ज़ुल्म होता रहे और आँखें बंद रहें 
ऐसी आदत किसी  काम की नहीं 

बेवजह अपनी ही इज़्ज़त उछले तो  
ऐसी शराफत किसी काम की नहीं 

बदवाल का नया पत्ता न खिले तो 
ऐसी बगावत किसी काम की नहीं 

मुस्कान की क्यारी न खिल पाए तो 
फिर शरारत किसी काम की नहीं 

तुम्हें छुए और होश में भी रहें तो 


Axact

Akshaya Gaurav

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