इस वाक्य के बाद डायरी में कुछ नहीं लिखा था, मैं बेचैन हो गयी मेरी आँखो से अविरल आँसू निकल रहे थे मेरा दिल मुझे धिक्कार रहा था, परम मुझसे इतना प्यार करते हैं और उन्हें मैं अकेले छोड़ कर चली आयी। मेरे परम को कितना कष्ट उठाना पड़ा, ये सभी मेरे कारण हुआ है। हे! ईश्वर मेरे गुनाहों को बख्श दे, मेरी अपनी गुनाहों की सजा मुझे ही दे, किंतु मेरे सह्र्दय परम को उसे पहले जैसा कर दो। तू!! सुन रहा है न ईश्वर, अगर, आज तुमने मेरी नहीं सुनी तो प्रेम और स्नेह से सबका विश्वास समाप्त हो जायेगा, कोई भी पुरूष किसी भी स्त्री से प्रेम नहीं करेगा। स्त्री प्रेम की मूर्ती होती है किंतु पुरूष प्रेम की आत्मा होते हैं। मैंने भी परम से प्रेम किया था किंतु तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं किया.... मेरे ह्र्दय सम्राट परम के साथ ही क्यों किया तुमने...।
मुझे तो पता था कि; मेरे परम मुझसे सच्चा प्रेम करते हैं, लेकिन इतना करते हैं ये मुझे नहीं मालुम था; लेकिन आज मैं पूरी दुनिया के सामने चीख-चीख कर कहती हूँ, प्रत्येक पुरूष सह्र्दयी होता है, उसे अपनी स्त्री से अन्नत प्रेम होता है किंतु वह शब्दों में बयान नहीं करता, पुरूष के प्रेम को स्त्री को एहसास करना होता है, जो मैं अपने परम के प्रेम को नहीं कर पायी, प्रत्येक पुरूष अपनी स्त्री से इतना ही प्रेम करता है जितना मेरे परम मुझसे करते हैं। हे!! ईश्वर!! परम को मुझे वापस दे दो। मेरी विलाप सुन कर मेरी दोस्त सुनैना बगल वाले कमरे से दौड़ती हुयी आयी, मेरे हाथों से डायरी ले कर पढ़ने लगी तथा मेरे उपर प्रश्नों की बौछार कर दी...मेरे न चाहते हुये भी उसके प्रश्नों का उत्तर देना पड़ा मैं अपने आँसुओं के मध्य अपने बीते हुये कल को बताने लगी...।
प्रमीता- मैने तुमसे एक राज छुपाया था।
सुनैना- मुझे तो पता था की तुम परम से बात करती हो लेकिन प्रेम करती हो यह तुमने नहीं बताया था, परम तुमसे प्रेम करते हैं, ओह माय गॉड, अरी, पगली ‘तुम कितनी बदकिस्मत हो, परम, जिसके नाम से दुनिया प्यार और प्रतिभा की उदाहरण देती है जो सबके दिलों पर राज करता है और वो तुम्हें प्यार किये और तुमने उन्हें ठुकरा दिया, तू बहुत दुर्भाग्यशाली है, ईश्वर परम जैसा लड़का बहुत कम बनाते हैं, तुम्हारी किस्मत ही खराब है, जाओ यहाँ से अब तुमसे मैं भी बात नहीं करूँगी।
प्रमीता- रोते हुये ‘हाँ मैं दुर्भाग्यशाली ही हुँ जो परम जैसे इंसान को नहीं पहचान सकी, लेकिन मैं क्या करूँ। तू मेरी बात एक बार सुन ले फिर जो चाहे सजा दे देना।
और फिर प्रमीता ने गुजरे पलों को जोड़ना आरम्भ किया और बोलने लगी ‘परम से दूर होने के बाद जब मैं बंगलोर पहुँची ह्रदय में अजीब सी छटपटाहट थी जिसके सीने से लग कर मुझे सुकून मिलता था जिसके आगोश में मैं पूर्णत: सुरक्षित थी आज वो मेरे पास नहीं है, परम आपके जाने के बाद अजीब सा डर लगता था, मैं रात को उठकर आपको अपने आस-पास ढूँढती, रोते रोते कब मेरी आँख बन्द हो जाती मुझे सुबह में पता चलता जब अपने तकिये के गीलापन से मेरी नींद खुलती, मेरे एहसास मिट गये थे, मुझे न रोमांच होता था और न खुशी, आपके संग बिताये हर पल को याद करके मैं प्रतिदिन तड़पती थी, हर रोज आपके आराध्य शंकर-पार्वती से प्रार्थना करती कि आप मेरे पास आ जाओ, आपसे बिछड़ने के बाद मैंने अपने हाथ का नस भी काट दिया था, जिससे मैं मर जाउं लेकिन आपके उस वाक्य ने मुझे इलाज करने पर विवश कर दिया था जिसमें आपने बोला था,
'ए मेरे ख्वाबों की शहजादी, जब तुम ही नहीं तो मैं जी कर क्या करूँगा।'
सिर्फ यही सोच कर मैं अपनी जीवन को आपके नाम कर दिया मेरे; मेरे परम।
सुनैना मुझे माफ कर दो तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो और तुमसे भी मैंने परम के बारे में छुपाया, मुझे माफ कर दो।
