उपरोक्त कहानी सूरज प्रकाश जी द्वारा रचित है। प्रकाश जी लेखन के क्षेत्र में देर से उतरे लेकिन उनका कहना है कि वे अब तक इतना काम कर चुके है कि अब देरी से लिखने का मलाल नहीं सालता। उन्होने अब तक लगभग चालीस कहानियां लिखी है और पांच कहानी संग्रह हैं। इसके अलावा उनके दो उपन्यास, दो व्यंग्य संग्रह और एक कहानी संग्रह गुजराती में भी है साचासर नामे जो 1996 में छपा था। मूल लेखन के अलावा आपने गुजराती और अंग्रेज़ी से बहुत अनुवाद किये हैं।

पेश है कहानी का पहला भाग

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अभी वाशरूम में हूँ कि मोबाइल की घंटी बजी है। सुबह-सुबह कौन हो सकता है। सोचता हूँ और घंटी बजने देता हूँ। पता है जब तक तौलिया बाँध कर बाहर निकलूंगा, घंटी बजनी बंद हो जायेगी। घंटी दूसरी बार बज रही है, तीसरी बार, चौथी बार। बजने देता हूं। बाद में भी देखा जा सकता है, किसका फोन है।
बाहर आकर देखता हूँ अंजलि का फ़ोन है। कमाल है, अंजलि और वह भी सुबह-सुबह। उनसे तो बोलचाल ही बंद हुए महीना भर होने को आया।
फोन मिलाता हूँ- हैलो, आज सुबह-सुबह, सब ठीक तो है ना?
मेरी हैलो सुने बिना सीधे सवाल दागा जाता है -इतनी देर से फोन क्यों  नहीं उठा रहे?
बताता हूं- नहा रहा था भई और मैं नहाते समय अपना मोबाइल बाथरूम में नहीं ले जाता।
-डोमेस्टिक एयरपोर्ट पहुँचनेमें आपको कितनी देर लगेगी?
मैं हैरान होता हूं। अंजलि और मुंबई एयरपोर्ट पर?
मैं कारण चाहता हूँ लेकिन वही सवाल दोहराया जाता है -डोमेस्टिक एयरपोर्ट आने में आपको कितनी देर लगेगी?
मैं बताता हूँ- ट्रैफिक न मिले तो पन्द्रह मिनट, नहीं तो आधा घंटा।
-हम्म तो आप एक काम कीजिए। तीन दिन के लिए कैजुअल से कपड़े एक बैग में डालिये, गाड़ी निकालिये और मुझे आधे घंटे बाद डोमेस्टिक एयरपोर्ट एवन के अराइवल गेट पर मिलिये। अभी फ्लाइट लैंड हुई है, तब तक मैं भी बाहर आ ही जाऊंगी।
मैं हैरान होता हूँ- आप सुबह-सुबह बंबई में कैसे? मेरी बात नहीं सुनी जाती। अंजलि अपनी बात दोहराती हैं- मैं वेट करूंगी।
मैं सोच में पड़ गया हूं- अंजलि बंबई आयी हैं। अभी फ्लाइट से उतरी भी नहीं हैं। मुझे एयरपोर्ट पर ही बुलाया है और तीन दिन के लिए कैजुअल कपड़े भी डालने के लिए कह रही हैं। पता नहीं क्या  है उनके मन में।
याद करता हूँ, कल ऑफिस की एक ज़रूरी मीटिंग में मेरा होना बेहद ज़रूरी है। देखें, ये तो अंजलि से मिलने के बाद ही पता चलेगा कि वे क्या चाहती हैं। मैं फटाफट तैयार होता हूँ। सफ़र के लिए ज़रूरी सामान और कपड़े बैग में डालता हूँ। ब्रेकफास्टक का टाइम नहीं है। गाड़ी निकालता हूँ। अभी गेट से बाहर निकला ही हूं कि फिर अंजलि का फोन है।
गाड़ी एक तरफ खड़ी करके पूछता हूँ- अब क्या है?
वे पूछती हैं- कहाँ तक पहुंचे?
