इन दिनों पूरी दुनिया अवैध घुसपैठियों के संकट से जूझ रही है। फिर चाहे वह यूरोप हो, अमेरिका हो या एशिया। आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन ने अरबियन मुल्कों में मौत का ऐसा तांडव किया कि लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल पड़ गई। ईरान, इराक, सीरिया जैसे देश पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं। इन देशों के नागरिक अपनी और अपने परिवार की जान बचाने के लिए पड़ोसी मुल्कों में शरण लेने के लिए मजूबर हैं, लेकिन ऐसे लोग उस देश के लिए शरणार्थी नहीं बल्कि घुसपैठियें हैं। क्योंकि न तो उनके पास बीजा है और न ही पासपोर्ट। जो कि किसी भी देश की शांति व सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। यह बात जग जाहिर है, परन्तु जब इसी तरह का मुद्दा भारत में उठाया जाता है, तो यहां इस मुद्दे का राजनीतिकरण होना सौभाविक है और हुआ भी ऐसा ही है। देश में बांग्लादेश के रास्ते से आए म्यांमार के रोहिग्या शरणार्थी भारत में बीजा खत्म होने के बावजूद डेरा डाले बैठे हैं और कई हजार रोहिग्या अभी भी घुसपैठ की फिराक में हैं। भारत सरकार की ओर से रोहिग्याओं को शरण देने से इंकार करते ही विपक्ष और वामपंथी विचारधारा के लोग ने सरकार पर हमला बोल दिया और रोहिग्याओं के हिमायती बन गए।
दुनिया में भारत ही एक ऐसा मुल्क है जहां के नागरिक लोकतंत्र के नाम पर खुद अपने ही देश का बेड़ा गर्ग करने पर तुले रहते हैं। भारत में इस समय 40 हजार से ज्यादा रोहिग्या शरणार्थी घुसपैठ की फिराक में हैं। सरकार ने जब इस अवैध घुसपैठ का विरोध किया तो विपक्ष सरकार के खिलाफ रोहिग्याओं को शरण देने के पक्ष में कूद गया। हाल में केंद्र में बीजेपी की सरकार है, बीजेपी की छवि कट्टर हिन्दूवादी की है, वहीं दूसरी ओर रोहिग्या में ज्यादातर मुस्लिम शरणार्थी हैं, तो जाहिर सी बात है कि मुस्लिमों को अपना पक्का वोटबैंक मनाने वालों के लिए सरकार को नीचा दिखाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था। चूंकि विपक्ष का काम सरकार की नीतियों का विरोध करना होता है, तो इस मुद्दे पर विपक्ष यह भूल गया कि जिस वह मानवाधिकार का मुद्दा बता रहा है वह दरअसल भारत जैसे विकासशील देशों के लिए समस्या से कम नहीं है।
ऐसा नहीं है कि शरणार्थियों व घुसपैठियों का मुद्दा भारत में पहली बार उठा हो। वक्त-वक्त पर यह मुद्दा उठता रहता है। राजनीतिक पार्टियां अपने सुविधा के अनुसार इस समस्या का राजनीतिकरण करतीं रहतीं हैं। लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी ने अवैध बांग्लादेशियों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आते ही किए हुए वादे शायद याद ही नहीं आते। वहीं कांग्रेस की स्मरण शक्ति को बढ़ाने की बात की जाए तो कांग्रेस की आयरन लेडी इंद्रा गांधी के समय भी शरणार्थियों का संकट पैदा हुआ था, तब उन्होंने देश की माली हालत की दुहाई देते हुए किसी भी तरह के शरणर्थियों को देश में पनाह देने से साफ इंकार कर दिया था। अगर इतिहास को और खंगाला जाए तो चाणक्य के समय में कपिलावस्तु राज्य में विदेश शरणार्थियों के घुसपैठ की समस्या सामने आई थी, तब भी राज्य के कुछ लोग शरणार्थियों को शरण देने के पक्ष में थे, तो कुछ शरणार्थियों को शरण देने के विरोध में खड़े हुए थे। हाल में भी कुछ इसी तरह की स्थिति है।
इस समस्या पर बहस करने से पहले हम सभी को यह सोचना होगा कि जब देश में हाई स्पीड ट्रेन या बुलेट ट्रेन की बात होती है  तो विपक्ष यह कहकर सरकार का विरोध करता है कि देश अभी इस हालत में नहीं है कि यहां स्पीड ट्रेन या बुलेट ट्रेन चलाई जाए। और यह भी कहता है कि देश में चलने वाली ट्रेनों के जरनल डिब्बे बड़ा दो, बस सारी समस्या का समाधान हो जाएगा। मतलब कि आम आदमी भूसे की तरह ट्रेन की जनरल बोगी में घुसा रहे और हर बार एक नई उम्मीद के सहारे किसी न किसी पार्टी का वोटबैंक बना रहे।
यहीं हालात आज देश में घुसपैठियों को लेकर पैदा हो रहे हैं। देश में अवैध रूप घुसपैठ को तैयार बैठे शरणर्थियों में कमजोर पड़े विपक्ष को अपना वोटबैंक नजर आ रहा है। ऐसा नहीं हैं कि यह वोटबैंक नहीं है, पश्चिमी बंगाम मेें सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी इसका जीता जागता उदाहरण हैं। उन पर आरोप लगाते रहे हैं कि उन्होंने अपने वोटबैंक को बढ़ाने के लिए लगभग चार करोड़ बांग्लादेशियों को पश्चिमी बंगाल में अवैध तरीके से बसाया है। हाल ही में मुहर्रम की दुहाई देकर नवरात्रों में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने पर हाईकोर्ट ने उन पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए फटकार लगाई है।
अब सवाल यह उठता है कि देश में शरणार्थियों की बढ़ती तादात से क्या-क्या समस्याएं पैदा हो सकती हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत विकासशील देश हैं। पूरी दुनिया की नजरें भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर हैं। ऐसे में अगर भारत अवैध घुसपैठियों को मानवाधिकार के नाम पर शरण दे देता है, तो देश की सरकार को उनकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करना होगा। रहने, खाने, पानी, बिजली की पूर्ति होते ही यही शरणार्थी बाद में देश की नागरिकता की मांग करेंगे। इसके बाद स्वास्थ्य, शिक्षा की भी दरकार होगी। और इस सब की पूर्ति के लिए भारत के आम नागरिक पर टैक्स का बोझ बढ़ता जाएगा। अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, बेरोजगारी बढ़ेगी, अपराध बढें़गे, सुरक्षा व शांति पर भी सवालिया निशान लगेंगे। ऐसी और भी कई समस्याओं से देश को जूझना पड़ेगा।
ऐसा नहीं है कि भारत ने इससे पहले किसी को शरण नहीं दी है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहुदियों को शरण देने वाला भारत पहला देश था। जिसका एहसान आज तक यहूदी देश इजराइल मानता है। नेपालियों को भारत में रहने के लिए किसी तरह के बीजा-पासपोर्ट की जरूरत नहीं है। नेपाली नागरिक आम भारतीय नागरिकों की तरह यहां रहकर काम-धंधा कर सकता है। इसके अलावा श्रीलंका, तिब्बत, भूटान और यहां तक की पाकिस्तान के नागरिक भी भारत में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में भारत की जनसंख्या देश के लिए विस्फोटक होती जा रही है और यह सबसे बड़ी चिंता का विषय है।


झांसी के रहने वाले जितेन्द्र कुमार नामदेव पत्रकारिता को छोड़ अब शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है। लेखक से 9935280497 पर संपर्क किया जा सकता है।


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Akshaya Gaurav

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