ज़िंदगी फिरकी बहुत है
जब जी चाहे घूमती
कहने को मेरी अमानत
मृत्यु से है, बोलती

तूँ बड़ा प्यारा सा लगता
तुझमें जग सारा सा लगता
मैं तो चक्कर काटती
हृदय को तुझसे बाँधती

कब होंगे फेरे मुझसे
आयेगी वो रात भली
मिलके रहूँगी, संग तुम्हारे
कुछ नहीं मैं जानती

स्वामी मेरा स्वार्थी
बाँधता मुझको अभी
द्वेष रखता मृत्यु से वो
मुझको बनाये बंदीनी

दो किनारे, आँचल के मेरे
एक थामे, तूँ अभी
दूसरा थामे है मानव
मध्य में हूँ मैं फँसी

विचलित हुई
कुछ पल मैं सोचूँ
अस्थाई, एक धरा
दूसरा नश्वर कहीं
साथ दूँ! तो दूँ मैं किसका
भाग्य भी सौतन हुई

एक तरफ मानव खड़ा
बनकर उपद्रवी, मूर्त सा
दूजा निर्मल, शांत होकर
मृत्यु मधुर स्वर बोलता

अल्पावधि सपनें बहुत
लेकर खड़ा वो शाप है
कड़वी सी लगती श्रवण को
सत्य का आलाप है

प्रश्न हूँ! उत्तर भी मैं
सत्य का संकेत हूँ
तूँ जीवन संगिनी मेरी
छोड़ मानव देह प्रेम

मिल जा तूँ अस्तित्व में
विश्वास कर मुझमें तनिक
क्षणभर सा पुतला माटी का
हो जायेगा, धरा विलीन


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर 'एकल्वय' नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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