मैं बताता हूँ- अभी गेट से बाहर निकल ही रहा हूँ।
एक और आदेश थमाया जाता है- तकलीफ तो होगी, ज़रा वापिस जाकर अपना लैपटॉप लेते आओ। वजह मत पूछना प्लीज़।
मैं पूछना चाहता हूँ- ये सब क्या हो रहा है, लेकिन उन्होंने इतने प्यार से कहा है कि कुछ कहते नहीं बना। वापिस जा कर लैपटॉप लेकर आता हूँ।
घर से निकलने में ही दस मिनट हो गए हैं। सुबह हर मिनट के बढ़ने के साथ पर ट्रैफिक दुगना होता चलता है। सुबह का ट्रैफिक कभी वक्त पर कहीं पहुंचने नहीं देता। मेरी किस्मत अच्छी है कि बहुत ज्यादा ट्रैफिक नहीं है। घड़ी देखता हूं - सात पचपन। इसका मतलब अंजलि ने सुबह 6 बजे या उससे भी पहले की फ्लाइट ली होगी। लेकिन वे तो मेरठ रहती हैं। इसका मतलब कल रात से सफ़र में होंगी या रात को ही दिल्ली आ गयी होंगी।
मेरी फेसबुक फ्रेंड हैं अंजलि। उनसे पहली बार मिल रहा हूँ। उनकी तस्वीर भी नहीं देखी है। पहचानूंगा कैसे। सारा झगड़ा ही तो फेसबुक पर तस्वीर लगाने को हुआ था और इस चक्कर में हममें महीने भर से अबोला चल रहा था। जाने दो। वे खुद ही पहचानेंगी मुझे।
अभी एयरपोर्ट पहुंचने ही वाला हूं कि उनका मैसेज आ गया है- वेटिंग नीयर डीकोस्टा कॉफी शॉप। मैं मुस्कुाराता हूं। पहचानने की समस्या उन्हों ने खुद ही सुलझा दी है। गाड़ी धीरे-धीरे अराइवल गेट के पास बने कॉफी शॉप की तरफ ले जाता हूँ। दूर से ही नज़र आ गयी हैं। बेहद खूबसूरत। नीली टी-शर्ट और ब्लैक ट्राउज़र में। वे ही होंगी। उनके पास गाड़ी रोकता हूं। वे मुझे देखते ही हाथ हिलाती हैं। गाड़ी बंद करता हूँ और उनकी तरफ बढ़ता हूं।
वे तपाक से मेरी तरफ बढ़ती हैं। हंसते हुए कहती हैं - वाव, डैशिंग। और उन्होंने मुझे हौले से हग किया है। मैं मुस्कुराकर उनके दोनों हाथ दबाता हूं - वेलकम अंजलि। वे हंसते हुए मेरे हाथ देर तक थामे रहती हैं। मैं इस रस्म अदायगी के बाद उनका बैग डिकी में रखता हूँ और उनके लिए कार का दरवाजा खोलता हूं। वे बैठती हैं।
मैं गाड़ी स्टार्ट करते समय पूछता हूं - अंजलि, माय फेसबुक फ्रेंड नाउ टर्न्ड इन टू रीयल फ्रेंड। बतायेंगी, हम कहां जा रहे हैं?
वे मुस्कुराकर कहती हैं - हम सीधे दमन जा रहे हैं। मैं एतराज़ कहना चाहता हूँ कि कल एक मीटिंग है जिसमें मेरा रहना बेहद ज़रूरी है लेकिन कुछ नहीं कहता। मीटिंग्स रोज़ चलती रहती हैं। मीटिंग में मेरे न रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा। किसी भी मीटिंग से ज्यादा ज़रूरी तो फेसबुक फ्रेंड से एक्चुअल मीटिंग है। इस मीटिंग के बीच में कोई मीटिंग नहीं आनी चाहिये। जवाब में मैं मुस्कुरराता हूँ।
कहता हूँ- जैसी आज्ञा महाराज।
वे मुस्कुराती हैं - अच्छे बच्चे की तरह गाड़ी चलाइये।
जवाब में मैं मुस्कुराता हूँ। पूछता हूँ- अचानक इस तरह मुंबई में सुबह-सुबह। अगर मैं न मिलता या शहर में न होता तो आप क्या करतीं लेकिन वे मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं देतीं। वे गुनगुना रही हैं, बाहर का नज़ारा देख रही हैं या अपने मोबाइल से खेल रही हैं।
बात करने की नीयत से मैं पूछता हूँ- ब्रेकफास्ट लिया है?
वे बताती हैं- नहीं, सिर्फ कॉफी ली थी। ब्रेकफास्ट आपके साथ ही लेना है। हाइवे पर कहीं ढाबे पर करेंगे।
मैं पूछ ही लेता हूं - अचानक मुंबई आना और एयरपोर्ट से ही दमन की तरफ चल देना। कोई खास बात?
वे मुझे देखती हैं - कोई और बात करो। आप इस बारे में मुझसे कोई सवाल नहीं पूछेंगे। बस ये जान लीजिये कि इन तीन दिनों में आप मेरे मेहमान हैं और मेहमान ज्यादा सवाल पूछते अच्छे नहीं लगते।
मैं मुस्कुराता हूं। कुछ नहीं कहता। जानता हूं मेरे किसी भी सवाल का जवाब ऐसे ही मिलना है। मुझे भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। हम तीन दिन एक साथ हैं ही। खुद ही बतायेंगी। नहीं भी बतायें तो मुझे क्या। मेरे साथ एक बेहद खूबसूरत दोस्त हैं जो पहली बार मिल रही हैं और अपने साथ तीन दिन दमन जैसी खूबसूरत जगह पर बिताने का न्यौता दे रही हैं। सबसे बड़ा सच तो यही है जो सामने है।
हम विरार पार चुके हैं। साढ़े नौ बज रहे हैं। हाइवे का ट्रैफिक दोनों तरफ अपनी गति से चल रहा है।
तभी अंजलि ने मुझसे कहा है - मैं एक ऐसा काम करने जा रही हूं जो मेरे जैसी शरीफ लड़की को इस तरह से नहीं करना चाहिये। आप थोड़ी देर के लिए मेरी तरफ मत देखना और अपना सारा ध्यान ड्राइविंग पर लगाना। मैं इशारे से कुछ पूछना चाहता हूँ लेकिन वे बनावटी गुस्से में मेरी तरफ देखती हैं- मैं बहुत अन्कम्फर्टेबल महसूस कर रही हूं। कुछ चेंज करना है।
मैं फिर पूछना चाहता हूं, वे घुड़क देती हैं - कितने सवाल पूछते हैं आप। मैं सॉरी कहता हूं। अपना सारा ध्यान ड्राइविंग पर लगाता हूँ। मैं कपड़ों की सरसराहट महसूस कर रहा हूं। मैं चाहते हुए भी उनकी तरफ नहीं देखता।
दो तीन मिनट बाद मैं महसूस करता हूँ कि उनका बैग खुला है और कुछ रखकर बंद किया गया है। उनकी खिलखिलाहट सुनायी दी है - श्रीमानजी, अब आप इस तरफ देख सकते हैं। मैं इशारों ही इशारों में पूछता हूँ-क्या किया है। वे नकार देती हैं। मैं मुंह बिचकाता हूं- मत बताओ। थोड़ी देर बाद वे खुद ही बताती हैं – कुछ खास नहीं। सब ऑनलाइन शॉपिंग की करामात है। कल ही अंडरक्लोथ आये थे। चेक करने का मौका नहीं मिला। सुबह साढ़े तीन बजे तैयार हो कर घर से निकली थी और तब से सांस अटकी हुई थी। अब जा कर उससे मुक्ति पायी है तो जान में जान आयी है।
मैं हैरान होता हूं - तो अभी टी-शर्ट भी उतारी थी क्या?