सुनैना, प्रमीता के आसुंओं को पोछते हुये बोली, मेरी जान- प्रमीता ‘तुम्हें याद है एक दिन मैं बिना हेलमेट के ऑफिस से घर जाने वाली थी और तुमने जबरदस्ती हेलमेट पहनने को बोला था और बाद में उस दिन ही मेरे साथ दुर्घटना हो गयी थी जिसमें हेलमेट की वजह से मेरी जान बच गयी थी और मैं अपने इस जीवन को तुम्हारा दिया हुआ बोलकर फेसबुक पर लिखा था, याद है ना तुम्हें, तो मेरी प्यारी जान तुम कभी गलत हो ही नहीं सकती, तुमने जो किया वो तुम्हारी विवशता थी, अब ये सब भूल जाओ और अस्पताल जाओ, ईश्वर से प्रार्थना करो की हमारे जीजाजी परम साहब जल्दी से ठीक हो जायें फिर हम तीनों मिलकर घुमने जायेंगे।
मैं बिना समय व्यर्थ किये, रोते हुये और अपने भाग्य को कोसते हुए मैं अस्पताल पहुँची, परम बेसुध पड़े थे, उनके चेहरे पर दुख नहीं सादगी नजर आ रही थी, उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था कि मोहब्ब्त उन्होने नहीं वरन उनको मोहब्ब्त ने मोहब्ब्त किया हो। वे प्रेम का प्रतिबिम्ब नजर आ रहे थे, मैं उनके पैरो को चुमने लगी। मेरे परम अब उठ जाओ! मैं अब कभी भी अपको अकेला नहीं छोड़ूगी, मुझे बस एक बार मौका दे दो मेरे अनमोल।
हे! ईश्वर बस एक बार मेरे परम को वापस कर दो। मेरी रूलाई को सुनकर; डॉक्टर आ गये और मुझसे बहुत ही कातर स्वर में बोले-‘अब इन्हें ईश्वर ही बचा सकता है मैडम'। इतना बोल कर डॉक्टर वापस चले गये। मैं बुत बनी खड़ी रही, मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू, मेरा दिमाग शून्य हो गया, ह्र्द्य चीख-चीख कर मेरी भावना को व्यक्त करना चाह रहा था किंतु मेरे मुख से आवाज नहीं निकल रही थी, मैं अपने ह्रद्य सम्राट परम के पैरों को पकड़ कर क्षमा माँगना चाहती थी, मुझे भी उनसे कुछ बोलना था, लेकिन मुख से आवाज नहीं निकलने के कारण मेरी आँखों से निकलती आँसूओं ने बोलना प्राम्भ कर दिया था (सत्य है यदि परिस्थिति मनुष्य के ह्रदय और मुख को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से रोक दे तो प्रकृति ने मनुष्य को आँसू जैसे बहुमूल्य संचार का माध्यम दिया है जिससे निकलने वाली प्रत्येक बूँद सत्यता की बोध कराती है और मनुष्य अपनी भावनाओं को आसानी से व्यक्त कर देता है, आज ऐसा ही कुछ प्रमीता और परम के साथ हो रहा था, किंतु प्रमीता की आँसूओं को परम कैसे समझे, वो तो इहलोक और परलोक के मध्य में उलझा हुआ था, उसे तो यह भी नहीं ज्ञान था, की वो अपने दिल में प्रमीता के लिय अगाध प्रेम लिय हुये प्रमीता का सानिध्य चाहिए, न कि रूपया, जिसके लिये वो प्रमीता की खोज में आया था, परम को तो लग रहा था सिर्फ प्रमीता से रूपया लेना है, किंतु परम की रूह तो प्रमीता में अटकी पड़ी थी उसे तो यह भी ज्ञान नहीं था जिसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर जिसे ढूँढ रहा था उसकी ह्रदयसंगीनी उसके पास बैठी अपना सर्वस्व देने के लिए अपनी आसूँओं से उसके दर्द को अमृत बना रही है) प्रमीता के दिल में एकत्रित मोहब्बत ने अपना विस्तृत रूप ले लिया था उसे न तो दुनिया की चिंता थी और न अपनी, उसे तो केवल परम के प्रति अगाध प्रेम का ज्वारभाटा फूट रहा था, जो बचपन से परम के लिए एकत्रित हुए थे और यदि आज परम उसे छोड़कर चला गया, तो उसके मोहब्बत के कश्ती का खेवनहार कौन होगा, उसके जीवन का मार्गदर्शक कौन होगा, उसे सीने से लगा कर पिता और भाई के भांति करूण स्पर्श कौन देगा, उसके नयनों से निकलते आँसूओं को कौन जमीं पर गिरने से रोकेगा, उसे सखा की भाँति कौन समझायेगा, उसे साजन के जैसा कौन गले लगायेगा; उसे माँ के जैसा कौन प्यार करेगा; उसके निकलते आसूओं ने उसके ह्रदय के शब्दों को वाक्यों में पिरोना शुरू कर दिया।
 ...परम अगर आज आपने मुझे छोड़ दिया तो मैं भी आपके पीछे आ जाऊंगी, मेरी क्या गलती है परम? आपने एक बार भी रूकने को नहीं बोला मुझे, मैं आपके पास से तो यहाँ आ गयी, किंतु पल-प्रतिपल मैं यहाँ तड़प रही थी, मैं आज भी उस पल को सोच कर तड़प उठती हूँ, मैं खाना सामने रखकर आपके फोन का इतजार करती थी, लेकिन आपका फोन नहीं आता था फिर मैं भूखे ही सो जाती थी ये सोचकर की आज आपने भी खाना नहीं खाया होगा, क्योंकि मेरे बिना खाये आप नहीं खाते थे, दिन-महिना बीत गया लेकिन आपका एक बार भी फोन नहीं आया, जब मुझे लीवर में समस्या आने लगी तो डॉक्टर के कहने पर खाना शुरू किया लेकिन आज भी आपके विषय में सोच कर मेरी रूह काँप जाती थी की आपने खाया होगा या नहीं?
