सिनेमा आधुनिक युग की सर्वाधिक लोकप्रिय कला है। सिनेमा विज्ञान की अद्‌भुत देन है। सिनेमा का प्रयोग दैनिक जीवन में मनोरंजन के रूप में किया जाता है। सिनेमा का हमारे जीवन से घनिष्ट सम्बन्ध है। सिनेमा का विश्व भर में खुब प्रचार-प्रसार हुआ है। दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में फिल्में बन रही हैं। भारत में भी लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में फिल्में बनती हैं। इनमें भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी में बनी फिल्मों का सबसे अधिक बोलबाला रहता है। हिन्दी सिनेमा को 'बॉलीवुड' के नाम से भी जाना जाता है।'बॉलीवुड' नाम अंग्रेज़ी सिनेमा उद्योग 'हॉलिवुड'' के तर्ज़ पर रखा गया है क्यों कि हिन्दी सिनेमा भी हिन्दी भाषा में फ़िल्म बनाने का उद्योग बन गया है। हिन्दी फ़िल्म उद्योग भारत की व्यवसायिक राजधानी मुंबई में बसा है जो मायानगरी के नाम से भी प्रसिद्ध है।
फिल्मों के निर्माण में अनेक प्रकार के वैज्ञानिक यंत्रों का प्रयोग होता है। शक्तिशाली कैमरे, स्टूडियो, कंप्यूटर, संगीत के उपकरणों आदि के मेल से फिल्मों का निर्माण होता है। इसे पूर्णता प्रदान करने में तकनीकी-विशेषज्ञों, साज-सज्जा और प्रकाश-व्यवस्था की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसने अपने कलात्मक क्षेत्र का विस्तार मूक सिनेमा (मूवीज) से लेकर सवाक् सिनेमा (टॉकीज), रंगीन सिनेमा,एच.डी.,3डी सिनेमा, स्टीरियो साउंड, वाइड स्क्रीन और आई मेक्स तक किया है। हिन्दी फिल्मों में विशेषत: हिन्दी की 'हिन्दुस्तानी' शैली का चलन है। हिन्दी फिल्मों में विषयवस्तु देशभक्ति, परिवार, प्रेम, अपराध, भय तथा वर्तमान समय के ज्वलंत मुद्दे इत्यादि पर आधारित होते हैं। हर फ़िल्म में कई मनोरंजक गाने होते हैं। हिन्दी और उर्दू (खड़ीबोली), पंजाबी, बम्बइया हिन्दी, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी जैसी बोलियाँ भी संवाद और गानों मे उपयुक्त होते हैं। साहित्य, रंगमंच, संगीत, चित्रकला, तकनीक की सभी सौन्दर्यमूलक विशेषताओं और उनकी मौलिकता से सिनेमा बहुत आगे निकल गया है।
भारत में प्रथम बार 7 जुलाई सन् 1896 को बंबई के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। एक महत्वपूर्ण दिन है। इनके लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह मुंबई और कोलकाता में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। भारत में प्रथम बार सन् 1899 में 'श्री भटवडेकर' और 'श्री हीरालाल सेन'  ने प्रथम लघु चलचित्र बनाने में सफलता हासिल की। लोग कहते हैं कि मूक दौर में 1288 फिल्में बनी थीं, लेकिन उनमें से मात्र 13 फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलती हैं। दादा साहेब फालके को उस समय व्यवसाय में बहुत हानि हुई। व्यवसाय में हुई हानि से उनका स्वभाव चिड़िचड़ा सा हो गया था। दादा साहेब ने क्रिसमस के अवसर पर ‘ईसामसीह’ पर बनी एक फिल्म देखी। फिल्म देखने के दौरान ही दादा साहेब ने तय कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद फिल्मकार बनना ही है। उन्हें लगा कि रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक महाकाव्यों से फिल्मों के लिए अच्छी और अनेक प्रकार की कहानियां मिलेंगी। उनके पास हुनर की कोई कमी नहीं थी। वे नए-नए प्रयोग करते थे। दादा साहेब अपनी योग्यता और स्वभावगत प्रकृति के चलते प्रथम भारतीय चलचित्र बनाने का असंभव कार्य करने वाले वह पहले व्यक्ति बने।"दादा साहेब फालके ने अपने लंदन प्रवास के दौरान ईसा मसीह के जीवन पर आधारित एक चलचित्र देखा। वह फिल्म ल्युमेरे ब्रदर्स की फिल्मों की तरह लघु चलचित्र न होकर लंबी फिल्म थी। उस फिल्म को देख कर दादा साहेब फालके के मन में पौराणिक कथाओं पर आधारित चलचित्रों के निर्माण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। स्वदेश आकर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र बनाई जो कि भारत की पहली लंबी फिल्म थी और सन् 1913 में प्रदर्शित हुई। उस चलचित्र ने (ध्वनिरहित होने के बावजूद भी) लोगों का भरपूर मनोरंजन किया और दर्शकों ने उसकी खूब तारीफ की।"(1) कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फीचर फिल्म का जन्म सन् 1912 में ही 'पुंडलिक' नामक फिल्म से हो गया था, लेकिन सर्वस्वीकार्य रूप से भारतीय फीचर फिल्मों का जन्म सन् 1913 में माना गया है। भारतीय सिनेमा में सन् 1913 से सन् 1929 तक मूक फिल्मों की ही प्रधानता रही पर सन् 1930 तक आते-आते चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित होने के कारण बोलती फिल्में बनने लगीं।
भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। फिल्म 'कर्मा' सन् 1933 में प्रदर्शित इतनी लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं। सन् 1949 में राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ ने बाक्स आफिस पर धूम मचाई। 50 के दशक में सामाजिक विषयों पर आधारित व्यवसायिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। वी शांताराम की 1957 में बनी फिल्म ‘दो आंखे बारह हाथ’ में पुणे के ‘खुला जेल प्रयोग’ को दर्शाया गया। फणीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ हिन्दी सिनेमा में कथानक और अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण है। ऐसी फिल्मों में बदनाम बस्ती, आषाढ़ का दिन, सूरज का सातवां घोड़ा, एक था चंदर-एक थी सुधा, सत्ताईस डाउन, रजनीगंधा, सारा आकाश, नदिया के पार आदि प्रमुख है। 'धरती के लाल और नीचा नगर’ के माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिला और अपनी माटी की सोंधी सुगन्ध, मुल्क की समस्याओं एवं विभीषिकाओं के बारे में लोगों की आंखें खुली। ‘देवदास, बन्दिनी, सुजाताऔर परख’ जैसी फिल्में उस समय बाक्स आफिस पर उतनी सफल नहीं रहने के बावजूद ये, फिल्मों के भारतीय इतिहास के नये युग की प्रवर्तक मानी जाती हैं। महबूब खान की साल सन् 1957 में बनी फिल्म ‘मदर इण्डिया’ हिन्दी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली और शम्भू मित्रा की फिल्म ‘जागते रहो’ फिल्म निर्माण और कथानक का शानदार उदाहरण थी। इस श्रृंखला को स्टर्लिंग इंवेस्टमेंट कारपोरेशन लिमिटेड के बैनर तले निर्माता निर्देशक के आसिफ ने ‘मुगले आजम’ के माध्यम से नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। नारायण सिंह राजावत लिखते हैं-  "पुराने जमाने में ‘तीसरी कसम’ से लेकर ‘भुवन शोम’ और अंकुर, अनुभव और अविष्कार तक फिल्मों का समानान्तर आंदोलन चला। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों ने यथार्थवादी पृष्ठभूमि पर आधारित कथावस्तु को देखा.परखा और उनकी सशक्त अभिव्यक्तियों से प्रभावित भी हुए। नये दौर में विजय दानदेथा की कहानी पर आधारित फिल्म ‘पहेली’ श्याम बेनेगल की ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ और ‘वेलडन अब्बा’, आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’, ‘स्वदेश’, आमिर खान अभिनीत ‘थ्री इडियट्स’, अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘पा’ और ‘ब्लैक’, शाहरूख खान अभिनीत ‘माई नेम इज खान’ जैसे कुछ नाम ही सामने आते हैं जो कथानक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सशक्त माने जाते हैं।"(2) सन् 1950 के दशक मे हिंदी फिल्मे श्वेत-श्याम से रंगीन हो गई। फिल्म का विषय मुख्यतः प्रेम होता था और संगीत फिल्मों का मुख्य अंग होता था। 1960-70 के दशक की फिल्मों में हिंसा का प्रभाव रहा। सन् 1980 और सन् 1990 के दशक में प्रेम आधारित फिल्में वापस लोकप्रिय होने लगी। 1990-2000 के दशक मे समय की बनी फिल्मे भारत के बाहर भी काफी लोकप्रिय रही। प्रवासी भारतीयों की बढ़ती संख्या भी इसका प्रमुख कारण था। हिंदी फिल्मों में प्रवासी भारतीयों के विषय लोकप्रिय रहे हैं। 60 और 70 का दशक हिंदी फिल्मों के सुरीले दशक के रूप में स्थापित हुआ तो 80 और 90 के दशक में हिन्दी सिनेमा ‘बालीवुड’ बनकर उभरा।

संदर्भ ग्रंथ :

1. https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%
2. सिंह राजावत नारायण, हिन्दी सिनेमा के सौ वर्ष, भारतीय पुस्तक परिषद, आई. एस. बी. एन. -978-81-908095-0, प्रकाशन वर्ष: जनवरी 01, 2009

सहायक संदर्भ ग्रंथ :

1. वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002
2. आइडोलॉजी ऑफ हिंदी फिल्म, एम. माधव प्रसाद
3. परिकल्पना समय (हिन्दी मासिक), माह : मई 2013, लेखक : रविराज पटेल, शीर्षक : कैसे बनी भोजपुरी की पहली फिल्म
4. बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, मिहिर बोस


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
संपर्क - 4  मुरारी पुकुर लेन,कोलकाता-700067, ई-मेल- anandpcdas@gmail.com, 7003871776, 9804551685


Axact

Akshaya Gaurav

hindi sahitya, hindi literature, hindi stories, hindi poems, hindi poetry, motivational stories, inspirational stories, हिन्दी साहित्य, कहानियाँ, हिन्दी कविताएँ, काव्य, प्रेरक कहानियाँ, प्रेरक कहानियाँ, व्यंग्य.

loading...

POST A COMMENT :