वे मासूमियत से जवाब देती हैं - आप बुद्धू हैं, उसके बिना वो कैसे उतारती?
मैं बनावटी गुस्से से कहता हूं - कमाल करती हैं आप भी। हाइवेपर चलती गाड़ी में आगे की सीट पर बैठे हुए इस तरह से ड्रेस चेंज करना। आप कैसे कर पायीं?
वे हंसती हैं - वेरी सिंपल। पहली बात, आपसे पूछ के किया। दूसरे, हमारी गाड़ी इस समय कम से कम 100 की स्पींड से चल रही है। किसी गाड़ी ने हमें ओवरटेक नहीं किया और किसी ने नहीं देखा। तीसरे, सामने से जो गाड़ियां आ रही हैं, उनमें बैठे लोगों को सेकेंड का दसवाँ हिस्सा मिला होगा यह देखने के लिए कि मैंने अपनी टी-शर्ट उतारकर फिर पहनी है। वे गाड़ी वाले वापिस आ कर एक्शंन रिप्ले देखने से रहे। यहां मामला कब का निपट चुका है। यहाँ तक कि आप जो कि मेरे पास इतने नजदीक बैठे हैं, कहाँ देख पाए कि मैंने क्या किया है। मैं न बताती तो...।
मैं हैरान होता हूँ कि मेरठ जैसे परंपरागत शहर में रहने वाली अंजलि इतनी बोल्ड। हो सकती हैं। जानता हूँ मेरे अगले सवाल का जवाब भी दुधारी तलवार की तरह ही दिया जायेगा। बात खत्म हो जाने दे देता हूं।
तभी अंजलि ने मुझे गाड़ी किनारे करके रोकने के लिए कहा है। मैं इशारे से पूछता हूँ- क्या है अब।
वे झिड़कती हैं - कहा ना, गाड़ी रोकें। मैंने गाड़ी किनारे लगायी है। वे बाहर निकली हैं। मुझे भी बाहर आने के लिए कहा है। हम आमने सामने हैं। उन्होंने मुझे तपाक से गले लगाया है। मैं इस अचानक प्यार भरे हमले से घबरा गया हूं। समझ नहीं पा रहा हूँ ये क्या दीवानापन है। कुछ तो सोचें, कहाँ क्या कर रही हैं, कहां कर रही हैं और क्यों रही हैं। अजब पागलपन है इस महिला में। सारे अंदाज़ निराले।
वे तर्क देती हैं- इतनी तेजी से आती-जाती गाड़ियों में बैठे लोगों को क्या परवाह और किसकी परवाह कि कौन क्या कर रहा है। मेरा मन था कि जब हम मिलें, तपाक से गले मिल कर मिलें। एयरपोर्ट पर हो नहीं पाया तो यहीं सही। इस बार भी मेरे पास उनकी बात का कोई जवाब नहीं।
तभी वे ड्राइविंग सीट की तरफ बढ़ी हैं और मुझे पैसेंजर सीट पर बैठने का इशारा किया है- तो ये चाल थी मैडम की मुझ से ड्राइविंग सीट हथियाने की। वैसे ही कह दिया होता। मना थोड़े ही करता।
वे बहुत संयम से गाड़ी चला रही हैं। उन्होंने म्यूजिक ऑन किया है और फिर उसे एकदम धीमे करते हुए कहना शुरू किया है- मुझे पता है इस समय मुझे ले कर आपके मन में बहुत से सवाल जमा हो गए होंगे और आप डर भी रहे होंगे कि मैं आपके अगले सवाल का जवाब भी गोलमाल ही दूंगी। क्यों है ना ऐसा? पूछा है उन्होंने।
मैंने इतनी देर में पहली बार उनकी तरफ ध्यान से देखा है। वैसे भी ड्राइविंग करते समय साथ वाले को इतने ध्यान से देखने का मौका ही कहां मिल पाता है। बेहद खूबसूरत अंडाकार चेहरा। कंधे तक लहराते खुले बाल, कंधे एक दम तने हुए जो आत्म विश्वास से ही ऐसे हो सकते हैं। शानदार सुगठित देह जिसे बार-बार मुड़ कर देखने को जी चाहे।
सही कहा गया है कि महिलाएं पुरुषों की निगाहों के बारे में अतिरिक्त रूप से सजग होती हैं। सामने सड़क पर देखते हुए भी उन्होंहने इस तरह से मेरा देखना ताड़ लिया है। झट से पूछ भी लिया है -क्या देख रहे हैं इतनी देर से। आपकी नीयत तो ठीक है जनाब।
मैं इतनी देर में पहली बार खुल के हंसा हूं - मेरी नीयत को क्या होना जी। हम तो आपके मेहमान ठहरे। जो भी रूखा-सूखा मिलेगा, गुज़ारा कर लेंगे।
हंसी हैं अंजलि - बड़े आये रूखे सूखे खाने वाले। अब सबसे पहले तो कहीं नाश्ते का इंतज़ाम किया जाये। अभी उन्होंने कहा ही है कि दूसरी तरफ वाली सड़क पर कई बार एंड रेस्तपरां के बोर्ड नज़र आने शुरू हो गये हैं। वे खुश हो गयी हैं- लो जी बन गया आपका काम। रूखे सूखे खाने वाले जी। और उन्होंने गाड़ी यू टर्न करके एक अच्छे से बार एंड रेस्तरा के सामने खड़ी कर दी है और मुझे इशारा किया है- आइये मेहमान जी।
