नभचर से नभ छीन चुके हैं
खेत-खलिहान छीन चुके हैं

घोंसले बनाने को दीवारें तो
खाना-पीना भी छीन चुके हैं

कृत्रिम प्रकृति की रचना में हम
इनका चहचहाना छीन चुके हैं

जहाँ-तहाँ हैं ये व्याकुल पंछी
इनसे उड़ना तक छीन चुके हैं

अपनी-अपनी लालच में आके


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Akshaya Gaurav

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