जीवन के पथ पर अकेला ही चला,
मन में उम्मीदों के दीपक जलाये,
थक कर नहीं बैठूगा मैं,
जब तक मुझे मंजिल न मिल जाये।

जब आँखो में सपने हों,
मन में हो दृढ इच्छाशक्ति,
रोकता नहीं जमाना,
और किनारे; लग ही जाती है कश्ती।

सोच लिया,
अब न हारूँगा कभी,
अब न रूकूंगा कभी,
बढ़ चला हुँ कर्मपथ पर,
तो हासिल करूँगा; मँजिल सभी।

कर्म और सौभाग्य का,
मिलन जब होगा,
आयेगी बहारें और बरसेगा सावन,
सच होंगे सपने; पुलकित होगा आँगन।

खिलेंगे खुशीयों के फूल,
होगी होठों पर हँसी,
मोहब्बत मिलेगी जमाने से,
और गीत; नित्य नयी होगी।

जीवन के पथ पर अकेला ही चला,
मन में विश्वास के दीपक जलाये,
थक कर नहीं बैठा कभी,
जब तक मंजिल न मुझे मिल गये।


लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है अौर आप सामाजिक, साहित्यिक तथा शैक्षिक परिवेश पर लेखन करते हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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