भावना का आदर

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इस बुढ़ापे ने अपनो को अलग कर दिया है, मैने जिनके लिए सब कुछ किया वही आज हाथ छोड़कर अलग हो गये। भगवान तेरा क्या यही इन्साफ है।

मै आज दर दर की ठोकरे खा रहा हूँ। कोई बच्चा साथ लगने को तैयार नही है। मै अपना गुजारा भीख मांगकर कर रहा हूँ। सोचता हुआ मार्ग के किनारे-किनारे जा रहा था। तभी एक युवक ने तेजी में आकर उस बुढ़े व्यक्ति को टक्कर मार दी, बूढ़ा शरीर एक पत्थर से टकराया और गिर पड़ा। बुढ़े के हाथ में बंध्ी घड़ी टूटकर गिर गई। लोगो ने बुढ़े को उठाया और बुढ़े को मामूली चोटे लगी, लेकिन उसकी घड़ी टूट गई। जिससे उसे प्रेम था। घड़ी के बिना बूढ़ा अपने को असहाय महसूस कर रहा था। बुढ़े को लोगो ने सुरक्षित महसूस समझकर बेठाकर चले गये। बूढ़ा टूटी घड़ी को ढ़ूढ़कर उठाया और एक घड़ी वाले की दुकान पर पहुँचता है। अपनी घड़ीसाज को दिखाते हुए कहता है, बाबू जी इसे ठीक कर दो। घड़ी चल रही है। बस इसके पीछे का गत्ता हट गया है। अगर आप इसे चिपका दो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।
बाबा, ये घड़ी बहुत पुरानी है। हाँ! बाबूजी ये घड़ी मेरी शादी की है। इस घड़ी से मेरा अतीत जुड़ा है। मै चाहता हूँ कि ये घड़ी मेरी अर्थी के साथ जाये।

बाबा! ये घड़ी ठीक नही हो सकती। इसके पीछे गत्ता लगा था, इसका ढ़क्कन मेरे पास नही है। जो मे इसमें लगा दूं। ये बेकार हो चुकी है, दूसरी ले लो।
बाबू मैने कहा था, इस घड़ी से मेरा अतीत जुड़ा है। मै इसे नही बदल सकता। घड़ी तो ठीक है, बस गत्ता हट गया है। जो पैसे होंगे वो मै दे दूंगा।
बाबा ये ठीक नही होगी,, तुम यहां से जाओ। मेरा समय बरबाद ना करो। बूढ़ा मायूस हो गया ओर दुकान से जाने लगा। तभी एक सज्जन अपनी बेटी के साथ घड़ी ठीक कराने दुकान पर पहुंचे। उन सज्जन की निगाह बूढ़े पर पड़ी। वो सज्जन बुढ़े से बोले, बाबा क्या बात है। बड़े उदास लग रहे हो।
हाँ! बेटा मेरी घड़ी टूट गई है, पर चल रही है। मै इसे ठीक कराने आया था। परन्तु घड़ी साज ने ठीक करने से मना कर दिया, इसलिए मायूस हँू।
बाबा! मायूस ना हो। मै देखता हँू। तुम्हारी घड़ी में क्या खराबी है, कहकर सज्जन ने घड़ी देखी जो कापफी पुरानी थी। जिसके पीछे गत्ता लगा था। सज्जन ने घड़ी वाले से कहा, भाई ये बूढ़ा आदमी है, तुम्हे इसकी भावना को समझना चाहिए। याद रखो कल तुम्हे भी बूढ़ा होना है। अगर तुम्हारे साथ ऐसा कोई हादसा हो जाये। लोग तुम्हारी मदद करने से इंकार कर दे। तो तुम पर उस समय क्या गुजरेगी। सोचो।
बाबू जी, हमने घड़ी ठीक करने को मना कहां किया है। लेकिन घड़ी इस लायक तो हो जो ठीक हो जाये। इसके पीछे गत्ता लगा है बताओ गत्ता कैसे लगा दे। कोई मुझे ही बेवकूपफ कहेगा।
मेरे भाई, कभी-कभी इंसान दूसरो को खुशी देने के लिए बेवकूपफ बन जाता है। जिससे दूसरो को खुशी मिलती है। तुम भी आज इस बुढ़े को खुशी देने के लिए बेवकूपफ बन जाओ।
ठीक है, बाबूजी! बताओ इसे कैसे जोड़ू।
अरे तुम्हारे पास, ये सैलो टेप रखी है। उसे काटकर गत्ता रखकर चिपका दो। घड़ी ठीक हो जायेगी।
ठीक है बाबूजी, ये काम तो मै अभी करता हँू, कहकर घड़ीसाज ने टेप काटकर गत्ता रखकर टेप चिपका दी और बुढ़े व्यक्ति को दे दी। बूढ़ा व्यक्ति अपनी घड़ी देखकर खुश हो गया और कहने लगा बाबू जी तुमने मेरी ठीक करके मेरे अतीत को लौटा दिया है। मै आपका अहसानमंद हँू।
नही बाबा, इसमें एहसान की कोई बात नही। इन्होने वही किया जिससे आपको खुशी मिले। बूढ़ा व्यक्ति दुकान में खड़े सज्जन व उनकी बिटिया तथा दुकानदार को अपना आशिवार्द देते हुए प्रसन्न मुद्रा मे वहां से चला जाता है।
लोगो को चाहिए कि दुसरे लोगो की खासतौर से बुढ़े लोगो की भावनाओं का आदर व सम्मान करे। जैसे बूढ़े आदमी की घड़ी पर टेप लगाकर बूढ़े व्यक्ति को सुख प्राप्त हुआ। असल में यही मानव सेवा है।

डा0 फखरे आलम खान

(लेखक अक्षय गौरव पत्रिका में प्रधान संपादक है।)


prachi

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