कर्तव्यपथ (कविता) | शिवम कुमार सिंह

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अंगारों से जल-जल कर जो
परिश्रम का लहू बहाते हैं,
छोड़ जमाने को पीछे वे
स्वर्णपुरुष बन जाते हैं।
देख तुम्हारी मजबूरी को
पहले जमाना हँसता है।
कर्तव्यपथ पर अडिग रहो तुम,
एक दिन जमाना झुकता है।
बङे भाग्य से अंग मिला है,
कुछ तो तुम उपयोग करो।
अपना न तो कम-से-कम तुम,
जननी का नाम अमर करो।
दुनिया में अबतक जिसने भी
अपना नाम कमाया है,
जीवन के प्रथम चरण में
पग-पग पर ठोकर खाया है।
गिरे-संभल कर जिसने भी
जीवन में चलाना सिखा है,
अपने भाग्य को अपने हाथ से
लिखना उसने सिखा है।
उठो भारती के सपूत तुम
अपना भाग्य बदल डालो।
सदियों-सदियों तक याद रहो तुम
ऐसा कुछ अब कर डालो।

लेखक विद्यार्थी है जो कि देवघर झारखंड से है। लेखक से shivamdeoghar147@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

prachi

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