वे मेरा हाथ पकड़ कर अंदर जाने के लिए आगे बढ़ी हैं तो मैंने कहा है - ये बार है। रेस्तरा साथ वाला है। वे बिना कुछ बोले मुझे भीतर घसीट लायी हैं। वेटर के आते ही उन्होंने बिना मीनू कार्ड देखे स्ट्रांग बीयर का ऑर्डर दिया है और कहा है कि नाश्ते में कुछ भी जो भी एकदम गर्म और ताज़ा हो ले आओ। फटाफट। पहले एक बीयर लाना।
मैं अंजलि के चेहरे की तरफ देख रहा हूं। किस धरती की प्राणी हैं ये। कुछ तो नार्मल भी करें। इतने बरसों से पीते हुए मैंने कभी नाश्ते में बीयर नहीं पी और ये मेरठ की रानी तो मुझसे दस कदम आगे हैं। मैं उन्हें देख कर मुस्कुारा रहा हूं। उन्होंने बीयर का गिलास उठाया है और मुझे इशारा किया है -बीयर्स।
-सुनिये, वे जैसे मेहरबान हो गयी हैं -मैं आपको सारी बातें बताऊंगी। जैसे-जैसे प्रसंग आयेगा। अभी लखनऊ से आ रही हूं। मेरठ से कल आ गयी थी। एरिया लेवल की मीटिंग थी कल। आज सुबह की गोवा की फ्लाइट थी। एयरपोर्ट आकर पता चला कि गोवा की फ्लाइट कैंसिल हो गयी है। दूसरी फ्लाइट शाम को ही मिलेगी। मेरे पास तीन-चार च्वाइस थे। पहला कि टिकट कैंसिल कराके मेरठ वापिस जाती। दूसरी च्वाइस कि होटल वापस जाती, दोबारा चेक इन करती और शाम की फ्लाइट लेती। उसका कोई मतलब नहीं था क्योंकि गोवा में आज ही पूरे दिन हमारी कंपनी का एनुअल डे फंक्शन चल रहा है और शाम की फ्लाइट ले कर मैं डिनर के लिए मुश्किल से पहुंच पाती। तीसरी च्वाइस ये थी कि मैं कोई भी फ्लाइट ले कर किसी ऐसी जगह जाऊं मैं तीन दिन अपने तरीके से, अपने खर्चे पर और अपनी पसंद के किसी नये दोस्त के साथ गुज़ार सकूं। पता किया तो मुंबई फ्लाइट तैयार थी। मैंने यही ऑप्शन दिया और अब तुम्हारे सामने हूँ। वैसे मैं मुंबई होते हुए भी गोवा जा सकती थी। लेकिन तुमसे मिलना लिखा था मेरे हिस्से में तो तुम्हारे सामने हूं। अब इसमें मैं क्या करूं कि सारे दोस्तों में सिर्फ तुम्हारा ही नम्बर मेरे पास था। बाकी सब फेसबुक तक ही सीमित हैं।
-मुझे पता है समीर, मेरे  तौर तरीकों से और मेरे खुलेपन से तुम्हें अजीब लग रहा होगा और तकलीफ़ भी हो रही होगी लेकिन सच बताऊं, ज़िंदगी में पहली बार, शायद पहली बार अपनी तरह से अपने तरीके से ये तीन दिन गुजारने वाली हूँ इसलिए ज़रूरी लगा कि इस सब की शुरुआत ऐसे तरीके से करूँ कि वापिस मुड़ कर देखने की, याद करने की ज़रूरत न पड़े और कोई अफसोस भी न रहे।
-एक बात तुमसे और शेयर करती हूं और तुम्हें  यह जान कर खुशी होगी समीर कि लगातार तीसरे बरस का कंपनी का बेस्ट परफॉर्मर का एवार्ड तुम्हारी इस मित्र अंजलि को ही मिला है और मैं यह एवार्ड लेने ही गोवा जा रही थी। हंसी आर ही है, पैसे मिलते गोवा में और मैं खर्च कर रही हूँ दमन में। बस एक ही बात है, बेशक समंदर वहां भी होता, तुम न होते।
अचानक अंजलि रुकी हैं -और फिर तुमसे अपने खराब व्यहवहार के लिए माफी भी तो मांगनी थी।
-किस बात की माफी? मैं हैरान होता हूं।
-जिस बात के लिए हमारा अबोला हुआ था। फेसबुक पर प्रोफाइल पिक्चर को ले कर।
-अरे वो तो मैं कब का भूल चुका।
-लेकिन मैं कैसे भूलती। बहुत खराब लग रहा था कि मैंने ये क्या कर डाला है लेकिन कोई तरीका नहीं मिल रहा था पैचअप का। आज जब मुंबई की फ्लाइट का मौका मिला तो मुझे लगा ये सही मौका है।
