उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 
कि रुक जा ऐ दिल 
थोड़ा मचल जाता हूँ 

नफ़रत है मुझको भी, मधुशाला से
चौख़ट पर आकर तेरी 
थोड़ा सा बदल जाता हूँ  

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

मोहब्बत एक ज़हर, इल्म है हमको 
क्या करूँ ऐ दिल-ए -नादां 
होंठों से लगाता हूँ 

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

तूने किया ज़ालिम, रुख़्सत मेरी रूह को 
बड़ा ही बेआबरू कह कर 
क़ब्रिस्तान में सोता हुआ 
इश्क़ फ़रमाता हूँ

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ  

चिराग़े रौशन करते हैं वो 
मेरी क़ब्र पे आकर कभी -कभी 
नफ़रत से ही सही, ज़न्नत में आ गया 
ख़ुद को फुसलाता हूँ

उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर 'एकल्वय' नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका के पास सुरक्षित है।


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Akshaya Gaurav

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