भारत में आदिकाल से ही 'ज्ञान' की महत्ता को स्वीकार किया गया है एवं शिक्षा की सतत् प्रक्रिया हेतु प्रयास होते रहे हैं। शिक्षा वह प्रकाश है, जिसके द्वारा मानव की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता है। प्राचीन भारतीय समाज में शिक्षा का स्वरूप अनौपचारिक था व सर्वसामान्य के लिये सुलभ नहीं था, परन्तु वर्तमान समाज में शिक्षा एक पृथक व विशेषीकृत औपचारिक प्रक्रिया है जिसके लिये विभिन्न प्रकार की औपचारिक संस्थाओं का प्रावधान है। जहां एक ओर कुछ अनौपचारिक संस्थाये यथा परिवार, समुदाय, राज्य व धार्मिक संस्थाएं इत्यादि हैं जो शिक्षार्थी को अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा देती हैं, वहीं औपचारिक संस्थाएं आयोजित शिक्षा प्रदान करती हैं जैसे-पुस्तकालय, वाचनालय, जनसंचार संस्थायें इत्यादि। इसमें सर्वप्रमुख व सर्वमान्य स्थान 'विद्यालय' का है। विद्यालय समाज का मस्तिष्क है, विद्यालय एक ऐसी संस्था है जिसे मानव ने इस उद्देश्य से स्थापित किया है कि समाज में ऐसे योग्य सदस्य तैयार करने में सहायता मिले, जो समाज के विकास में सहायक हों। समाज तथा राष्ट्र के विकास में विद्यालयों का महत्वपूर्ण योगदान है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि 'किसी भी राष्ट्र की प्रगति का निर्णय विधानसभाओं, न्यायालयों एवं कारखानों में नहीं वरन् विद्यालयों में होता है।' विद्यालय ही वह स्थान है जहां विद्यार्थी के समाजिक, मानसिक, शारीरिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास की परिवार द्वारा रखी गयी आधार शिला को सुदृढ़ किया जाता है। विद्यालय केवल भवन नहीं वरन् ज्ञान, कला, विज्ञान और संस्कृति के गतिशील केन्द्र है जो शिक्षार्थी के जीवन में शक्ति का संचार कर उसके व्यक्तित्व को परिस्कृत करते हैं एवं उसकी जन्मजात शक्तियों के प्रस्फुटन के लिये उपयुक्त वातावरण प्रदान करते हैं। विद्यालयी वातावरण का प्रत्येक पक्ष शिक्षार्थी पर अपना प्रभाव डालता है। विद्यालय भवन, विद्यालय का सामाजिक वातावरण, शैक्षिक उपकरण, शिक्षक का व्यक्तित्व एवं व्यवहार, भौतिक सुविधायें सभी शैक्षिक गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। विद्यालय के इन सभी घटकों के मध्य संयोजन व समन्वय होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है साथ ही विद्यार्थियों के सर्वांगीर्ण विकास के लिए विद्यालय के प्रत्येक घटक के मध्य परस्पर उचित तालमेल होना भी आवश्यक है एवं सम्पूर्ण विद्यालयी व्यवस्था के संचालक के रूप में इस क्रिया में महत्वपूर्ण योगदान विद्यालय के प्रधानाचार्य का होता है।
किसी देश की शिक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था के लिये प्रशासकीय एवं प्रबन्धकीय व्यवस्था पूर्णरूपेण उत्तरदायी है। यही कारण है कि भारत में शिक्षा की प्रबन्धकीय व्यवस्था की ओर विशेष प्रयास किये जाते रहे हैं। शैक्षिक प्रबन्धन एक अदृश्य कौशल है जो सर्वोत्कृष्ट परिणामों से स्पष्ट होता है। सम्प्रत्यात्मक रूप से ‘कौशल’ शब्द से तात्पर्य किसी विशिष्ट कार्य को सफलतापूर्वक पूर्ण करने की योग्यता से है। यह एक अर्जित या सीखी हुई योग्यता है जो ज्ञान को कार्य के रूप में रूपान्तरित करती है। मनुष्य के जीवन में शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। और शिक्षा प्रक्रिया की सफलता उत्तम प्रबन्धन पर निर्भर करती है क्योंकि यही प्रबन्धन निरंकुश होता है तो शिक्षा की प्रक्रिया में अनेकों रूकावटें उत्पन्न होगीं, प्रबन्धन यदि अधिनायकवादी है तो एक ही व्यक्ति अथवा संस्था का वर्चस्व होगा और यदि मुक्त है तो अराजकता का साम्राज्य होगा अतः स्पष्ट है कि शिक्षा संस्थाओं की सफलता इस बात पर अवलंबित है कि उसका प्रबन्धन किस प्रकार का है अत:एव विद्यालयी संस्था के संचालन एवं संस्थागत निष्पादन को सुनिश्चित करने हेतु उत्तम शैक्षिक प्रबन्धन का होना नितांत आवश्यक है। इस सम्बन्ध में ओलिवर शेल्डन ने कहा है कि- ‘प्रबन्धन उद्योग (विद्यालय एवं शिक्षा) की वह जीवनदायिनी शक्ति है जो संगठन को शक्ति देता है, संचालित करता है और नियंत्रित करता है।’
प्रत्येक प्रकार के विद्यालयों में शैक्षिक-प्रशासन का उत्तरदायित्व मुख्य रूप से विद्यालय प्रधानाचार्य का ही होता है। औपचारिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य न केवल प्रशासक के रूप में वरन शिक्षक तथा शिक्षार्थियों के प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक, विद्यालयी व्यवस्था का पर्यवेक्षक, नीतियों का निर्धारक, क्रियान्वयनकर्ता एवं मूल्यांकनकर्त्ता भी होता है। विद्यालय की प्रगति एवं समाज में विद्यालय की प्रतिष्ठा का निर्माण मुख्य रूप से प्रधानाचार्य से ही सम्बन्ध रखता है। विद्यालय-प्रधानाचार्य शिक्षा सम्बन्धी नीतियों एवं व्यावहारिक शैक्षिक उपलब्धियों के मध्य सेतु का कार्य करता है। विद्यालय के प्रत्येक कार्य में विद्यालय प्रधानाचार्य