विरह आग तन में लगी, जरन लगे सब गात, नारी छूवत वैद्य के, परे फफोला हाथ

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मीरा कहती हैं- ‘दरद की मारी बन-बन डोलूं, वैद मिला नहिं कोय।’ जगह-जगह जाती हूं। जहां भी जाती हूं, वहीं गोविन्द की याद हो आती है। फूल खिलता है तो गोविंद की विरह की आग पैदा हो जाती है। चांद उगता है तो गोविंद की याद पैदा हो जाती है। जहां जाती हूं, वहीं उसकी याद पैदा हो जाती है, वहीं उसकी विरह वेदना जग जाती है। एक विरह लेकर जी रही हूं। एक ऐसा ज़ख्म है मेरे हृदय में। जो इसका इलाज जानता हो वो वैद्य कौन है? मीरा कहती हैं- ‘मीरा के प्रभु पीर मिटेगी जब वैद सांवलिया होय।’ अर्थात, ये पीड़ा ऐसे मिटने वाली नहीं है। जब गोविंद खुद गुरु बनकर आएंगे, तब ये विरह वेदना मिटेगी।

मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है। इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है। निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। वर्षा ऋतु में उसे अपनी प्रेमिका की याद सताने लगती है। कामार्त यक्ष सोचता है कि किसी भी तरह से उसका अल्कापुरी लौटना संभव नहीं है, इसलिए वह प्रेमिका तक अपना संदेश दूत के माध्यम से भेजने का निश्चय करता है। अकेलेपन का जीवन गुजार रहे यक्ष को कोई संदेशवाहक भी नहीं मिलता है, इसलिए उसने मेघ के माध्यम से अपना संदेश विरहाकुल प्रेमिका तक भेजने की बात सोची। इस प्रकार आषाढ़ के प्रथम दिन आकाश पर उमड़ते मेघों ने कालिदास की कल्पना के साथ मिलकर एक अनन्य कृति की रचना कर दी।

“कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:
शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।
यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु
स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।”

कोई यक्ष था। वह अपने काम में असावधानहुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया किवर्ष-भर पत्‍नी का भारी विरह सहो। इससेउसकी महिमा ढल गई। उसने रामगिरि केआश्रमों में बस्‍ती बनाई जहाँ घने छायादारपेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्‍नानों द्वारापवित्र हुए जल-कुंड भरे थे।

महाभारत के “नलोपाख्यान” नामक आख्यान में नल तथा दमयंती द्वारा इसको दूत बनाकर परस्पर संदश प्रेषण की जो कथा आई है, वह भी दूतकाव्य की परंपरा का ही अनुसरण है। कवि जिनसे (९वीं शती ईसवी) “मेघदूत” की तरह ही मंदाक्रांता छंद में तीर्थकर पार्श्वनाथ के जीवन से संबद्ध चार सर्गों का एक काव्य “पार्श्वाभ्युदय” लिखा जिसमें मेघ के दौत्य के रूप में मेघदूत के शताधिक पद्य समाविष्ट हैं। १५वीं शताब्दी में “नेमिनाथ” और “राजमती” वाले प्रसंग को लेकर “विक्रम” कवि ने “नेमिदूत” काव्य लिखा, जिसमें मेघूदत” के १२५ पद्यों के अंतिम चरणों को समस्या बनाकर कवि ने नेमिनाथ द्वारा परित्यक्त राजमती के विरह का वर्णन किया है। इसी काल में एक अन्य जैन कवि “चरित्रसुंदर गणि ने शांतरसपरक जैन काव्य “शीलदूत” की रचना की। इन दो कृतियों के अतिरिक्त विमलकीर्ति का “चंद्रदूत”, अज्ञात कवि का “चेतोदूत” और मेघविजय उपाध्याय का “मेघदूत समस्या” इस परंपरा के अन्य जैन काव्य हैं।

