खुदा की नज़रों में खुद को काबिल रखता है | सलिल सरोज

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वो अपनी दुआओं में अब भी असर रखता है

जवाँ जिस्म में अब भी बच्चे का दिल रखता है
शाम ढ़ले नहीं कि इंतज़ार शुरू हो जाती है
चौखट पे अपनी निगाहों का कंदील रखता है
यही अच्छी आदत रही पूरे सफर में उसकी
हर कदम अपनी निगाहों में मंज़िल रखता है
कद्रदान है बहुत ज़माने में उसके हमारे सिवा
जहाँ भी हो, वो हरी-भरी महफ़िल रखता है
उसे इंसान होने के मायने अब तलक पता हैं

prachi

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