का निर्देश होता है एवं विद्यालय के दैनिक कार्य-व्यवहार, प्रशासनिक एवं शैक्षिक नीतियों का निर्माण एवं क्रियान्वयन प्रत्यक्ष रूप से विद्यालय प्रधानाचार्य पर निर्भर करता है। विद्यालयों के दोनो प्रमुख घटकों शिक्षक तथा शिक्षार्थी के लिये प्रधानाचार्य मार्गदर्शक का कार्य करता है जो उसके सिद्धान्तों एवं कार्य व्यवहार द्वारा स्वतः ही क्रियान्वित होता है। विद्यालय की शैक्षिक उपलब्धि का दायित्व मुख्य रूप से प्रधानाचार्य पर ही हेाता है। विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिये पाठ्य विधियों का निर्धारण, अनुशासन व्यवस्था, पाठ्य सहगामी क्रियाओं की रूप रेखा एवं संचालन की दृष्टि से भी विद्यालय के प्रदर्शन व उपलब्धि में प्रधानाचार्य ही सर्वप्रमुख व्यवस्था है।
यह व्यापक स्तर पर अनुभूत तथ्य है कि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता के स्तरोन्नयन द्वारा देश, समाज तथा समग्र मानव जाति के लिये सुयोग्य, सच्चरित्र, निष्ठावान एवं उपयोगी विश्व-नागरिकों का निर्माण सुनिश्चित करने में प्रधानाचार्यां की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ग्रामीण तथा नगर क्षेत्र की शिक्षा संस्थाओं की कार्य प्रणाली तथा उनमें से शिक्षा प्राप्त छात्र-छात्राओं की कार्य क्षमता, व्यावहारिक कौशल एवं अभिव्यक्तियों आदि का सूक्ष्म अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे ही संस्थाएं सफल विद्यालय कहलाने योग्य हैं, जिन्हें कार्य नियोजन, विद्यालय प्रबन्धन, मार्गदर्शन तथा नेतृत्व के कौशलों में प्रवीणता प्राप्त है। विद्यालय की कार्यकुशलता, व्यवस्था एवं श्रेष्ठता, प्रधानाचार्य की व्यक्तिगत योग्यता, कौशल एवं व्यवसायिक निपुणता पर निर्भर करती है। वास्तव में वह विद्यालय का केन्द्र बिन्दु है। जिस प्रकार बिना योग्य कप्तान के जहाज का अपने गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल है उसी प्रकार योग्य प्रधानाचार्य के बिना विद्यालय का अपने शैक्षिक तथा अन्य कार्यक्रमों में सफल होना असम्भव है। एक शैक्षिक प्रशासक के रूप में विद्यालय प्रधानाचार्य को अपनी संस्था के भविष्य की दिशा को परिभाषित करना होता है इस प्रकार यह भविष्यवाणी नहीं करता है बल्कि वर्तमान की वस्तुओं के आवरण को हटाकर यह सुनिश्चित करता है कि संगठन का एक भविष्य है अतः एक प्रधानाचार्य के पास भविष्य की वातावरणीय संस्थितियां जो कि संगठन को प्रभावित कर सकती हैं, के सम्बन्ध में अनुमान लगाने की योग्यता होनी चाहिये। निष्पादन मानकों के रूप में संगठनात्मक उद्देश्यों की व्याख्या एवं इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये उपयुक्त रणनीतियों का चयन, नियोजन कौशलों के सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं।
विद्यालय जैसे संगठन में सामन्जस्यपूर्ण वातावरण, संगठनात्मक नीतियों पर निर्भर करता है। संगठन की नीतियाँ स्पष्ट हैं, उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक हैं, कार्य सम्बन्धी निर्देश स्पष्ट रूप से दिये गये हैं तो संगठन कार्य में सहजता बनी रहती है तथा वातावरण को भी शान्त तथा संतुलित बनाने में सहायक होती है। नीतियाँ दुविधापूर्ण तथा अस्पष्ट है तो सहज सामंजस्यपूर्ण वातावरण बनाना कठिन हो जाता है। संगठन-प्रबन्ध कुछ मूल्यों पर आधारित होता है। प्रबन्धन-मूल्य व्यक्ति को प्रधानता देते हैं या कार्य को, सहयोग वातावरण को या कठोर नियंत्रण को, स्वतन्त्रता के सिद्धांत पर आधारित है या कठोर अनुशासन व नियम पालन के सिद्धांत पर, यह सभी मूल्य संगठन के वातावरण को सुनिश्चित करते हैं। संगठन कौशल, नियोजन कौशलों का ही अनुसरण करते हैं जहां नियोजन कौशल यह स्पष्ट करते हैं कि क्या और कब किया जाना है वहीं संगठन यह निर्धारित करता है कि कौन क्या करेगा और इसे कैसे प्राप्त किया जायेगा।  संगठन करना लोगों के बीच प्रभावपूर्ण व्यवहारात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार स्थापित करना है, ताकि वे साथ-साथ सक्षमतापूर्वक कार्य कर सकें तथा दी गयी वातावरणीय परिस्थितियों में किसी लक्ष्य या उद्देश्य की प्राप्ति के लिये किये गये निश्चित कार्यों के द्वारा व्यक्तिगत संतुष्टि प्राप्त कर सकें। प्रधानाचार्य को संगठन में अधिकार और कत्र्तव्यों के मध्य सम्बन्धों को पहचानने एवं स्पष्ट करने वाला होना चाहिये।
कार्मिक, उनके कार्य और कार्यात्मक सम्बन्धों का एक एकीकृत नेटवर्क ही अन्तिम रूप से संगठन की संरचना का निर्माण करता है अतः प्रधानाचार्य में विभिन्न संगठनात्मक कार्यां का विश्लेषण एवं व्याख्या करने की योग्यता होनी चाहिये एवं प्रशासक का एक महत्वपूर्ण दायित्व यह भी है कि वह संगठन के उद्देश्यों के अनुरूप संगठन में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों की शक्ति को इस प्रकार संयोजित करें कि प्रभावपूर्ण तरीके से उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकें।