मैं सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया हूं। मामूली सी बात थी। फेसबुक पर वैसे भी किसी पोस्ट की उम्र कुछ घंटे होती है और किसी मुद्दे की उम्र बहुत हुआ तो दो दिन। बात इतनी सी थी कि एक महीना पहले मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था कि आज एक दुर्घटना जैसी हो गयी। रोज़ाना पाँच-सात मैत्री अनुरोध आते हैं। कई बार तो नर और नारी का ही पता नहीं चल पाता। तस्वीर की जगह फूल पत्ती, भगवान या पाकिस्तानी नायिकाएं। कुछ लोग हंसिका मोटवानी की तस्वीर लगा कर उस पर अहसान कर देते हैं। ये मैत्री प्रस्ताव किसी पार्टी के बैनर वाला था। बिना जांच पड़ताल के दोस्त बनाने के दिन लद गये। उनसे पहचान के लिए पूछा तो उन्होंने ताना मारा कि आपकी फ्रेंड लिस्ट में कई ऐसे लोग शामिल हैं जिन्होंने अपनी तस्वीर नहीं लगा रखी है तो हमीं पे ये शर्त क्यों। बात सही थी।
आगे लिखा था मैंने कि तब पहला काम यही किया कि बिना प्रोफाइल पिक्चर के कई दोस्त विदा किये। इस अभियान में परिचित लेकिन फूल पत्ती लगाये कई दोस्त शहीद हो गए। अभी ये काम बाकी है। वे दोस्त बेशक फेसबुक से विदा हुए, मेरे जीवन में बने रहेंगे।
इसी चक्कर में मैंने अंजलि को भी अनफ्रेंड कर दिया था। बेशक सिर्फ उन्हीं के इनबॉक्स में लिखा था कि आपके गुलाब के फूल को भी मेरी सूची से हटना पड़ना रहा है ताकि कोई मुझे ये न कहे कि अनफ्रेंड करने में भी भेदभाव बरता है। लिखा था मैंने कि आप मेरी दोस्त थीं, हैं और बनी रहेंगी। अब तक वे मेरी बेहतरीन फेसबुक फ्रेंड थी। बेशक हमने कभी एक दूसरे के बारे में न तो ज्यादा जानने और न ही बताने की ज़रूरत ही नहीं समझी थी। इतने दिनों में मैंने कभी नहीं पूछा कि वे किस कंपनी में हैं और क्या काम करती हैं।
हम बरस भर से फेसबुक मित्र थे और अक्सर चैट करते रहते थे और एक दूसरे के सुख दुःख के बारे में पूछते रहते थे। हम जब भी बात करते थे, दुनिया जहान की बात करते थे। मेरी पोस्ट अंजलि बहुत ध्यान से पढ़ती थीं और उस पर अक्सर चलने वाली बहसों में हिस्सा लेती थीं। हम दोनों ने कभी मोबाइल नम्बर एक्सचेंज नहीं किये थे। इस मुद्दे के बाद पता नहीं कहां से उन्होंने मेरा मोबाइल नम्बंर खोजा था और मेरी अच्छी खासी लानत मलामत कर दी थी। मेरी एक नहीं सुनी थी और दोबारा भेजी गयी मेरी फ्रेंडशिप की रिक्वेरस्ट को भी ठुकरा दिया था। फोन करने पर काट  दिया था।
सारा मामला वहीं खत्म। हो गया था। मैंने एक अच्छी दोस्त को खो दिया था। सम्पर्क का कोई ज़रिया नहीं रह गया था। धीरे धीरे मैं उनके बारे में भूल भी चुका था। और अब वे ही दोस्त न केवल मेरे सामने बैठी हैं बल्कि उस बात की भरपाई करने के लिए इतना शानदार न्यौता ले कर आयी हैं।
नाश्ता करने के बाद जब हम बाहर निकले हैं तो हमें फिर से यू टर्न ले कर गुजरात की तरफ जाने वाली सड़क पर जाना है। पूछ ही लिया है उन्होंने कि ऐसा क्योंं है कि सारे बार सड़क के इस तरफ ही हैं।
मैंने बताया है- बहुत आसान सी बात है। ये सड़क गुजरात की तरफ से आ रही है। गुजरात ड्राइ स्टेट है। वहां से आने वाली गाड़ियों के ड्राइवर और पैसेंजर जैसे सदियों से प्यासे होते हैं। ये सब इंतज़ाम उन प्यासों की ज़रूरत के लिए है और हमारी तरफ वाली सड़क चूंकि गुजरात जा रही है तो ड्राइ स्टेट में पी कर जाने का रिस्क लेने वाले कम होते हैं इसलिए इस तरफ बार भी नहीं हैं।
अंजलि ने सलाम में हाथ उठाया है- मान गये उस्ताद। बलिहारी है पीने वालों की।
गाड़ी अंजलि ही चला रही हैं। मैं अचानक सोच पड़ गया हूं। अंजलि की तरफ देख रहा हूं। लगातार तनाव में हूँ। मेरे साथ एक युवा, बिंदास और अपनी तरह से भरपूर ज़िंदगी जीने वाली महिला हैं जो तीन दिन की छुट्टी मनाने के लिए अपने साथ मुझे ले कर आयी हैं। हम बेशक फेसबुक पर एक दूसरे को जानते रहे हैं लेकिन आज अचानक पहली बार मिल रही हैं। महीने भर से चल रहे अबोले को खत्म  करने चली आयी है। समझ नहीं आ रहा है कि अंजलि ने क्या सोचकर अपनी इस यादगार ट्रिप के लिए मुझे चुना है। तीन घंटे पहले तय किया और बिना सोचे समझे चली आयीं। मैं न मिलता या मुंबई में ही न होता तो। ये तो और वो तो.........। तो.........। एक साथ तीन दिन और तीन रात रहना। जब नाश्ता ही बीयर से हो रहा है तो दमन में तो वक्त-बेवक्त चलेगी। पता नहीं अंजलि जी के मन में क्या हो।