भारत की नहीं विश्व की प्राचीनतम उपलब्ध रचना ऋग्वेद है। इसके दसवें मंडल में ९५ वे सूक्ति में उर्वशीऔर पुरुरवा का संवाद वर्णित है जो कि विरह -वेदना की उक्तियों से भरपूर है। राजा पुरुरवा की प्रेयसी उर्वशी किसी वात पर रुष्ट होकर उसे छोड़ कर चली जाती है। पुरुरवा उसके विरह में पागलों की तरह उन्मत्त होकर उसे ढूंढ़ता हुआ मानसरोवर के तट पर पहुँचता है,जहां उर्वशी अपनी सखियों के साथ आमोद -प्रमोद में व्यस्त मिलती है। हे निष्ठुर !ठहर !ठहर ! इन शब्दों से अपनी बात आरम्भ करता हुआ पुरुरवा अपने विरह -व्यथित ह्रदय की दशा अत्यंत करुणोत्पादक वर्णन करता है :-

हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्रा कृष्णवावहै नु।
न नौ मंत्रा अनुदितास एते मयस्करंपरतरे चनाहन।।

अर्थात-“हे निष्ठुर !ठहर !ठहर !आ ,हम अपनी परस्पर दृढ़ सम्बन्ध बनाये रखने की प्रतिज्ञा को पूरी करें ,अन्यथा हमारा जीवन सुखी नहीं रहेगा।”

कहते हैं कि नारद जी के शाप के कारण राधा-कृष्ण को विरह सहना पड़ा। राधा और रूक्मिणी दोनों ही माता लक्ष्मी का अंश हैं। नारद जी के इस शाप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्र को सीता माता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में श्री राधा का वियोग सहना पड़ा था।

इस संसार में मोह की विचित्रता है, कर्म का तमाशा है। पुत्र, मित्र, कलत्र के वियोग होने पर अपने को दुखी मानता है, रोता है, कष्ट उठाता है। जिसके कारण संसार में जन्म मरण करता हुआ दुःख भोगता है। क्योकि दुख का कारण पर द्रव्यों का संयोग-वियोग मात्र है। मोहि जीव क्षण भर में रुष्ट हो जाता है और क्षण में संतुष्ट होता है। अनुकूल पदार्थ का संयोग होने पर हर्ष होता है और प्रतिकूल पदार्थो का संयोग होने पर दुखी होता है। अतः दुःख सुख का मूल कारण है तो वह परपदार्थो का संयोग- वियोग है। अज्ञानी कभी सुखी नहीं हो पाता क्योकि वह राग- द्वेष करता रहता है और कर्मो का बंध करता है। जिससे जन्म -मरण रूपी संसार ही प्राप्त होता है। जीव कषाय रूप परिणमन तो करता है पर आत्मा के स्वरूप को नहीं जानता ।

संबंधों के मामले में यथार्थ को जानें तथा संयोग-वियोग अवस्थाओं में अपेक्षाओं, कामनाओं और स्वार्थों से मुक्त रहकर जीवन का आनंद पाएं। जो लोग आपके साथ हैं उनका पूरा साथ निभाएं, उन पर गर्व करें और उनके प्रति आत्मीय सहयोग, संबल एवं सद्भावना रखें। जो किन्हीं भी प्रकार की दुर्भावना, शंकाओं, आशंकाओं या भ्रमों-अफवाहों की वजह से अपने साथ नहीं हैं, रूठकर छिटक गए हैं उनके प्रति भी सद्भावना रखें और वियोग को नियति का प्रसाद मानकर ग्रहण करें। जीते जी मुक्ति का आनंद पाने के लिए यही सूत्र है।

कवियत्री महादेवी तो वेदना की साक्षात् मूर्ति ही हैं। उनके काव्य की प्रत्येक पंक्ति विरहानुभूतियों से उद्वेलित है।विरह की मधुर पीड़ा का संचार उनके जीवन में किस प्रकार हुआ ,इसका स्पष्टीकरण भी उनहोंने किया है –

इन ललचाई पलकों पर, पहरा था जब व्रीड़ा का।
साम्राज्य मुझे दे डाला, उस चितवन ने पीड़ा का।।

किन्तु अन्त में उन्होंने अपनी वेदना पर ऐसी विजय प्राप्त कर ली है कि अब उन्हें विरह में मिलन की , न दुःख में सुख की अनुभूति होने लगी है-

विरह का युग आज दीखा ,मिलन के लघु पल सरीखा।
दुःख सुख में कौन तीखा , मैं न जानी और न सीखा।।

लेखक
सलिल सरोज

कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन ,नई दिल्ली।

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