हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ महिला लेखिकाओं में मालती जोशी का स्थान उच्चतम है। आज महिला कथाकारों में बड़े सम्मान से मालती जोशी का नाम लिया जाता है। वे स्वभाव से गंभीर व आदर्श की मूर्ति हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की निवासी मालती जोशी का जन्म महाराष्ट्र प्रांत के मराठवाडा विभाग की राजधानी औरंगाबाद में जून सन् 1934 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी एवं एक उच्च कोटि की साहित्यकार मालती जी का जन्म हमारे देश में हुआ है इसका हमें गर्व है। उनका प्रारंभिक जीवन इंदौर में गुजरा। मालती जी के पिता ग्वालियर रियासत में सिविल जज के रूप में कार्यरत थे। उनके पिता ईमानदार, साफ-सुथरे गांधीवादी प्रवृति के नेक इंसान थे। उन्हीं से सारे संस्कार मालती जी को धरोहर के रूप में मिले हैं। उनकी माता का नाम सरलाबाई था। वह एक साधारण घरेलू किस्म की महिला थी। मां संगीत की बहुत अच्छी जानकार थीं, वे बहुत अच्छा गाती थीं। मालती जी एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ीं।
मालती जी अपने कथा-साहित्य के माध्यम से नई मूल्य दृष्टि, नया नैतिकता का बोध, यौन-संबंधों का चित्रण, अकेलापन एवं अजनबीपन की अभिव्यक्ति, आर्थिक पक्ष का चित्रण, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य, परिवेश के प्रति जागरूकता, विद्रोह का स्वर एवं दुर्दम जिजीविषा जैसे कई विषय को मालती प्रस्तुत करतीं हैं। मालती जी की समसामयिक परिवेश के प्रति जागृति का भाव पैदा करतीं हैं। मालती जोशी की कहानियां हैं- वो तेरा घर ये मेरा घर, मोरी रंग दी चुनरिया, बहुरि, अकेला, बोल रे कठपुतली और भी अन्य कहानियां हैं। मालती जी ने साठोत्तर कहानी जीवन के प्रति अपनाया है। मध्यमवर्ग में पली-बढ़ीं होने के कारण परिवेश के प्रति यथार्थ की अभिव्यक्ति की है। मालती जी की ‘मध्यान्तवर’, 'घर', ‘दूसरी दुनिया’, ‘बेडि़यां’ आदि कहानियां यथार्थ की नयी अभिव्यक्ति को प्रस्तुतत करती है। सांप्रत समय में ऊंच-नीच का भेद, मध्यवर्ग की बेबसी, शोषण को अभिव्यक्त करता है। मालती जी मध्यवर्गीय महिला होने के कारण यह सब उन्होंने महसूस किया है और इस वर्गबद्धता को अपनी लेखनी में उतारने का प्रयास किया है। ‘फेयरवेल’, ‘कल्चर’ जैसी कहानी इनके उदाहरण हैं। इसके साथ-साथ ‘औकात’, ‘कोख का दर्प’, ‘परिणय’ जैसी कहानियां परंपरागत संबंधों की अस्वीकृति की ओर निर्देश करती है।
साठोत्तर कथाकार श्रीमती जोशी ने अपने कथा-साहित्य में अनुभूति की प्रमाणिकता को बड़ी उत्कृष्टता से चित्रित किया है, किन्तु लेखिका की यह अनुभूति मात्र पारिवारिक जीवन तथा उस परिवार के नारी जीवन तक ही सीमित दृष्टिगत होती है। स्वयं लेखिका की निम्नांकित स्वीकारोक्ति उनके कथा-साहित्य के अल्प-आयामी यथार्थ की गवाह देती है– "मध्य-वर्गीय घरेलू महिला हूँ। उसी जीवन को कहानियों में उकेरती हूँ।"1 वास्तव में मालती जोशी स्वीयं मध्यवर्गीय परिवार से उभरी लेखिका हैं। मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ी रहने के कारण लेखिका का अनुभव विश्व सीमित पाया जाता है। इसी कारण लेखिका के कथा-साहित्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति बहुआयामी हो पाई है। दूसरे महानगरीय अनुभूतियों के अंतर्गत भी लेखिका ने यातायात तथा मकान की समस्या  को ही चित्रित किया है। "‘घर’ कहानी में कलकत्ता जैसे महानगरीय जीवन में ‘मकान’ की तंगी की समस्या प्रस्तुत हुई है। लेखिका की ‘मध्यांतर’ तथा ‘राग-विराग’ आदि कथा-कृतियों में महानगरीय भीड़ एवं यातायात की समस्या का यथार्थ अंकन हुआ है। दिल्ली महानगर की पृष्ठभूमि पर लिखी गई ‘मध्यांतर’ कहानी की नौकरी-पेशा मिसेज पंडित की असहाय स्थिति है कि घर इतनी दूर और पर्स हमेशा खाली। सिवाय बस के इंतजार करने के कोई चारा नहीं। . . . इस भीड़ में अपने से चढ़ा नहीं जायेगा।"