कर भगा देते थे।
प्रमीता; तुम उन लोगों को क्यों नहीं दिखाई देती हो? लेकिन मुझे तुम ही बस दिखती हो; मेरी नजर जहाँ पर भी जाती है मुझे केवल तुम ही नजर आती हो, मुझे तो ये भी नहीं पता होता की मेरे सामने क्या हो रहा है- लेकिन तुम इन्हें दिखाई नहीं दे रही हो, क़्यों? सुबह से शाम हो गयी है तुम्हें खोजते-खोजते, अब रात भी होने वाली है, लेकिन तुम मुझे नहीं मिल रही हो, मैं अब बीच रोड में जो पुलिस है न उनसे पूछने के लिये जा रहा हूँ, शायद उन्हें पता हो तुम्हारे विषय में, क्योंकि; पुलिस तो सब जानती है न..।

क्रमश: 



लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है और योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा, आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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