कोई पुरुषोत्तम तो कोई पैगम्बर कहता है

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जिनके सपने टुट जाते हैं,
उन्हें नींद नहीं आती,
रातों को करवटें बदलते रहते हैं,
सुबह की तलाश में,
लेकीन ये मुसाफिर,
अगर तू थक जायेगा इन हालातों में?
इन छोटी-छोटी बातों में,
तो क्या, तुम्हार सफल होगा यह जीवन?
मनुष्य जीवन में ‘आशीष’ ऐसा ही होता है!
जिसने भी लिया है जनम,
उन्हें हर बार टूट के जुड़ना होता है,
तू देख उन्हें !
जिन्होंने मनुष्य में है जनम लिया,
अपने राम, अपने खुदा, अपने रब, अपने बुद्धा,
इनको तो देखो;
वक्त ने उनके भी सपने तोड़ डाले थे,
क्या वो थक गये?
क्या वो टुट गये?
नहीं!
कर दिये थे अपने सारे सपने को सच,
और आज;
कोई पुरोषोत्तम तो कोई पैगम्बर कहता है।

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आशीष कमल
उप-संपादक
लेखक योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा,
आन्ध्र प्रदेश में सहायक पुस्तकाल्याध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं
E-Mail- asheesh_kamal@yahoo.in

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।


prachi

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