आतंकवाद (कविता) | शिवम कुमार सिंह

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आज करुण चीत्कार उठी है,
गुंज उठा नभमंडल है।
तेरे इस दारुण कृत्य से,
शोकाकुल हर मुखमंडल है।
पत्थर का-सा हृदय है तेरा,
शोले तुम बरसाते हो।
निर्दोषों की बलि चढाने,
कायर बन कर आते हो।
अगर भुजा में बल है तेरे,
तो मानवता की रक्षा कर।
दानवता के इस कृत्य से,
भय की सृष्टि रचा न कर।
बहुत-से दंश दिए हैं तुमने
बहुत-से प्राण लिए हैं हर।
मानवता की अब रक्षा खातिर,
अब आँखों में आँसू भरा तो कर।
यादि देश का बच्चा-बच्चा
सिर्फ खड़ा हो जाएगा,
तो दानवों के इस समूह का
संपूर्ण समूल नष्ट हो जाएगा ।
आज ईश्वर से मैं
इतनी-सी विनती करता हूँ,
मानवता की रक्षा खातिर
पुनः आह्वान करता हूँ।


लेखक विद्यार्थी है जो कि देवघर झारखंड से है। लेखक से shivamdeoghar147@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।
prachi

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