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इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत
दफ्न होने को दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत

तुम इंसान हो,तुम चल दोगे यहाँ से
पर लाशों पर रहने वाले मकीं* हैं बहुत

भरोसा तोड़ना कोई कानूनन जुर्म नहीं
इंसानियत कहती है ये संगीन है बहुत

झुग्गी-झोपड़ियों के पैबन्द हैं बहुत लेकिन
रईसों की दिल्ली अब भी रंगीन है बहुत

वो बरगद बूढ़ा था,किसी के काम का नहीं
पर उसके गिरने से गाँव ग़मगीन है बहुत

बस एक हमें ही खबर नहीं होती है
वरना ये देश विकास में लीन है बहुत

*मकीं-मकाँ में रहने वाला



लेखक सलिल सरोज के बारे में अधिक जानने के लिए क्लिक करें।



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जो गीत मैं अपने वतन में गुनगुनाता हूँ
सरहद के पार भी वही गाता है कोई

मैं बादलों के परों पे जो कहानियाँ लिखता हूँ
वो संदली हवा की सरसराहट में सुनाता है कोई

उस पार भी हिजाब की वही चादर है
शाम ढले रुखसार से जो गिराता है कोई

मैं जून की भरी धूप में होली मना लेता हूँ
जब रेत की अबीरें कहीं उड़ाता है कोई

मेरे मन्दिर में आरती की घंटियाँ बज उठती हैं
किसी मस्जिद में अजान ज्यों लगाता है कोई

मुझे यकीं होता है इंसान सरहदों से कहीं बढ़कर है
जब किसी रहीम से राम मिलकर आता है कोई



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जो रहगुज़र हो जाए तेरे तन बदन का

जो रहगुज़र हो जाए तेरे तन बदन का
मुझे वही झमझमाती बारिश कर दो

तुमसे मिलते ही यक ब यक पूरी हो जाए
मुझे वही मद भरी ख़्वाहिश कर दो

जो रुकती न हो किसी भी फ़ाइल में
मेरी उसी "साहेब" से गुजारिश कर दो

गर लैला-मजनूँ ही मिशाल हैं अब भी
फिर हमारे भी इश्क़ की नुमाइश कर दो

वो सुनता बहुत है तुम्हारी बातों को
खुदा से कभी मेरी भी सिफारिश कर दो

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ये लोकतंत्र का तमाशा मैं रोज़ यहाँ देखता हूँ


ये लोकतंत्र का तमाशा मैं रोज़ यहाँ देखता हूँ
मैं अँधेरे में रहता हूँ, पर कोई अंधा  नहीं हूँ

लगता है आप भाषणों से सब को खरीद लेंगे
मैं बाज़ार में बैठा हूँ, पर कोई धंधा नहीं हूँ

हैं जान बहुत बाकी अभी,यूँ जाया न कर मुझे
मैं जनाज़े में तो हूँ, मैय्यत का कंधा नहीं हूँ

मैं जीके ही जाऊँगा ज़िन्दगी की सब मस्तियाँ
मैं इसी समाज का हूँ, पर रिवाजों से बंधा नहीं हूँ


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अगर भूख कौम के रास्ते आती है
तो रोटी का भी कोई धर्म बता दो

आप धनाढ्य हैं,आप बच जाएँगे
खेतिहरों का भी कोई साल नर्म बता तो

दिल्ली की बाँहों में हैं सब रंगीन रातें
किसी मल्हारिन का भी चूल्हा गर्म बता दो

बेटियों से ही सब उम्मीद की जाएँगी क्या
देश के संसद में भी बची हुई शर्म बता दो

मन्दिर जाने से ही पाप-पुण्य होता है क्या
फिर आधुनिक बाबाओं का भी कर्म बता दो

कविताएँ जो कह पाती सब की बातें
तो तहखानों में कैद ज्ञान का मर्म बता दो


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तेरे ख़्वाबों से है वास्ता कोई
इन निगाहों से है रास्ता कोई

उसे देखके मैं खिल उठता हूँ
बच्चे में बसा है फरिश्ता कोई

हमें तो हर धर्म की तहज़ीब है
मेरा वतन ही है गुलिस्तां कोई

चाँद जो यौवन के उरूज पे है
मेरे महबूब सा है शाइस्ता* कोई

मैं वक़्त को हराके अभी बैठा हूँ
इक नई सदी दे दो आहिस्ता कोई

*शाइस्ता-खूबसूरत लड़की (पश्तून भाषा में)