2 नगरीय जीवन में भी लेखिका की दृष्टि केवल मध्यवर्ग पर ही केंद्रित हुई दृष्टिगत होती है। मध्यवर्ग के अंतर्गत भी लेखिका का ध्यान पारिवारिक जीवन तथा उस परिवार के भीतर के नारी जीवन पर ही अधिक केंद्रित हुआ पाया जाता है। इस युग के कथाकारों ने महानगर, नगर कस्बा तथा गांव आदि संबंधी अपने जीवन-अनुभवों को अपनी कथाकृतियों में उकेरा है जबकि श्रीमती जोशी का कथा-साहित्य प्राय: नगर तथा कस्बे के जीवन चित्रण गहराई में जाकर बहुआयामी किया है। वस्तुत: मालती जी का कथा-साहित्य का केन्वस अत्यंत व्यापक है।
साठोत्तर युग में मानवीय संवेदनाओं पर अर्थ का स्वा़र्थ हावी हो जाने से परंपरागत एवं पारि‍वारिक आत्मिक संबंधों में दरारें पड़ती दीख पड़ती हैं। लेखिका ने नारी जीवन-विषयक अनुभूति सत्या उद्घाटित किया है कि – "आज की कामकाजी नारी घर और बाहर दोहरी चक्की में पिस रही है। पहले यह शोषण केवल शारीरिक या भावात्मक स्तर पर ही होता था, पर वर्तमान युग में अर्थतंत्र हो गया है।"3 मालती जोशी की ‘दूसरी दुनिया’, ‘परिणय’, ‘औकात’, ‘कोख का दर्प’ आदि कहानियों में संबंधों के परंपरागत रूप की अस्वीकृति का चित्रण पाया जाता है। स्वार्थ के वशीभूत हो जाने से परिवार के आप्तजनों में आनेवाली दूरियां तथा संबंधों की धड़कन को श्रीमती जोशी ने ‘परिणय’ में बखूबी उभारा है। ‘कोऊ न जानन हार’ कहानी के अनु दीदी के अपनी स्वार्थी एवं शोषक मां के प्रति छोटी बहन के सम्मुख कथित अद्योलिखित उद्गार परंपरागत संबंधों की अस्वीकृति के सूचक प्रतीत होते हैं। इस प्रकार पारिवारिक आत्मीय संबंधों के बेगानेपन तथा अस्वीकृति को लेखिका ने अपनी कथाकृतियों में यथार्थ के धरातल पर उभारा है। साठोत्तर युग में जीवन के हर क्षेत्र के मूल्यों में परिवर्तन पाया जाने लगा। अत: एवं इस युग के कथाकारों ने पुराने मूल्यों की उपेक्षा कर नये मूल्यों को प्रश्रय दिया है। समकालीन विकसित मूल्य-दृष्टि श्रीमती मालती जोशी के कथा-साहित्य में पर्याप्त मात्रा में रूपायित हुई है। श्रीमती जोशी ने नयी और पुरानी पीढ़ी के मूल्य-दृष्टि के टकराव को बखूबी उजागर किया है। वस्तुत: नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को अपने में एडजस्ट नहीं कर पा रही है। ‘साथी’ कहानी का कलेक्टर पुत्र को अपने बगल के ‘बैठक’ के कमरे में पिता की उपस्थिति अस्वस्थ कर देती है, खासकर मेहमानों के होने पर, पिताजी का बैठक में बैठकर खुलकर बातें करना बेटे को पसंद नहीं था। लेखिका ने कलेक्टर पुत्र की मां के निम्नांकित स्वेत द्वारा पुरानी पीढ़ी के प्रति नयी पीढ़ी के नजरिये को बेबाक ढंग से उद्घाटित किया है। इसी प्रकार ‘कोऊ न जानन हार’ की अनु, ‘मोरी रंग दी चुनरिया’ की जया,  ‘यातना चक्र’ की प्रेमा, ‘आखिरी सौगात’ की सुमन आदि समर्पित चरित्र है जो अपने परिजनों के खातिर अपने जीवन सर्वस्व का होम तो करती है, किन्तु उनके परिवारजन उनके इस त्याग को उनका कर्तव्य समझ बैठते हैं। अत: इस कथा-नायिकाओं को अपना समूचा त्याग विफल मालूम पड़ता है।