हम नानी दमन पहुंच गये हैं। कई बरस के बाद आ रहा हूं तो पता नहीं इस बीच कौन-कौन से नये होटल खुल गये हैं। चेक करने के लिए मोबाइल निकालता हूं लेकिन अंजलि जैसे अपनी ही धुन में कार चला रही हैं। कुछ ही देर में हम जजीरा होटल की लॉबी में हैं।
कार वेलेट पार्किंग के हवाले करके हम रिसेप्शन पर आये हैं। अंजलि ने मुझे बैठने के इशारा किया है।
पूछा है मैंने - इस होटल के बारे में कैसे पता था? पहले कभी आयी हैं?
-जी नहीं, हम आज यहां पहली बार आये हैं और तुमसे मिलने के बाद तुम्हारी कार में बैठे हुए ही मैंने ऑनलाइन बुकिंग की थी। मैंने राहत की सांस ली है। अंजलि की पसंद और सिस्टम से काम करने के लिए उनकी तरफ तारीफ भरी निगाह से देखता हूं।
कमरे में ही जाकर पता चला है कि अंजलि ने कमरा बुक कराके डीलक्स सुइट बुक कराया है। रूम सर्विस स्टाफ के जाते ही अंजलि में फिर से मुझे हग किया है और मेरे गाल चुटकियों में भरते हुए कहा है - ये पोर्शन मेरा और मास्टर बेडरूम आपका ताकि हम पास रहते हुए भी दूर रहें और दूर रहते हुए भी पास रहें।
मैं भोलेपन से पूछता हूं - जरा समझायेंगी इस दूर पास का मतलब?
-सिंपल। अगर तुम कमज़ोर पड़ गये तो मैं तुम्हें संभालूंगी और कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगी और अगर कहीं मैं कमज़ोर पड़ गयी तो तुम मुझे संभाल लेना।
तभी मैंने अंजलि को दोनों कंधों से थामा है और उनकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा है- और अगर हम दोनों ही कमज़ोर पड़ गये तो?
अंजलि ने जवाब में मेरे कंधे दबाये हैं - मर्द हो ना, कमज़ोर होने की ही बात करोगे। ये क्यों नहीं कहते कि हम दोनों ही मज़बूत बने रहे तो कितनी बड़ी बात होगी। वे मेरा हाथ थामे मुझे सोफे तक लायी हैं। हम बैठ गये हैं। मेरे हाथ अभी भी उनके हाथों में हैं। वे मेरी आंखों में आंखें डाल कर कह रही हैं- समीर, मैं यहां कमज़ोर हो कर या कमज़ोर होने नहीं आयी हूं। मेरी पूरी फ्रेंडलिस्टक में अकेले तुम्हीं रहे जिसने कभी भी कोई लिमिट क्रास नहीं की वरना इस प्लेटफार्म पर ऐसे लोग भी भरे पड़े हैं जिनका बस चले तो फेसबुक पर ही पहले अपने और फिर सामने वाले के कपड़े उतारने में एक मिनट की देरी न करें। वे रुकी हैं। मैं उनके चेहरे की तरफ देख रहा हूं।
कहता हूं - कहती चलें।
वे आगे कह रही हैं- बस मुझे और कुछ नहीं कहना। आओ देखें खिड़की से समंदर का नज़ारा कैसा दिखता है। हमें आये हुए इतनी देर हो गयी और अब तक हमने समंदर से मुलाकात नहीं की।
तभी दरवाजे पर नॉक हुई है। दरवाजा खोलता हूं। तीन वेटर हैं। ढेर सारा सामान लिये। फ्रूट, बिस्किट, चॉकलेट्स, कुकीज और दो वाइन बॉटल्स। एक आइस बकेट में और एक रूम टेम्परेचर पर। होटल की तरफ से कम्पिलीमेंटरी। बॉटल्स देखते ही अंजलि ने मुझे आँख मारी है।
हम दोनों कमरा देखते हैं। दो तरफ की दीवार पर पूरी खिड़की है। सामने हरहराता समंदर देख कर अंजलि की खुशी के मारे उनकी चीख निकल गयी है। सामने ठाठें मारता अनंत जल विस्तारर है। होटल के गार्डन की दीवार से टकराती ऊंची ऊंची लहरें। हाइ टाइड होना चाहिये। अंजलि ने एक बार फिर मुझे अपने से सटा लिया है - हम कितने सही वक्ते पर आये हैं ना। हाइ टाइड हमारी अगवानी कर रही है -लेट्स सेलिब्रेट।
और बिना एक पल भी गंवाये वे वाइन के गिलास भर लायी हैं।
वे खिड़की के सामने से एक पल के लिए भी नहीं हटना चाहतीं। समंदर को इतना पास और इतना खुश देख कर छोटी बच्ची बन गयी हैं। फटाफट वाइन खत्म की है। अब वे हड़बड़ाने लगी हैं –चलो, चलो जल्दी  करो। अब नीचे चलते हैं। बाकी बातें बाद में।
वे पूछ रही हैं -स्विमिंग कॉस्टयूम लाये हैं ना?
