जीवन में स्वयं को पुनर्स्थापित करने के लिए जरूरी है संकल्प

0
9

अक्सर हम जिन्दगी के एक मोड़ पर पहुंचते-पहुंचते हार मानने लगते है। हमें महसूस होता कि अब हम इससे आगे कुछ नहीं कर सकते है। अब हमारे सभी कर्म पूरे हो गये है। यहां पर आपको ऐसे ही पक्षी के बारे में बताने जा रहे हैं जो जीवन की आधी उम्र पार करने के बाद किसी भी कार्य के लिए असमर्थ हो जाता है, लेकिन फिर भी हार नहीं मानता है।

बाज की उम्र लगभग 70 वर्ष होती है, लेकिन जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते बाज को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। जो उसकी जिन्दगी को पूरी तरह से बदल देते है। इस उम्र में आकर उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग काम करना बंद कर देते है। जिनमें पंजे, चोंच और पंख है।
पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।
चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।
पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।
इन तीन प्रमुख अंगों के कारण बाज अपना भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाने की दैनिक क्रियाओं को करने में असमर्थ हो जाता है।
ऐसी अवस्था में बाज के पास तीन विकल्प होते हैं, पहला विकल्प देह त्याग दे, दूसरा विकल्प अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे और तीसरा स्वयं को पुनर्स्थापित करे।
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बी प्रक्रिया है, लेकिन बाज फिर भी तीसरे विकल्प को चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।
स्वयं को पुनर्स्थापित करने के लिए वह किसी ऊँचे पहाड़ की खोज करता है जो नितान्त एकान्त हो जहां पर वह अपना घोंसला बनाता है और तब पूरी प्रक्रिया प्रारम्भ करता है।
सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..! अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक पक्षीराज के लिये कुछ भी नहीं हो सकता है। इसके बाद वह चोंच के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है।
उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और पंजों के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है।
नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंचकर निकाल देता है और फिर से पंखों के पुनः उग आने की प्रतीक्षा करता है।
लगभग 150 दिन की पीड़ा, सहनशीलता और प्रतीक्षा के बाद उसे वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी जिन्दगी वापस मिल जाती है।
इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है, वह भी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।
प्रकृति हमें सिखाने बैठी है। पंजे पकड़ के प्रतीक हैं, चोंच सक्रियता की और पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।
इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की, सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की, कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।
इच्छा, सक्रियता और कल्पना… तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।
हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है, अर्धजीवन में ही जीवन समाप्त प्राय: सा लगने लगता है, उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा…. अधोगामी हो जाते हैं।
हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं- कुछ सरल और त्वरित.! कुछ पीड़ादायी…!! हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा- बाज के पंजों की तरह।
हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी- “बाज की चोंच की तरह।”
हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी- “बाज के पंखों की तरह।”
150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही, बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे, इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी….!

जीत तक ज़ारी जंग।

नोट : यह लेख हमने सोशल मीडिया से लिया है और इस लेख को पुन: संपादित कर प्रकाशित किया गया है।

prachi

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here