उड़ जा रे ! मन दूर कहीं | ध्रुव सिंह

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उड़ जा रे ! मन दूर कहीं
जहाँ न हों,धर्म की बेड़ियाँ
स्वास्तिक धर्म ही मानव कड़ियाँ
बना बसेरा ! रैन वहीं
उड़ जा रे ! मन दूर कहीं,
श्वास भरे ! निर्मल समीर से
विद्वेष रहित हो,द्वेष विहीन
शुद्ध करे जो,आत्मचरित्र
बस तूँ जाकर ! चैन वहीं  
 उड़ जा रे ! मन दूर कहीं,
नवल ज्योति हो ! नवप्रभात
आत्मप्रस्तुति,कर सनात !
प्राप्त तुझे हों  सत्य ज्ञान  
बुद्धरूपी ब्रह्माण्ड वहीं
उड़ जा रे ! मन दूर कहीं
कर स्पर्श करें,जो नदियाँ
हृदय आनंदित,भाव-विभोर
नभ संगिनी धरा मिली हो
और मिलें हों  क्षितिज़ वहीं
उड़ जा रे ! मन दूर कहीं
निष्पाप खग,प्राणी हों सुन्दर
स्वर जो निकले,आत्मतृप्ति हो
विस्मृत हों क्षण पीड़ा के
खोज ! दिव्य स्थान कहीं
उड़ जा रे ! मन दूर कहीं

ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर ‘एकल्वय’ नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।
prachi

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