आपको पता है परम? मुझे ऑफिस में सभी मेमोरी लूजर बोलते थे, एक दिन ऐसी घटना घट गयी जिससे मेरी नौकरी जा सकती थी, हुआ यूँ, शुक्रवार के दिन मुझे विलंब से घर जाना पड़ा, मैं लिफ्ट में चढ़ गयी किंतु मुझे ये पता नहीं की लिफ्ट तो शाम में ही बन्द हो जाती है और मैं पूरे तीन दिन तक लिफ्ट खुलने का इतजार करती रही, जब तीन दिन के बाद स्टाफ आये तो मुझे बेहोशी की हालत में अस्पताल ले गये थे...
ऑफिस के सभी स्टाफ ने मुझसे बोला था कि प्रमीता तुम परम को भूल जाओ लेकिन परम; मैं आपको कैसे भूल जाऊँ, आप तो मेरी रूह में धड़कन की जगह धड़कते हैं, आपको कसे भूल जाऊँ परम! इस दुनिया में अपके आलावा मेरा कोई नहीं है; माँ की मृत्यु के बाद आपने ही मुझे जीवन जीने का मार्ग बताया था आपके जैसा कोई भी प्यार मुझे नहीं दिया था, मुझे याद है मैं जब पहली बार आपके गले लगी थी तो आपने मुझे अपना जीवन ही देने का वचन दे दिया था और बड़े आत्मविश्वास से बोला था ‘मेरी प्रमिता-आज से परम जियेगा तो तुम्हारे लिए और पागल होगा तो तुम्हारे लिए, तुम्हारी खुशियों के लिए ये परम सब कुछ करेगा तुम्हें माँ की कमी कभी प्रतीत नहीं होगी ये मेरे परम वचन है और फिर मुझे बहुत सारा प्यार भी दिया था, आपने मेरे सारे गमो को अपना बना लिया था, मुझे हर वो खुशी दिया था आपने। तो फिर आप मुझसे नाराज क्यों हैं अपना वचन क्यों तोड़ रहे है, परम।
आपने एक बार भी मुझे नहीं बुलाया अपने पास और न मुझे कोई सूचना दिये और आप मुझे छोड़ कर जा रहे हैं। मैं ही पागल आपका इंतजार करती रही, लेकिन मुझे नहीं पता था कि आपका ये हाल हो गया है मेरे बिना, मुझे माफ कर दो परम, अगर आप माफ अब नहीं करोगे तो; मैं अपना यह जीवन किसके लिये रखूँगी। मुझे भी अपने साथ ले चलो, इस दुनिया में मैंने आपका बहुत दिल दुखाया, पर विश्वास कीजिये, उस दुनिया में; मैं आपको अपने से कभी अलग नहीं होने दूँगी चाहे आप मुझे प्यार करना या मत करना; मैं आपके चरणों में रह कर आपकी सेवा करूँगी, मेरी गलती के पश्चाताप करने का मुझे एक बार मौका दो मेरे परम, आप तो सह्रद्यी हैं, मुझे भी अपने साथ ले चलो, मुझे आपके बिना यहाँ नहीं रहना। रोते-रोते कब मैं बेहोश हो गयी पता नहीं चला मुझे, जब होश आयी तो देखा परम उठ कर बैठे हुये हैं और मुझे घूर–घूर कर देख रहे हैं, मैं बिना समय गँवाते हुये उनको अपने बाहपाश में समेट लिया और उनके गुलाबी होठों पर मैनें अपनी नाक रगड़ दिया, आज ईश्वर ने मुझे मेरे परम को दे दिया हमेशा के लिए, मेरे परम! तुम्हारे प्यार में, तुम्हारी ये प्रमीता; सदैव निसार है।
कौन तुझे यूँ प्यार करेगा जितना अब मैं तुमसे करती हूँ।

अंतिम भाग। 


लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है अौर आप सामाजिक, साहित्यिक तथा शैक्षिक परिवेश पर लेखन करते हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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