आपदाएं : मार देती हैं किसानों को | नीलेन्द्र शुक्ल ‘नील’

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आपदाएं
मार देती हैं किसानों को

ख़त्म कर देती हैं उनकी जिन्दगी
बरबाद कर देती हैं सारी फसल।
किसानों के दारुण हृदय की दर्द भरी
आवाज़
हृदय को झकझोर देने वाली,
आह…
इस ध्वनि से अथवा
किसी भयानक-बवंडर के आ जाने के
बाद का वह भयावह दृश्य,
जो एक किसान को उसके माथे पे हाथ रखने पर
मजबूर कर देता है,
और नैसर्गिकतया, न चाहते हुए भी
मुख से हाय यह शब्द निकल जाता है।
टूट जाता है,
सारे सपनों को टूटते हुए देख
बच्चे की फीस, अम्मा और बाबू जी के लिए दवाइयाँ
अगले माह बिटिया की सगाई
उसके लिए जेवर थोड़े बहुत
दहेज में गाड़ी,
उसके साथ पचास हजार नगद जैसे कई
जरूरी सपने
पर वह हार नही मानता
फिर से किसी के ढ़ाढस बंधाने पर खुद को मजबूत
करते हुए,
अपनी दूसरी फसल के बारे में सोंचने लगता है
किसान,
जैसे प्रथम पुत्र के मरणोपरांत दूसरे पुत्र के
बारे में सोंचते हैं लोग
और प्रवृत्त हो जाता है दूसरी फसल की
जुताई, बुआई, रोपाई में
पुनः लहलहाती फसलें खेतों में लहराने लगती हैं
किसान के चेहरे की वह प्रसन्नता जो
शदियों से खोई थी,
आज देखने को मिली उसके चेहरे पर।
अब वह नही चाहता इनसे दूर जाना
तनिक देर भी,
लगा रहता है निराई, गोड़ाई में,
स्पर्श करता है जब उन फसलों की
बालियों को,
लगता है पुचकार रहा हो अपने 2 साल के
पोते को जिससे निकलने लगी है
तुतलाहट भरी आवाज़,
कुछ ही दिनों के भीतर भर देता है
सारा कर्ज,
लोग कहते हैं वो देखो जा रहा है किसान
जो कभी सदमे में था।


नीलेन्द्र शुक्ल ” नील ” काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय से ग्रेजुएशन कर रहे है। लेखक का कहना है कि सामाजिक विसंगतियों को देखकर जो मन में भाव उतरते हैं उन्हें कविता का रूप देता हूँ ताकि समाज में सुधार हो सके और व्यक्तित्व में निखार आये। लेखक से ई-मेल sahityascholar1@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

prachi

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