मैं झल्लाता हूं  -अंजलि जी, कपड़े रखने के लिए कहते समय आपने कहां कहा था कि हम कहां जा रहे हैं। लेकिन डोंट वरी। आप वाशरूम में जा कर चेंज करो। मैं हंसता हूं - मर्दों के लिए स्विंमिंग कॉस्टयूम कहां होते हैं।
वे अपना कास्ट्यूम पहन कर उस पर बाथरोब डाल कर तैयार हैं। वे छोटी बच्ची। जैसी चपल हो रही हैं समंदर से मिलने जाने के लिए।
अंजलि ने बहुत एन्जाय किया है। दो घंटे हो गये हैं, पानी से बाहर आने का उनका मन ही नहीं है। उजला फेनिल जल जब वापिस लौटने लगा है तब भी वे वहीं रहना चाहती हैं। मेरा हाथ थाम कर वे पानी से खूब अठखेलियां कर रही हैं। मेरे लिए भी आज का अनुभव एकदम नया और दिल के बेहद करीब है। हम दोनों पानी में जितनी मस्ती रहे हैं, लगता ही नहीं कि हम आज चार घंटे पहले ही ज़िंदगी में पहली बार मिले हैं।
हमने तय किया है कि खाना भी वहीं समंदर के किनारे गार्डन में ही खा लेंगे। नहाने की बाद में सोची जायेगी। बस एक बार दोनों ही फ्रेश वाटर का शावर ले कर आ गये  हैं। हम दोनों अभी भी बाथ रोब में ही हैं। बाथरूम में शावर ले कर आते समय अंजलि बेहद खुश लग रही हैं। उनका चेहरा धूप से, नमकीन पानी की दमक से और यहां आने की, समंदर में नहाने की खुशी के मिले-जुले असर से इंद्रधनुष हो रहा है। इस बार मैं पहल करता हूं और दिन दहाड़े, सबके सामने और अरब महासागर को साक्षी बनाते हुए उन्हें गले से लगा लिया है मैंने। उनके गाल चूम लिये हैं। मन को तसल्ली दे लेता हूं कि इतने भर से हम दोनों कमज़ोर नहीं हो जायेंगे। वे इतरायी हैं। मेरी छाती पर मुक्का मारते हुए बोली हैं- यू नॉटी बाय।
लंच में अंजलि ने फिर से बीयर का ऑर्डर दिया है। जानता हूं, जब तक यहां हूं, पीने और समंदर से मुलाकातें करने का कोई हिसाब नहीं रखा जायेगा।
जब हम कमरे में आये हैं तो दोपहर के चार बजे हैं। बाथ लेने और चेंज करने के बाद मैं अंजलि से कहता हूं कि वे बेडरूम में सो जायें। इससे पहले कि वे अपना इरादा मुझ पर लादें, मैं पहले वाले रूम में सोफा कम बेड पर पसर गया हूं। लेकिन अंजलि ने मेरी एक नहीं मानी है और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बेडरूम में ले आयी हैं और बिस्तर पर धकेल दिया है- मिस्टर गेस्ट, ये आपके लिए है। मैं बाहर लेट रही हूं। और वे बाहर वाले कमरे में चली  गयी हैं।
अचानक कुछ सरसराहट से मेरी नींद खुली है। देखता हूं अंजलि डबल बेड पर एकदम मेरे पास अधलेटी लैपटॉप में तस्वीरें देख रही हैं। कमरे में बत्तियां जल रही हैं।
टाइम देखता हूं -आठ बजे हैं।
मैं उठ बैठता हूं - तो इसका मतलब मैं चार घंटे तक सोता ही रहा। मुझे जागा देख कर अंजलि मुस्कुरायी हैं और मेरे हाथ पर हाथ रख कर बेहद प्यार से पूछती हैं - चाय या कॉफी? यहीं बनाऊं या रूम सर्विस से मंगाऊं?
