• कुँवर नारायण द्वारा लिखित और गीत चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित किताब।


नई दिल्ली। इंडिया हैबिटैट सेंटर में चल रहे हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल में लेखक, कवि और विश्व सिनेमा के जानकार कुँवर नारायण की किताब 'लेखक का सिनेमा' पर वार्ता हुई। इस मौके पर कला और फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज, कवि, संपादक गीत चतुर्वेदी, लेखक रविकांत एवं फिल्म आलोचक मिहिर पंड्या मौजूद रहे। "लेखक का सिनेमा" किताब कुँवर नारायण द्वारा लिखित और गीत चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित है तथा इसे राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।
इस किताब में यूरोपियन फिल्मों और फिल्मकारों पर कुछ जरूरी लेखों को शामिल किया गया है। किताब के अनुक्रम को देखते हुए अनायास ही मन में सवाल उठता है कि लेखक का अनिराग पूर्वी यूरोपीय फिल्मकारों के प्रति इतना क्यों है। सत्र के दौरान अपने अनुभव साझा करते हुए किताब के संपादक गीत चतुर्वेदी ने बताया कि उन्होंने भी यही सवाल कुँवर नारायण जी से किया था, जिसके जवाब में कुँवर नारायण जी ने बेहद सादगी से बताया था, "हमारी संस्कृति उनकी संस्कृति के बहुत नजदीक है। जब हम उनकी फ़िल्में देख रहे होते हैं, तो ऐसा लगता है मानो अपने ही किसी भाग को देख रहे हों।" वो ये भी स्वीकारते हैं कि "मैंने इन फिल्मों को जिस नजरिये से देखा और समझा है, हो सकता है वही एकमात्र सही नजरिया न हो।"
फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने बताया की इस किताब में पढ़े लेखों को पढ़कर एहसास होता है कि "इन फिल्मों के माध्यम से एक जीवित इतिहास आगे बढ़ रहा है।" ये लेख उस समय के दौर को साकार करके आपको उन हालातों से रूबरू कराते हैं।
वरिष्ठ कला और फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज न सिर्फ कुँवर नारायण जी के मित्र हैं, बल्कि इस किताब में जिक्र अधिकांश फ़िल्में उन दोनों ने साथ में ही देखी थीं। उन्होंने बताया कि भारत में "फेस्टिवल कल्चर" की शुरुआत 1975 से हुई थी। उसी दौरान इन्हें यूरोपीय फिल्मकारों की फ़िल्में देखने और सराहने का मौका मिला। साथ गुजारे कई बेहतरीन लम्हों में से वे सत्यजीत रॉय के साथ गुजारे दिन को अपनी खुशनुमा याद बताते हैं, जिस मुलाकात का जिक्र कुँवर नारायण जी की इस किताब में भी किया गया है। उन्होंने बताया की उस दौर में "यूरोपियन सिनेमा पावरफुल था, जो अब नहीं है।"
वरिष्ठ लेखक रविकांत ने बताया, "कुंवर नारायण जी बतौर कवि इन फिल्मों को देख रहे थे।" उन्होंने शुरूआती फिल्मों पर साहित्य के जबरदस्त प्रभाव की भी चर्चा की।
कुँवर नारायण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कवि हैं। वह विश्व सिनेमा के गहरे जानकारों में हैं। उन्होंने आधी सदी तक सिनेमा पर गंभीर, विवेचनापूर्ण लेखन किया है, व्याख्यान दिए हैं। “लेखक का सिनेमा”उन्हीं में से कुछ प्रमुख लेखों, टिप्पणियों, व्याख्यानों और संस्मरणों से बनी पुस्तक है। इसमें अनेक अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सवों की विशेष रपटें हैं, जो लेखकीय दृष्टिकोण से लिखी गई हैं और बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस किताब में वे कला, जीवन, समाज और सिनेमा, इन सबके बीच के संबंधों को परिभाषित, विश्लेषित करते हुए चलते हैं। इसमें सिनेमा के व्याकरण की आत्मीय मीमांसा है।
प्रसिद्ध फिल्मों व निर्देशकों के अलावा उन उन निर्देशकों व फिल्मों के बारे में पढना एक धनात्मक अनुभव होगा, जिनका नाम इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक कम आ पाया। हिंदी किताबों से जुडी नई पीढ़ी, जो विश्व सिनेमा में दिलचस्पी रखती है, के लिए इस किताब का दस्तावेजी महत्व भी है।
गीत चतुर्वेदी के शब्दों में, “अर्जेंटीना के लेखक बोर्हेस की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—‘मैं वे सारे लेखक हूँ जिन्हें मैंने पढ़ा है, वे सारे लोग हूँ जिनसे मैं मिला हूँ, वे सारी स्त्रियाँ हूँ, जिनसे मैंने प्यार किया है, वे सारे शहर हूँ जहाँ मैं रहा हूँ।’ कुँवर नारायण के सन्दर्भ में इसमें जोड़ा जा सकता है कि "मैं वे सारी फ़िल्में हूँ जिन्हें मैंने देखा है।"


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Akshaya Gaurav

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