जोशी जी ने पारिवारिक धरातल पर परिजनों के बीच उभर रहे अजनबीपन अपरिचय तथा अकेलेपन को परिवेश की सच्चाई के साथ उजागर किया है। ‘औकात’ कहानी की मीनू तथा ‘रानियॉं’ कहानी की वंदना दोनों युवतियां सर्वगुण संपन्न होने के बावजूद केवल दहेज के अभाव में इनके लिए रिश्ता जुट पाना कठिन हो जाता है। पिता के आर्थिक दैन्य के कारण ही ‘छोटी बेटी का भाग्य’ की सुमन को अपनी इच्छा के विरुद्ध व्यस्त एवं दुहाजू पुरुष से ब्याह करना पड़ता है। इसी प्रकार ‘कोउ न जानन हार’ की तनु जब अपनी कमाऊ बड़ी दीदी अनु के विवाह के बारे में अपनी मां से सवाल करती है कि – "अम्मा हम लोग दीदी की शादी क्यों- नहीं कर देते?"4 तब अम्मा फटकर कहती है– "शादी कर देंगे तो खायेंगे क्या?"5 इस पर तनु बड़ी मार्मिक बात कह जाती है- "जैसे तो क्या हम अपने स्वार्थ के लिए दीदी का जीवन बरबाद कर देंगे।"6 यहां लेखिका ने पैसे पर टिके हुए परिवार के संबंधों तथा आत्मीय रिश्तों पर पड़ रहे आर्थिक परिवेश के दबाव को बखूबी से उजागर किया है। इस प्रकार लेखिका ने आर्थिक विषम स्थितियों के परिणाम स्वरूप मध्यवर्गीय पारिवारिक आत्मीय संबधों में प्रविष्ट शिथिलता तथा अनात्मीयता की सही तस्वीर अपने कथा-साहित्य में प्रस्तुत की है। मालती जोशी ने समसामयिक परिवेश के प्रति प्रतिबद्धता इन समस्याओं के यथार्थ के निरूपण में किया है। समस्याओं के साथ मालती जोशी ने न कभी ढॉंक पिछोडा किया है न कभी लुका छिपी की है। उनकी पैनी दृष्टि समस्याओं की तह तक पहुंचने की क्षमता रखती है।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि जोशी के कथा-साहित्य में यथार्थ की बहुआयामी अभिव्यक्ति हुई है। श्रीमती जोशी के कथा-साहित्य में जिस प्रकार आधुनिक मध्यवर्गीय शहरी एवं दाम्पत्य एवं पारिवारिक जीवन का बहुआयामी चित्रण पाया जाता है, उसी प्रकार उक्त परिवार के भीतर की नारी जीवन को यातनाओं का भी विभिन्न कोणों से अंकन हुआ है। वास्तव में लेखिका ने पारिवारिक जीवन के चित्रण के अंतर्गत पारिवारिक विघटन के विविध आयाम, टूटते-दरकते दाम्पत्य संबंध, टूटता-जुड़ता दाम्पत्यों, विवाह एवं प्रेम की समस्या, रिश्तों की जटिलता तथा पारिवारिक जीवन की अनेकानेक समस्याओं को जहां तक और बड़ी शिद्त के साथ उकेरा है, वहीं दूसरी ओर उन समस्याओं के तहत कारणों की भी ईमानदारी से खोजबीन की है। इतना ही नहीं लेखिका ने सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं का मुआयना तक परिवार के धरातल पर खड़े रह कर किया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि लेखिका ने अपने कथा-साहित्य में पारिवारिक जीवन को बहुआयामी विविधता के साथ उभारा है।
संदर्भ-सूची
1. जमादार, अल्लाबक्श, मालती जोशी, व्यक्तित्व एवं कृतित्व, पृ.सं.-11
2. जोशी, मालती, मध्यांतर, किताब घर प्रकाशन, दिल्ली, 1976, पृ.सं.- 85
3. जोशी, मालती, मोरी रंग दे चुनरिया, किताबघर प्रकाशन, दिल्लीप, 1992, पृ.सं.-1
4.  जोशी, मालती, आखिरी शर्त, किताब घर प्रकाशन, दिल्ली , 1991, पृ. सं.-67
5.  वही, पृ. सं.-67
6.  वही, पृ. सं.-67


लेखक परिचय

आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू., सिरसा से स्नातकोत्तर की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट (हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। वर्तमान में ए.जे.सी. बोस कॉलेज, कोलकाता में अतिथि प्रवक्ता हैं। कोलकाता से प्रकाशित होने वाली 'अग्निगर्भा पत्रिका' के सहायक संपादक हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 'मणिकर्णिका' का समाजशास्त्रीय अनुशीलन पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती हैं।
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Akshaya Gaurav

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