-आपको कौन सी पसंद है? मैं पूछता हूं।
-देखो समीर, ये हो क्या रहा है। मैं सुबह से तुम्हें  तुम कह रही हूं और तुम आप आप की रट लगाये हुए हो। हम इतने फार्मल नहीं रहे हैं दोस्त। मुझे नाम से पुकारो। अच्छा लगेगा।
मैं अचकचाया हूं – नहीं, वो क्या है अंजलि कि आपकी पर्सनैलिटी के साथ तुम शब्द फिट ही नहीं हो रहा। सुबह से कहना चाह रहा हूं लेकिन हरबार ज़बान तक आते-आते तुम अपने आप आप में बदल जाता है।
-ओके नो प्रॉब्लम। हम तुम्हारी मदद करते हैं। उन्होंने मेरा हाथ थामा है और कह रही हैं, मेरे साथ-साथ बोलो - अंजलि, चाय की तलब लगी है, चाय पिलाओ ना।
मैं हंसता हूं। अंजलि को छू कर पूछता हूं - अंजलि, तेरी चाय पीने की इच्छा है क्या बोल, कौन-सी वाली पीयेगी। और ये कहते हुए मैं सचमुच चाय बनाने के लिए उठ खड़ा हुआ हूं।
मेरी इस हरकत से अंजलि बहुत खुश हो गयी हैं- चल समीर, आज की पहली चाय तेरी पसंद की।
अंजलि अभी भी लैपटॉप में उलझी हैं। अपनी चाय ले कर मैं भी अंजलि के पास सरक आया हूं और तस्वीरें देखने लगा हूं। वे पिकासा में तस्वीरें देख रही हैं। स्लाइड शो चल रहा है। वे लैपटॉप मेरी तरफ मोड़ देती हैं। तस्वीरें कुछ जानी पहचानी लग रही हैं। ध्यान से देखता हूं- अरे ये तो मेरी ही तस्वीरें हैं। अब मैं लैपटॉप को ध्यान से देखता हूं। ये मेरा ही तो लैपटॉप है।
अंजलि हंसती हैं- समीर, मैं 6 बजे ही जाग गयी थी। तुम गहरी नींद में थे। कुछ सूझा ही नहीं कि क्या करूं। पहले खिड़की के पास खड़ी रही। समंदर लो टाइड के कारण बहुत पीछे चल गया था। अच्छा नहीं लगा। फिर याद आया कि तुम्हें लैपटॉप लाने के लिए कहा था। बाकी सामान के साथ लैपटॉप भी कमरे में आ गया था। खोला तो पासवर्ड नहीं था।
-हम्म, अकेले रहने वाले किसके लिए पासवर्ड रखेंगे। कौन से मुझे इस लैपटॉप से स्विस बैंक के खाते मैनेज करने हैं।
- हां ये तो है। मैंने इस बीच तुम्हारे म्यूंजिक का, फिल्मों का और पिक्चर्स का सारा कलेक्शन देख लिया। म्यूजिक का कलेक्शन तुम्हारा बहुत अच्छा है। मैंने मार्क कर लिया है कि कौन-कौन सा लेना है। कुछ फिल्में भी। बेशक देखने सुनने का समय न मिल पाये लेकिन अहसास रहेगा कि तुमसे लिया है और मेरे पास है। ये कहते हुए अंजलि ने अपने पास ही मेरे लिए दो तीन तकिये रख दिये हैं। आओ समीर, अब जरा बताते चलो अपनी कहानी तस्वीरों की ज़ुबानी।
मैं भी बेड की टेक लगा कर लैपटॉप के सामने हो गया हूं। हम दोनों बेहद नज़दीक हैं। इतने कि एक दूसरे की सांसों की आवाज़ तक सुनायी दे। उनके खुले बालों से तो महक आ ही रही है, उनके बदन से उठती खुशबू की अनदेखी नहीं कर सकता। किसी तरह खुद पर कंट्रोल करके हर तस्वीर के बारे में उन्हें बता रहा हूं। एक अच्छी बात ये हो गयी है कि उन्होंने लगभग सारी तस्वीरें पहले से देख रखी हैं। पिकासा में हर फोल्डर पर नाम लिखा है और फोटो लेने या सेव करने का महीना और वर्ष लिखा है।
वे पूरी लगन से तस्वीरों में खोयी हुई हैं और मुझे उनके बदन की नज़दीकी परेशान कर रही है। अधलेटे होने की वजह से उनके कपड़े अस्त व्यस्त हो रहे हैं जिनके कारण खुद पर कंट्रोल करना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है। मेरी कोई भी हरकत इस बेहतरीन रिश्ते को खत्म  कर सकती है। मेरी ज़रा-सी जल्दबाजी मेरी सारी इज्जत मिट्टी में मिला देगी। नहीं, कमज़ोर नहीं पड़ना है। उठ कर पानी पीता हूं। बाथरूम जाता हूं। हाथ मुंह धो कर कुछ हालत संभली है। घड़ी देखता हूं। पौने दस।
अंजलि से कहता हूं - क्या ख्याल है अंजलि, काफी आराम कर लिया है हमने। नीचे चलें क्या?
-हां चलते हैं। बस एक मिनट।
क्रमश: ...


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Akshaya Gaurav

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