सहायक संदर्भ सूची:

1. कुमार, अमित तथा अर्चना अग्रवाल (2012), राजकीय तथा निजी माध्यमिक विद्यालयों में      प्रधानाचार्यों के प्रबन्धन कौशलों का तुलनात्मक अध्ययन, भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध प्रत्रिका, अंक-22, संख्या-2, जून 2012, बस्ती: सरयूपार सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, पृ. 126-130।
2. अग्रवाल, श्वेता (2012), अनुदानित एवं गैर अनुदानित उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के संगठनात्मक वातावरण का शिक्षकों की शिक्षण प्रभावशीलता पर अध्ययन, शिक्षा चिंतन (शैक्षिक त्रैमासिक शोध पत्रिका), नोएडा, न0-44 वर्ष-11, अक्टूबर-दिसम्बर 2012।
3. कुमार, अमित तथा अर्चना अग्रवाल (2012), प्रभावी विद्यालय प्रबन्धन हेतु प्रधानाचार्य में अपेक्षित कौशल, परिप्रेक्ष्य, वर्ष-19, अंक-1, अपे्रल-2012, नई दिल्ली: न्यूपा, पृ. 19-28।


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क - 4  मुरारी पुकुर लेन,कोलकाता-700067, ई-मेल- anandpcdas@gmail.com, 7003871776, 9804551685


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Akshaya Gaurav

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